वीर बालक पृथ्वी सिंह जिसने फाड़ के फैक दिया था शेर का जबड़ा

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 चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।

एक बार औरंगज़ेब के दरबार में एक शिकारी जंगल से पकड़कर एक बड़ा भारी शेर लाया! लोहे के पिंजरे में बंद शेर बार-बार दहाड़ रहा था! बादशाह कहता था... इससे बड़ा भयानक शेर दूसरा नहीं मिल सकता! दरबारियों ने हाँ में हाँ मिलायी.. किन्तु वहाँ मौजूद राजा यशवंत सिंह जी ने कहा - इससे भी अधिक शक्तिशाली शेर मेरे पास है! क्रूर एवं अधर्मी औरंगज़ेब को बड़ा क्रोध हुआ! उसने कहा तुम अपने शेर को इससे लड़ने को छोडो.. यदि तुम्हारा शेर हार गया तो तुम्हारा सर काट लिया जायेगा.....!

दूसरे दिन क़िले के मैदान में दो शेरों का मुक़ाबला देखने बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी! औरंगज़ेब बादशाह भी ठीक समय पर आकर अपने सिंहासन पर बैठ गया! राजा यशवंत सिंह अपने चौदह वर्ष के पुत्र पृथ्वी सिंह के साथ आये! उन्हें देखकर बादशाह ने पूछा-- आपका शेर कहाँ है? यशवंत सिंह बोले- मैं अपना शेर अपने साथ लाया हूँ! आप केवल लडाई की आज्ञा दीजिये!

बादशाह की आज्ञा से जंगली शेर को लोहे के बड़े पिंजरे में छोड़ दिया गया! यशवंत सिंह ने अपने पुत्र को उस पिंजरे में घुस जाने को कहा! बादशाह एवं वहाँ के लोग हक्के-बक्के रह गए! किन्तु दस वर्ष का निर्भीक बालक पृथ्वी सिंह पिता को प्रणाम करके हँसते-हँसते शेर के पिंजरे में घुस गया! शेर ने पृथ्वी सिंह की ओर देखा! उस तेजस्वी बालक के नेत्रों में देखते ही एकबार तो वह पूंछ दबाकर पीछे हट गया.. लेकिन मुस्लिम सैनिकों द्वारा भाले की नोक से उकसाए जाने पर शेर क्रोध में दहाड़ मारकर पृथ्वी सिंह पर टूट पड़ा! वार बचा कर वीर बालक एक ओर हटा और अपनी तलवार खींच ली! पुत्र को तलवार निकालते हुए देखकर यशवंत सिंह ने पुकारा - बेटा, तू यह क्या करता है? शेर के पास तलवार है क्या जो तू उसपर तलवार चलाएगा? यह हमारे हिन्दू-धर्म की शिक्षाओं के विपरीत है और धर्मयुद्ध नहीं है!

पिता की बात सुनकर पृथ्वी सिंह ने तलवार फेंक दी और निहत्था ही शेर पर टूट पड़ा! अंतहीन से दिखने वाले एक लम्बे संघर्ष के बाद आख़िरकार उस छोटे से बालक ने शेर का जबड़ा पकड़कर फाड़ दिया और फिर पूरे शरीर को चीर दो टुकड़े कर फेंक दिया! भीड़ उस वीर बालक पृथ्वी सिंह की जय-जयकार करने लगी! अपने.. और शेर के ख़ून से लथपथ पृथ्वी सिंह जब पिंजरे से बाहर निकला तो पिता ने दौड़कर अपने पुत्र को छाती से लगा लिया।


    



महर्षि वाल्मीकि जीवनी

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महर्षि वाल्मीकि को प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों कि श्रेणी में प्रमुख स्थान प्राप्त है। वह संस्कृत भाषा के आदि कवि और हिन्दुओं के आदि काव्य 'रामायण' के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध हैं।

                                 

महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिए इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है। उपनिषद के विवरण के अनुसार यह भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे।

महर्षि बनने से पूर्व वाल्मीकि रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे तथा परिवार के पालन हेतु लोगों को लूटा करते थे। एक बार उन्हें निर्जन वन में नारद मुनि मिले, तो रत्नाकर ने उन्हें लूटने का प्रयास किया। तब नारद जी ने रत्नाकर से पूछा कि- तुम यह निम्न कार्य किसलिए करते हो, इस पर रत्नाकर ने जवाब दिया कि अपने परिवार को पालने के लिए।

इस पर नारद ने प्रश्न किया कि तुम जो भी अपराध करते हो और जिस परिवार के पालन के लिए तुम इतने अपराध करते हो, क्या वह तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार होंगे। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए रत्नाकर, नारद को पेड़ से बांधकर अपने घर गए। वहां जाकर वह यह जानकर स्तब्ध रह गए कि परिवार का कोई भी व्यक्ति उसके पाप का भागीदार बनने को तैयार नहीं है। लौटकर उन्होंने नारद के चरण पकड़ लिए।

तब नारद मुनि ने कहा कि- हे रत्नाकर, यदि तुम्हारे परिवार वाले इस कार्य में तुम्हारे भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों उनके लिए यह पाप करते हो। इस तरह नारद जी ने इन्हें सत्य के ज्ञान से परिचित करवाया और उन्हें राम-नाम के जप का उपदेश भी दिया था, परंतु वह 'राम' नाम का उच्चारण नहीं कर पाते थे। तब नारद जी ने विचार करके उनसे मरा-मरा जपने के लिए कहा और मरा रटते-रटते यही 'राम' हो गया और निरंतर जप करते-करते हुए वह ऋषि वाल्मीकि बन गए।



महर्षि बाल्मीकि के अनमोल वचन



जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है.

2 सीते, पिता की सेवा करना जैसा कल्याणकारी है, वैसा उत्तम साधन न सत्य है, न दान-सम्मान है और न प्रचुर दक्षिणा वाले ही है.
3 पिताजी, आप अधिक सोच-विचार न कीजिए. धन धान्य, राष्ट्र और प्रजा सहित यह धरती आप भरत को दे दीजिए, मुझे राज नहीं चाहिए.
4 विवाह योग्य स्त्रियाँ प्रत्येक देश में मिल सकती हैं. मित्र-परिजन भी प्रत्येक देश में प्राप्त हो सकते हैं. किन्तु मुझे कोई ऐसा देश दिखाई नहीं पड़ता, जहाँ सहोदर भाई मिल सकते हों