श्री कृष्ण स्तुति
🕉️ श्री कृष्ण स्तुति 🕉️
श्रीनिवासा गोविंदा,श्री वेंकटेशा गोविंदा,
भक्त वत्सल गोविंदा ,भागवता प्रिय गोविंदा ।।
नित्य निर्मल गोविंदा,नीलमेघ श्याम गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
पुराण पुरुषा गोविंदा, पुंडरीकाक्ष गोविंदा,
नंद नंदना गोविंदा,नवनीत चोरा गोविंदा ।।
पशुपालक श्री गोविंदा,पाप विमोचन गोविंदा,
दुष्ट संहार गोविंदा,दुरित निवारण गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा,
शिष्ट परिपालक गोविंदा,कष्ट निवारण गोविंदा ।।
वज्र मकुटधर गोविंदा,वराह मूर्ती गोविंदा,
गोपीजन लोल गोविंदा, गोवर्धनोद्धार गोविंदा ।।
दशरध नंदन गोविंदा, दशमुख मर्धन गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
पक्षि वाहना गोविंदा, पांडव प्रिय गोविंदा,
मत्स्य कूर्म गोविंदा,मधु सूधना हरि गोविंदा ।।
वराह नृसिंह गोविंदा,वामन भृगुराम गोविंदा,
बलरामानुज गोविंदा, बौद्ध कल्किधर गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा,
वेणु गान प्रिय गोविंदा, वेंकट रमणा गोविंदा ।।
सीता नायक गोविंदा, श्रितपरिपालक गोविंदा,
दरिद्रजन पोषक गोविंदा,धर्म संस्थापक गोविंदा ।।
अनाथ रक्षक गोविंदा, आपध्भांदव गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
शरणागतवत्सल गोविंदा, करुणा सागर गोविंदा,
कमल दलाक्षा गोविंदा, कामित फलदात गोविंदा ।।
पाप विनाशक गोविंदा, पाहि मुरारे गोविंदा,
श्रीमुद्रांकित गोविंदा, श्रीवत्सांकित गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा, गोकुल नंदन गोविंदा,
धरणी नायक गोविंदा,दिनकर तेजा गोविंदा ।।
पद्मावती प्रिय गोविंदा,प्रसन्न मूर्ते गोविंदा,
अभय हस्त गोविंदा,अक्षय वरदा गोविंदा ।।
शंख चक्रधर गोविंदा,सारंग गदाधर गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
विराज तीर्थ गोविंदा,विरोधि मर्धन गोविंदा,
सालग्राम हर गोविंदा,सहस्र नाम गोविंदा ।।
लक्ष्मी वल्लभ गोविंदा, लक्ष्मणाग्रज गोविंदा,
कस्तूरि तिलक गोविंदा, कांचनांबरधर गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा,
गरुड वाहना गोविंदा,गजराज रक्षक गोविंदा ।।
वानर सेवित गोविंदा,वारथि बंधन गोविंदा,
एडु कोंडल वाडा गोविंदा, एकत्व रूपा गोविंदा ।।
रामकृष्णा गोविंदा, रघुकुल नंदन गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा, गोकुल नंदन गोविंदा ।।
प्रत्यक्ष देव गोविंदा,परम दयाकर गोविंदा,
वज्र मुकुटदर गोविंदा,वैजयंति माल गोविंदा ।।
वड्डी कासुल वाडा गोविंदा, वासुदेव तनया गोविंदा,
बिल्वपत्रार्चित गोविंदा,भिक्षुक संस्तुत गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा,
स्त्री पुं रूपा गोविंदा, शिवकेशव मूर्ति गोविंदा ।।
ब्रह्मानंद रूपा गोविंदा,भक्त तारका गोविंदा,
नित्य कल्याण गोविंदा,नीरज नाभा गोविंदा ।।
हति राम प्रिय गोविंदा,हरि सर्वोत्तम गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
जनार्धन मूर्ति गोविंदा,जगत् साक्षि रूपा गोविंदा,
अभिषेक प्रिय गोविंदा, अभन्निरासाद गोविंदा ।।
नित्य शुभात गोविंदा,निखिल लोकेशा गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।
आनंद रूपा गोविंदा,अध्यंत रहित गोविंदा,
इहपर दायक गोविंदा,इपराज रक्षक गोविंदा ।।
पद्म दलक्ष गोविंदा,पद्मनाभा गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
तिरुमल निवासा गोविंदा, तुलसी वनमाल गोविंदा,
शेषशायी गोविंदा, शेषाद्रिनीलय गोविंदा ।।
श्री श्रीनिवासा गोविंदा, श्री वेंकटेशा गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा, गोकुल नंदन गोविंदा ।।
।। श्री राधे कृष्ण:शरणं ममः ।।
श्रीनिवासा गोविंदा,श्री वेंकटेशा गोविंदा,
भक्त वत्सल गोविंदा ,भागवता प्रिय गोविंदा ।।
नित्य निर्मल गोविंदा,नीलमेघ श्याम गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
पुराण पुरुषा गोविंदा, पुंडरीकाक्ष गोविंदा,
नंद नंदना गोविंदा,नवनीत चोरा गोविंदा ।।
पशुपालक श्री गोविंदा,पाप विमोचन गोविंदा,
दुष्ट संहार गोविंदा,दुरित निवारण गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा,
शिष्ट परिपालक गोविंदा,कष्ट निवारण गोविंदा ।।
वज्र मकुटधर गोविंदा,वराह मूर्ती गोविंदा,
गोपीजन लोल गोविंदा, गोवर्धनोद्धार गोविंदा ।।
दशरध नंदन गोविंदा, दशमुख मर्धन गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
पक्षि वाहना गोविंदा, पांडव प्रिय गोविंदा,
मत्स्य कूर्म गोविंदा,मधु सूधना हरि गोविंदा ।।
वराह नृसिंह गोविंदा,वामन भृगुराम गोविंदा,
बलरामानुज गोविंदा, बौद्ध कल्किधर गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा,
वेणु गान प्रिय गोविंदा, वेंकट रमणा गोविंदा ।।
सीता नायक गोविंदा, श्रितपरिपालक गोविंदा,
दरिद्रजन पोषक गोविंदा,धर्म संस्थापक गोविंदा ।।
अनाथ रक्षक गोविंदा, आपध्भांदव गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
शरणागतवत्सल गोविंदा, करुणा सागर गोविंदा,
कमल दलाक्षा गोविंदा, कामित फलदात गोविंदा ।।
पाप विनाशक गोविंदा, पाहि मुरारे गोविंदा,
श्रीमुद्रांकित गोविंदा, श्रीवत्सांकित गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा, गोकुल नंदन गोविंदा,
धरणी नायक गोविंदा,दिनकर तेजा गोविंदा ।।
पद्मावती प्रिय गोविंदा,प्रसन्न मूर्ते गोविंदा,
अभय हस्त गोविंदा,अक्षय वरदा गोविंदा ।।
शंख चक्रधर गोविंदा,सारंग गदाधर गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
विराज तीर्थ गोविंदा,विरोधि मर्धन गोविंदा,
सालग्राम हर गोविंदा,सहस्र नाम गोविंदा ।।
लक्ष्मी वल्लभ गोविंदा, लक्ष्मणाग्रज गोविंदा,
कस्तूरि तिलक गोविंदा, कांचनांबरधर गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा,
गरुड वाहना गोविंदा,गजराज रक्षक गोविंदा ।।
वानर सेवित गोविंदा,वारथि बंधन गोविंदा,
एडु कोंडल वाडा गोविंदा, एकत्व रूपा गोविंदा ।।
रामकृष्णा गोविंदा, रघुकुल नंदन गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा, गोकुल नंदन गोविंदा ।।
प्रत्यक्ष देव गोविंदा,परम दयाकर गोविंदा,
वज्र मुकुटदर गोविंदा,वैजयंति माल गोविंदा ।।
वड्डी कासुल वाडा गोविंदा, वासुदेव तनया गोविंदा,
बिल्वपत्रार्चित गोविंदा,भिक्षुक संस्तुत गोविंदा ।।
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा,
स्त्री पुं रूपा गोविंदा, शिवकेशव मूर्ति गोविंदा ।।
ब्रह्मानंद रूपा गोविंदा,भक्त तारका गोविंदा,
नित्य कल्याण गोविंदा,नीरज नाभा गोविंदा ।।
हति राम प्रिय गोविंदा,हरि सर्वोत्तम गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
जनार्धन मूर्ति गोविंदा,जगत् साक्षि रूपा गोविंदा,
अभिषेक प्रिय गोविंदा, अभन्निरासाद गोविंदा ।।
नित्य शुभात गोविंदा,निखिल लोकेशा गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।
आनंद रूपा गोविंदा,अध्यंत रहित गोविंदा,
इहपर दायक गोविंदा,इपराज रक्षक गोविंदा ।।
पद्म दलक्ष गोविंदा,पद्मनाभा गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा,गोकुल नंदन गोविंदा ।।
तिरुमल निवासा गोविंदा, तुलसी वनमाल गोविंदा,
शेषशायी गोविंदा, शेषाद्रिनीलय गोविंदा ।।
श्री श्रीनिवासा गोविंदा, श्री वेंकटेशा गोविंदा,
गोविंदा हरि गोविंदा, गोकुल नंदन गोविंदा ।।
।। श्री राधे कृष्ण:शरणं ममः ।।
एक जज अपनी पत्नी को क्यों दे रहे हैं तलाक???
एक जज अपनी पत्नी को क्यों दे रहे हैं तलाक???
ये एक ऐसी कहानी हैं जिससे हमें माँ क्या है ?? हमें पता चलता हैं ।कल रात एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी के कई पहलुओं को छू लिया।
दोस्त : 👱 करीब 7 बजे होंगे,शाम को मोबाइल बजा उठाया तो उधर से रोने की आवाज मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या ?
भाभी जी : 👩आप कहाँ हैं??? और कितनी देर में आ सकते हैं?
दोस्त : 👱 आप परेशानी बताइये और "भाई साहब कहाँ हैं...?माताजी किधर हैं..?" "आखिर हुआ क्या...?"
लेकिन उधर से केवल एक रट कि "आप आ जाइए"*, मैंने आश्वाशन दिया कि *कम से कम एक घंटा पहुंचने में लगेगा*. जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा;
देखा तो भाई साहब [हमारे मित्र जो जज हैं] सामने बैठे हुए हैं;
भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं 12 साल का बेटा भी परेशान है; 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है।
मैंने भाई साहब से पूछा कि आखिर क्या बात है ???
भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे ।
भाभी जी :👩भाभी जी ने कहा ये देखिये तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार करा के लाये हैं , मुझे तलाक देना चाहते हैं।
दोस्त : 👱 मैंने पूछा - ये कैसे हो सकता है???. इतनी अच्छी फैमिली है. 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है। प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है लेकिन मैंने बच्चों से पूछा ? दादी किधर है?
बच्चे : 👫 बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दिया है।
दोस्त : 👱 मैंने घर के नौकर से कहा। मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ।कुछ देर में चाय आई ,भाई साहब को बहुत कोशिशें कीं चाय पिलाने की लेकिन उन्होंने नहीं पी और कुछ ही देर में वो एक मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे
जज : 🕵️ बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है. मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ। पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली कि मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती ना तो ये उनसे बात करती थी और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे । रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी नौकर तक भी अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे
माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट कर दे।
मैंने बहुत कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की,जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी दूसरों के घरों में काम करके मुझे पढ़ाया. मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं। उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ पिछले 3 दिनों से मैं अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ, उसने केवल मेरे लिए उठाये। मुझे आज भी याद है जब मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था. माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती
एक बार माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था*. उसका शरीर गर्म था, तप रहा था। मैंने कहा माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है।लोगों से उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया मुझे ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं कि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए। कहते रोने लगे..और बोले--""जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे।हम जिनके शरीर के टुकड़े हैं, आज हम उनको ऐसे लोगों के हवाले कर आये, जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते।जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो *"मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ। आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और *माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ।जब मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे ।इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ।सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले करके उस ओल्ड ऐज होम में रहूँगा। कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ।और अगर इतना सब कुछ कर के माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है,तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा।माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी।माँ की तरह तकलीफ तो नहीं होगी ।जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे। बातें करते करते रात के 12:30 हो गए।
दोस्त : 👱 मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा। उनके भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि से भरे हुए थे; मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे।भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे. बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए ,बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ, चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब,
भाई साहब ने कहा मैं जज हूँ।
उस चौकीदार ने कहा:-👮
जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये,औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब। इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया ।
वार्डन : 💁 अन्दर से एक महिला आई जो वार्डन थी.
उसने बड़े कातर शब्दों में कहा "2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..?"
दोस्त : 👱 मैंने सिस्टर से कहा आप विश्वास करिये, ये लोग बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं ।अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं. कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ ।
केवल एक फ़ोटो जिसमें पूरी फैमिली है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए लेकिन जब मैंने कहा हम लोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी ।आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए।उनकी भी आँखें नम थीं।कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई. पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये. किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये।सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि *शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे।
लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की भावनाओं को अपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे। घर आते-आते करीब 3:45 हो गया.
भाभी जी : 👩 भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है; ये समझ गई थी
दोस्त : 👱 मैं भी चल दिया., लेकिन रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे।
माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें , अगर वह कमज़ोर हो गई तो हमारी संस्कृति की ""रीढ़ कमज़ोर"" हो जाएगी* , बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं
ये एक ऐसी कहानी हैं जिससे हमें माँ क्या है ?? हमें पता चलता हैं ।कल रात एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी के कई पहलुओं को छू लिया।
दोस्त : 👱 करीब 7 बजे होंगे,शाम को मोबाइल बजा उठाया तो उधर से रोने की आवाज मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या ?
भाभी जी : 👩आप कहाँ हैं??? और कितनी देर में आ सकते हैं?
दोस्त : 👱 आप परेशानी बताइये और "भाई साहब कहाँ हैं...?माताजी किधर हैं..?" "आखिर हुआ क्या...?"
लेकिन उधर से केवल एक रट कि "आप आ जाइए"*, मैंने आश्वाशन दिया कि *कम से कम एक घंटा पहुंचने में लगेगा*. जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा;
देखा तो भाई साहब [हमारे मित्र जो जज हैं] सामने बैठे हुए हैं;
भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं 12 साल का बेटा भी परेशान है; 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है।
मैंने भाई साहब से पूछा कि आखिर क्या बात है ???
भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे ।
भाभी जी :👩भाभी जी ने कहा ये देखिये तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार करा के लाये हैं , मुझे तलाक देना चाहते हैं।
दोस्त : 👱 मैंने पूछा - ये कैसे हो सकता है???. इतनी अच्छी फैमिली है. 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है। प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है लेकिन मैंने बच्चों से पूछा ? दादी किधर है?
बच्चे : 👫 बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दिया है।
दोस्त : 👱 मैंने घर के नौकर से कहा। मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ।कुछ देर में चाय आई ,भाई साहब को बहुत कोशिशें कीं चाय पिलाने की लेकिन उन्होंने नहीं पी और कुछ ही देर में वो एक मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे
जज : 🕵️ बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है. मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ। पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली कि मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती ना तो ये उनसे बात करती थी और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे । रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी नौकर तक भी अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे
माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट कर दे।
मैंने बहुत कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की,जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी दूसरों के घरों में काम करके मुझे पढ़ाया. मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं। उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ पिछले 3 दिनों से मैं अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ, उसने केवल मेरे लिए उठाये। मुझे आज भी याद है जब मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था. माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती
एक बार माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था*. उसका शरीर गर्म था, तप रहा था। मैंने कहा माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है।लोगों से उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया मुझे ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं कि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए। कहते रोने लगे..और बोले--""जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे।हम जिनके शरीर के टुकड़े हैं, आज हम उनको ऐसे लोगों के हवाले कर आये, जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते।जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो *"मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ। आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और *माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ।जब मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे ।इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ।सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले करके उस ओल्ड ऐज होम में रहूँगा। कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ।और अगर इतना सब कुछ कर के माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है,तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा।माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी।माँ की तरह तकलीफ तो नहीं होगी ।जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे। बातें करते करते रात के 12:30 हो गए।
दोस्त : 👱 मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा। उनके भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि से भरे हुए थे; मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे।भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे. बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए ,बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ, चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब,
भाई साहब ने कहा मैं जज हूँ।
उस चौकीदार ने कहा:-👮
जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये,औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब। इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया ।
वार्डन : 💁 अन्दर से एक महिला आई जो वार्डन थी.
उसने बड़े कातर शब्दों में कहा "2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..?"
दोस्त : 👱 मैंने सिस्टर से कहा आप विश्वास करिये, ये लोग बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं ।अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं. कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ ।
केवल एक फ़ोटो जिसमें पूरी फैमिली है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए लेकिन जब मैंने कहा हम लोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी ।आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए।उनकी भी आँखें नम थीं।कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई. पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये. किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये।सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि *शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे।
लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की भावनाओं को अपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे। घर आते-आते करीब 3:45 हो गया.
भाभी जी : 👩 भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है; ये समझ गई थी
दोस्त : 👱 मैं भी चल दिया., लेकिन रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे।
माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें , अगर वह कमज़ोर हो गई तो हमारी संस्कृति की ""रीढ़ कमज़ोर"" हो जाएगी* , बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं
माँ के गर्भ मैं नो महीनों का सफर : लेनार्ट निल्सन स्वीडन
माँ बनना हर औरत के लिए दुनिया का सबसे खूबसूरत लम्हा होता है। जब उसे पाता चलता है । वह गर्भवती है तो ये पल सबसे पहले वो अपने पति के साथ साझा करती हैं। औरत गर्भवती होती है , तो ये पल सिर्फ उसके लिए ही खुशियों से भरे नहीं होते, बल्कि परिवार और विशेषकर पिता के लिए भी ये पल आनंद से भरे होते हैं। 1965 की बात है ,तभी एक वैज्ञानिक ने लेनार्ट निल्सन ने उन्होंने उन औरतों को ध्यान में रख कर जो मां बनने वाली हैं, किताब छापी। जिसका नाम A child is Born था । इस किताब में कई डॉक्टर्स ने भी अपने इनपुट दिए थे। इसमें कुछ बहुत ही खास था, दुनिया पहली बार गर्भ के अंदर भ्रूण को देख पा रही थी। वो अजन्मे बच्चे की फोटो गर्भ के अंदर से खींच लाए । उन्होंने मैक्रो लेंसेज,स्कैनिंग इलेक्ट्रोन माइक्रोस्कोपऔर एंडोस्कोपिक कैमरों की मदद ली थी।तस्वीरों में चीजों को कई गुना बड़ा कर दिखाया।इस किताब को लाने के पीछे निल्सन का मकसद उन भ्रांतियों और मिथकों को तोड़ना भी था जो प्रेग्नेंसी के साथ जुड़े होते हैं।
लेनार्ट निल्सन स्वीडन के फोटोग्राफर और वैज्ञानिक हुए हैं. कहां पढ़ते क्या खाते थे जैसी बातें छोड़ें. तो बारह साल की उम्र में उनके हाथ में कैमरा पकड़ा दिया गया था. 16 बरस की उम्र में एक डॉक्यूमेंट्री देख उन्हें माइक्रोस्कोपी में दिलचस्पी हुई. 25 साल के होते-होते वो एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर बन चुके थे।
30 अप्रैल 1965 को लाइफ मैगजीन ने अपना जो इश्यू निकाला. उसमें The Drama of Life Before Birthशीर्षक से कवर स्टोरी थी. उस इश्यू में इसी किताब से सोलह फोटोज ली गईं थीं. गर्भ के अंदर की फोटोज के प्रति जनता का रिएक्शन कुछ ऐसा था कि मैगजीन की अस्सी लाख प्रतियां चार ही दिनों में बिक गईं. इस सबके बाद निल्सन को अमेरिकन नेशनल प्रेस एसोसिएशन पिक्चर ऑफ द ईयर अवार्ड मिला था।लेनार्ट को इस किताब को पूरा करने के लिए पूरे 12 साल लगे थे. इन तमाम फोटोज के लिए वो 1953 से मेहनत कर रहे थे।
प्रथम मास :
दूसरा मास :
तिसरा मास :
चौथा मास:
लेनार्ट निल्सन स्वीडन के फोटोग्राफर और वैज्ञानिक हुए हैं. कहां पढ़ते क्या खाते थे जैसी बातें छोड़ें. तो बारह साल की उम्र में उनके हाथ में कैमरा पकड़ा दिया गया था. 16 बरस की उम्र में एक डॉक्यूमेंट्री देख उन्हें माइक्रोस्कोपी में दिलचस्पी हुई. 25 साल के होते-होते वो एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर बन चुके थे।
30 अप्रैल 1965 को लाइफ मैगजीन ने अपना जो इश्यू निकाला. उसमें The Drama of Life Before Birthशीर्षक से कवर स्टोरी थी. उस इश्यू में इसी किताब से सोलह फोटोज ली गईं थीं. गर्भ के अंदर की फोटोज के प्रति जनता का रिएक्शन कुछ ऐसा था कि मैगजीन की अस्सी लाख प्रतियां चार ही दिनों में बिक गईं. इस सबके बाद निल्सन को अमेरिकन नेशनल प्रेस एसोसिएशन पिक्चर ऑफ द ईयर अवार्ड मिला था।लेनार्ट को इस किताब को पूरा करने के लिए पूरे 12 साल लगे थे. इन तमाम फोटोज के लिए वो 1953 से मेहनत कर रहे थे।
फेलोपियन ट्यूब में स्पर्म
प्रथम मास से नौंवे मास तक माँ के गर्भ में बच्चे का विकास:
प्रथम मास :
- शिशु एक पानी भरी थैली में होता है
- उसकी लंबाई मात्र 0.6 से.मी. होती है।
- शिशु की लंबाई व वजन में तेजी से बढ़ोतरी होती है।
दूसरा मास :
- श्रवण और दृष्टि इंद्रिया विकसित होने लगती हैं। पलकें बंद रहती हैं।
- चेहरे के नैन-नक्श बनने लगते हैं।
- हाथ-पैर की उंगलियां व नाखून बनने लगते हैं।
- दिमाग का विकास होने लगता है ।
- अमाशय, यकृत, गुर्दे का विकास होता है।
- शिशु की लंबाई करीब 3 से.मी. और वजन 1 ग्राम होता है
- आकार बहुत छोटा होने से शिशु की हलचल महसूस नहीं की जा सकती है।
- आंखें बन चुकी होती हैं, लेकिन पलकें अभी भी बंद होती हैं।
- बाजू, हाथ, उंगलियां, पैर, पंजे और पैरों की उंगलियां व नाखून इस महीने में विकसित होते हैं।
- शिशु के वोकल कॉर्डस बन चुके होते हैं। शिशु सिर ऊपर उठा सकता है।
- यदि गर्भाशय के अंदर झांका जाए तो बाहरी जननांग बनते हुए दिख सकते हैं।
- शिशु की लंबाई व वजन में तेजी से बढ़ोतरी होती है।
- बाल आने लगते हैं और सिर पर बाल दिखने लगते हैं।
- भौहें और पलक के बाल आने लगते हैं।
- चमड़ी वसायुक्त होने लगती
- जब खून दौड़ने के लिए नलियां बनना तैयार होने लगती हैं.
- शिशु कुछ समय गतिशील रहता है तो कुछ समय शांत।
- एक सफेद चिकना स्त्राव शिशु की त्वचा की एम्नीओटिक पानी से रक्षा करता है।
- उसकी त्वचा पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। त्वचा का रंग लाल होता है।
- त्वचा ज्यादा वसायुक्त बनती है।
- इस महीने शिशु की लंबाई करीब 25 से 30 से.मी. और वजन करीब 200 से 450 ग्राम होती है।
- भ्रूण जो बाहर की आवाजें सुन सकता है
छठा मास :
- त्चचा अभी झुर्री भरी और लाल है।
- आंखों का विकास पूरा हो जाता है।
- पलकें खुल सकती हैं। बंद हो सकती हैं।
- शिशु रो सकता है, लात मार सकता है। उसे हिचकी आ सकती है।
सातवा मास :
- यदि कोई गर्भवती के पेट पर कान रखे तो शिशु की धड़कन सुनाई दे सकती है
- शिशु माँ के गर्भ में अंगूठा चूसता है।
- इस महीने शिशु की लंबाई 32-42 से.मी. होती है। वजन करीब 1100 ग्राम से 1350 ग्राम होता है।
अठवांं मास :
- शिशु की आंखें खुलती हैं।
- जागने-सोने की खास आदत के साथ शिशु सक्रिय रहता है।
- इस महीने शिशु का वजन करीब 2000 - 2300 ग्राम है और लंबाई 41-45 से.मी है।
नौवां मास :
- शिशु का सिर नीचे व पैर ऊपर की तरह होते हैं।
- बच्चा ज्यादा शांत रहता है।
- इस महीने शिशु की लंबाई 50 से.मी. है और वजन 3200-3400 ग्राम है।
- बच्चा मा के गर्भ से निकलने का इंतजार करता है।
आजादी की कहानी
भारत को आजादी कैसे मिली ?
भारत को आजादी उतनी आसानी से नहीं मिली है। इस आजादी के लिए हमारे देश के वीर सपूत ने खून पसीना एक कर दिया है ।अंग्रेजो से भारत को छुड़ाने के लिए न जाने कितने वीर सपूत ने अपनी जान की बाजी लगा दी कई स्वतंत्रा सेनानियों ने हंसते-हंसते अपने प्राण भारत मां की आजादी के लिए न्योछावर कर दिए । सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत लंबे समय तक अंग्रेजों का गुलाम रहा लेकिन यहाँ की माता ,बहने ओर भारतवासियो की एक सोच एक संकल्प और एक विश्वास ने हमें उनसे आजाद करा दिया। देखिय क्या संकप था ।15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद हुआ था ।
"आग मेरे सीने में हो या तेरे सीने में, बेटा मेरा हो या तेरा, देश स्वतंत्रता होना चाहिये "
आज हम अपने घरों में जितने शुकून से वह सब हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की देन है यदि वह स्वतंत्रा सेनानी (बटुकेश्वर दत्त ,भगत सिंह चंद्रशेखर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, श्रीमती सरोजिनी नायडू ,मातंगिनी हाजरा और सिस्टर निवेदि) घर में बैठे-बैठे और आजादी की पहल ना करते तो आज शायद हम किसी अंग्रेज के गुलाम बने होते।
मंगल पाण्डेय ने की क्रांति की शुरुआत :
कहा जाता है कि भारत स्वतंत्रता संग्राम में 1857 की क्रांति का बहुत ही बड़ा महत्व है यह लड़ाई अंग्रेजों से आजादी की पहली लड़ाई मानी जाती है और यह लड़ाई पूर्ण रूप से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध में की गई थी और इस क्रांति का आरंभ किया था मंगल पांडे ने मंगल पांडे ने ही इस क्रांति की शुरुआत की थी मंगल पांडे एक ब्रिटिश रेजीमेंट सैनिक थे गाए कारतूस में गाय के मांस और चर्बी का इस्तेमाल करने से वह मना करते थे उसके खिलाफ गाय को बचाने के लिए उन्होंने यह बगावत शुरू की इस बगावत में उन्होंने बैरकपुर रेजीमेंट के एक अवसर को मौत के घाट उतार दिया था इस घटना के बाद हर भारतीय के मन में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी लेकिन ब्रिटिश लोगों ने मंगल पांडे का जीवन का अंत कर दिया उन्हें फांसी की सजा दे दी वहां आजादी की लड़ाई लड़ते लड़ते शहीद हो गए।
15 अगस्त का दिन हम आजादी का दिन मनाते हैं इसमें हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का खून मिला हुआ है इस आजादी में हमारे सेनानियों के रक्त की एक एक बूंद शामिल है जो कहते थे हम अंग्रेजों को भारत से खदेड़ देंगे और उन्होंने ऐसा किया जिसकी बदौलत आज हम आजादी का जश्न मना रहे हैं. भारत की आजादी के लिए कई लोगों ने अपनी जान की बाजी लगा दी ब्रिटिश हुकूमत को भारत से खदेड़ने के लिए उन्होंने जी जान लगा दिया 1947 का वह दिन आज भी जब किसी को याद आता है तो हम गर्व से अपना सीना चौड़ा कर भारत मां की जय बोलते हैं क्योंकि 15 अगस्त 1947 का यह वह दिन है जब हमें अंग्रेजों से पूर्ण रूप से आजादी मिली थी।
।।जय हिंद ।।
स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनायें:
भारत माता तेरी गाथा
सबसे ऊँची तेरी शान
तेरे आगे शीश झुकाएं
दें तुझको हम सब सम्मान ।।
चलो फिर से वो नजारा याद कर लें,
शहीदो के दिल में थी जो ज्वाला वो याद कर लें,
जिसमें बहकर आजादी पहुंची थी किनारे पर,
बलिदानियों के खून की वो धारा याद कर लें।।
खुशनसीब हैं जो वतन पर शहीद हुए
जो तिरंगे मैं लिपट कर ज़िन्दगी से आजाद हुये
मर कर भी अमर हो गए वो
जो साधारण मनुष्य से शाहिद की शहादत हो गये।।
हम आजाद हैं, ये आजादी कभी छिनने नहीं देंगे तिरंगे की शान को हम कभी मिटने नहीं देंगे कोई आंख भी उठाएगा जो हिंदुस्तान की तरफ उन आंखों को फिर दुनिया देखने नहीं देंगे।।
चिंगारी आजादी की सुलगी मेरे जश्न में हैं, इन्कलाब की ज्वालाएं लिपटी मेरे बदन में हैं, मौत जहाँ जन्नत हो ये बात मेरे वतन में हैं, कुर्बानी का जज्बा जिन्दा मेरे कफन में हैं।।
सबसे ऊँची तेरी शान
तेरे आगे शीश झुकाएं
दें तुझको हम सब सम्मान ।।
आजादी की कभी शाम न होने देंगे,
शहीदों की कुर्बानी बदनाम न होने देंगे,
बची हो जब तक एक भी बूंद लहू की रगों में,
तब तक भारत मां का आंचल नीलाम न होने देंगे।।
शहीदों की कुर्बानी बदनाम न होने देंगे,
बची हो जब तक एक भी बूंद लहू की रगों में,
तब तक भारत मां का आंचल नीलाम न होने देंगे।।
चलो फिर से वो नजारा याद कर लें,
शहीदो के दिल में थी जो ज्वाला वो याद कर लें,
जिसमें बहकर आजादी पहुंची थी किनारे पर,
बलिदानियों के खून की वो धारा याद कर लें।।
आजादी की कभी शाम न होने देंगे,
शहीदों की कुर्बानी बदनाम न होने देंगे,
बची हो जब तक एक भी बूंद लहू की रगों में,
तब तक भारत मां का आंचल नीलाम न होने देंगे।।
शहीदों की कुर्बानी बदनाम न होने देंगे,
बची हो जब तक एक भी बूंद लहू की रगों में,
तब तक भारत मां का आंचल नीलाम न होने देंगे।।
दुश्मनी के लिए यह याद नहीं रहता
वतन मेरा दोस्ती के लिये कुर्बान है
नफरत पाले कोई उड़ान नही भरता
दिलों मैं चाहत ही मेरे वतन की शान है।।
खुशनसीब हैं जो वतन पर शहीद हुए
जो तिरंगे मैं लिपट कर ज़िन्दगी से आजाद हुये
मर कर भी अमर हो गए वो
जो साधारण मनुष्य से शाहिद की शहादत हो गये।।
हम आजाद हैं, ये आजादी कभी छिनने नहीं देंगे तिरंगे की शान को हम कभी मिटने नहीं देंगे कोई आंख भी उठाएगा जो हिंदुस्तान की तरफ उन आंखों को फिर दुनिया देखने नहीं देंगे।।
चिंगारी आजादी की सुलगी मेरे जश्न में हैं, इन्कलाब की ज्वालाएं लिपटी मेरे बदन में हैं, मौत जहाँ जन्नत हो ये बात मेरे वतन में हैं, कुर्बानी का जज्बा जिन्दा मेरे कफन में हैं।।
सिर्फ एक ही इंसान की वजह से भारत बना अंग्रेजोंं का गुलाम :रॉबर्ट क्लाइव
सिर्फ एक ही इंसान की वजह से भारत बना अंग्रेजोंं का गुलाम : रॉबर्ट क्लाइव
भारत देश के जो हालत थे उसके जिम्मेदार पहले तो अंग्रेज थे, जिन्होंने भारत देश पर 200 सालों तक राज कर भारत को लूटा था और दूसरे लोग वो है जिन्हें चुनकर हम भारत की राजनीति में लाये थे। रॉबर्ट क्लाइव यह वही शख्स है जिसने भारत में अंग्रेजो की को रहा दिखाई । ईस्ट इंडिया कंपनी का एजेंट बनकर 1744 में क्लाइव पहली बार इंग्लैंड से मुंबई आया था. उस समय जहाज से भारत आने में ही करीब एक साल लग जाता था. इस एक साल की यात्रा के दौरान ही क्लाइव ने पुर्तगाल की भाषा अच्छे से सीख ली।
उस समय भारत के मुग़ल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु हो चुकी थी जिससे साम्राज्य कमजोर हो चुका था। उस समय कुछ देश (फ़्रांस, पुर्तगाल, ब्रिटेन )की नज़र भारत पर बनी थी। क्लाइव चालाक और अति क्रूर किस्म का एक व्यक्ति था । और भारत में आते ही उसने अपनी चाले चली जिसमे वह कामयाब भी हो गया और वह अपने सीनियर्स की नजरो में आ गया और ब्रिटिश सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर तैनात हो गया।1756 के समय में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला थे।कलकत्ता पर पूर्ण नवाब का कब्ज़ा था. लेकिन नवाब के सेनापति मीर जाफ़र ने गद्दारी और चालाकी से नवाब को हरवा दिया । क्लाइव और मीर जाफर के बीच एक समझौता हुआ 21 जून 1757 को प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला और क्लाइव की सेनायें एक दूसरे के आमने-सामने थी। पूरे युद्ध में नवाब की फौज अंग्रेजो पर भारी पड़ रही थी. मीर जाफर जैसा गद्दार के साथ होने से तो हारना निश्चित था. नवाब की हार के दो कारण थे पहला तो ख़राब मौसम और बारिश जिस कारण तोपों का बारूद ख़राब हो गया. दूसरा था मीर जाफर जो सेना के एक बहुत बड़े हिस्से को जंग के मैदान से बहुत दूर ले गया।
इस जीत के साथ ही अंग्रेजो को बंगाल पर पूर्ण कब्ज़ा कर लिया. 1764 में बक्सर की लड़ाई में भी रॉबर्ट क्लाइव ने चालाकी और धोखेबाजी ने जीत दर्ज कर ली. क्लाइव ने कमजोर शासक पर अपनी नजर साधी और उन्हें अपना निशाना बनाया. इलाहाबाद की संधि में क्लाइव ने छल कपट की निति का प्रयोग किया. उस समय बंगाल ब्रिटेन से काफी अमीर था. कहा जाता है कि जब क्लाइव ब्रिटेन आया तो वह पूरे यूरोप का सबसे अमीर इंसान था.
भारत देश को बर्बाद करने में क्लाइव का अहम योगदान था, उसकी चालाक नीतियों से ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के दूसरे हिस्सों में अपनी पकड़ बना ली. लोगों को गुलाम बनाकर रखा गया, टेक्स लगाना प्रारंह कर दिया, कृषि की नीतियाँ ऐसी बनाई की किसान ही पूर्ण बर्बाद हो गए. 1770 में बंगाल में अकाल के कारण प्रभावित इलाके के एक करोड़ लोग भूख से तड़पकर मर गए थे।
रॉबर्ट क्लाइव रिटायर होने के बाद जब ब्रिटेन चला गया तो ब्रिटिश संसद में भ्रष्टाचार के आरोप के साथ जितने जुल्म उसने भारत पर किये उससे भी भयंकर उसका अंत हुआ. 1774 में उसने आत्महत्या कर ली
विजया एकादशी
🌸विजया एकादशी🌸
जब भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला, तब भगवान राम अपने भ्राता लक्ष्मण और माता सीता संग पंचवटी में निवास करने लगे थे। उसी समय वह महापापी रावण ने माता सीता का हरण कर लिया।
जब यह घटना श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी जी को पता चला तब अत्यंत दुखी हुए और माता सीता की खोज में वन-वन भटकने लगे। माता सीता की खोज करते हुए भगवान श्री राम व लक्ष्मण जटायु के पास जा पहुंचे जो मरणासन्न अवस्था मे वन था। तब जटायु ने माता सीता के हरण का सारा वृत्तांत सुनाया और भगवान श्रीरामजी की गोद में ही अपने प्राण त्यागकर भगवान के परम धाम की ओर प्रस्थान किया। यह वृतांत सुन भगवान उसी वन आगे बढ़ने लगे कुछ दूर चलने के पश्चात भगवान श्रीराम व लक्ष्मण जब की भेंट सुग्रीवजी से हुई और सुग्रीव जी से मित्रता कर भगवान ने सुग्रीव के जेष्ठ भ्राता बालि का वध किया।
भगवान श्रीराम भक्त हनुमानजी लिये वन मार्ग से आगे बढ़ हनुमान जी से लंका में जाकर माता सीता का पता लगाने कहा हनुमान जी लंका जा माता सीता का पता लगा माता से प्रभु श्रीराम तथा महाराज सुग्रीव की मित्रता का वर्णन सुनाया। वहां से वापस लौट हनुमानजी भगवान श्रीरामचंद्रजी के पास आए और अशोक वाटिका का सारा वृत्तांत प्रभु राम को सुनाने लगे।
सब जानने के बाद भगवान श्रीराम ने सुग्रीव सहित वानरों तथा भालुओं की सेना लेकर लंका की तरफ प्रस्थान करते है। जैसे ही भगवान श्री राम विशाल समुद्र के पास पहुंचते है तो देखते ही की मगरमच्छों से भरा है, यह देखकर भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मणजी से कहते है - हे लक्ष्मण यह समुद्र तो अनेक मगरमच्छों और जीवों से भरा है, इस विशाल समुद्र को कैसे पार करेंगे?
प्रभु की बात सुन लक्ष्मणजी कहते है - भ्राता श्री, आप पुरुषोत्तम आदिपुरुष हैं। आपसे कुछ भी विलुप्त नहीं है। यहाँ से आधा योजन दूरी पर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य मुनि जी का आश्रम है। वे अनेक नाम के ब्रह्माओं के ज्ञाता हैं। वे ही आपकी विजय के उपाय बता सकते हैं |
अपने भाई लक्ष्मण की बात सुन श्रीराम जी वकदाल्भ्य ऋषि के आश्रम में जाते है, वकदाल्भ्य ऋषि को प्रणाम कर श्री राम जी वही बैठ जीते है।
भगवान श्रीराम को देख महर्षि वकदाल्भ्य जी पूछते है - हे श्रीराम, मेरी कुटिया मे आपके चरण पड़े यह मेरा सौभाग्य है मेरी कुटिया आपके आने से पवित्र गई, कृपा कर अपने आने का प्रयोजन बताये !
ऋषिमुनि के वचनों को सुन श्रीरामजी कहते- हे ऋषिवर मैं अपने भ्राता लक्ष्मण और अपनी सेना सहित राक्षसराज रावण की लंका जा उससे युध्द मे परास्त कर अपने अर्धांगिनी सीता को रावण के बंधन से मुक्त कराने हेतु यहा आया हूँ। कृपा कर आप मुझे यह विशाल समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। आपके पास आने का मेरा यही प्रयोजन है।
महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- हे राम! मैं आपको एक अति उत्तम व्रत बतलाता हूं। जिसके करने से आपको विजयश्री अवश्य ही प्राप्त होगी।
भगवान श्री राम जिज्ञासु पूर्ण पूछते है, कैसा व्रत है मुनिवर जिसे करने से विजय की प्राप्ति होती है?
महर्षि वकदाल्भ्य ने कहते है- हे राम, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का उपवास करने से आप समुद्र को पार कर लेंगे और युद्ध में भी आपकी विजय होगी। हे मर्यादा पुरुषोत्तम! इस उपवास के लिए दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश ले। उस कलश को जल से भरकर तथा उस पर पंच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करें। उस कलश के नीच सात प्रकार के अनाज और ऊपर जौ रखें। उस पर विष्णु की स्वर्ण की प्रतिमा स्थापित कर भगवान श्रीहरि का पूजन करें। द्वादशी के निवृत्त होकर उस कलश को ब्राह्मण को दे दें। हे दशरथनंदन! यदि आप इस व्रत को सेनापतियों के साथ करेंगे तो अवश्य ही विजयश्री की प्राप्ति होगी। मुनि के वचन सुन तब श्रीराम जी ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से राक्षसों के ऊपर विजय प्राप्त की।
श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था- जो इस व्रत का माहात्म्य श्रवण करता है या पढ़ता है उसे वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है।"
भगवान विष्णु का किसी भी रूप में पूजन मानव मात्र की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता है। श्रीराम हालांकि स्वयं विष्णु के अवतार थे, अपितु अपनी लीलाओं के चलते प्राणियों को सद्मार्ग दिखाने के लिए उन्होंने विष्णु भगवान के निमित्त इस व्रत को किया। विजय की इच्छा रखने वाला इस उपवास को करके अनंत फल का भागी बन सकता है।
जब भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला, तब भगवान राम अपने भ्राता लक्ष्मण और माता सीता संग पंचवटी में निवास करने लगे थे। उसी समय वह महापापी रावण ने माता सीता का हरण कर लिया।
जब यह घटना श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी जी को पता चला तब अत्यंत दुखी हुए और माता सीता की खोज में वन-वन भटकने लगे। माता सीता की खोज करते हुए भगवान श्री राम व लक्ष्मण जटायु के पास जा पहुंचे जो मरणासन्न अवस्था मे वन था। तब जटायु ने माता सीता के हरण का सारा वृत्तांत सुनाया और भगवान श्रीरामजी की गोद में ही अपने प्राण त्यागकर भगवान के परम धाम की ओर प्रस्थान किया। यह वृतांत सुन भगवान उसी वन आगे बढ़ने लगे कुछ दूर चलने के पश्चात भगवान श्रीराम व लक्ष्मण जब की भेंट सुग्रीवजी से हुई और सुग्रीव जी से मित्रता कर भगवान ने सुग्रीव के जेष्ठ भ्राता बालि का वध किया।
भगवान श्रीराम भक्त हनुमानजी लिये वन मार्ग से आगे बढ़ हनुमान जी से लंका में जाकर माता सीता का पता लगाने कहा हनुमान जी लंका जा माता सीता का पता लगा माता से प्रभु श्रीराम तथा महाराज सुग्रीव की मित्रता का वर्णन सुनाया। वहां से वापस लौट हनुमानजी भगवान श्रीरामचंद्रजी के पास आए और अशोक वाटिका का सारा वृत्तांत प्रभु राम को सुनाने लगे।
सब जानने के बाद भगवान श्रीराम ने सुग्रीव सहित वानरों तथा भालुओं की सेना लेकर लंका की तरफ प्रस्थान करते है। जैसे ही भगवान श्री राम विशाल समुद्र के पास पहुंचते है तो देखते ही की मगरमच्छों से भरा है, यह देखकर भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मणजी से कहते है - हे लक्ष्मण यह समुद्र तो अनेक मगरमच्छों और जीवों से भरा है, इस विशाल समुद्र को कैसे पार करेंगे?
प्रभु की बात सुन लक्ष्मणजी कहते है - भ्राता श्री, आप पुरुषोत्तम आदिपुरुष हैं। आपसे कुछ भी विलुप्त नहीं है। यहाँ से आधा योजन दूरी पर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य मुनि जी का आश्रम है। वे अनेक नाम के ब्रह्माओं के ज्ञाता हैं। वे ही आपकी विजय के उपाय बता सकते हैं |
अपने भाई लक्ष्मण की बात सुन श्रीराम जी वकदाल्भ्य ऋषि के आश्रम में जाते है, वकदाल्भ्य ऋषि को प्रणाम कर श्री राम जी वही बैठ जीते है।
भगवान श्रीराम को देख महर्षि वकदाल्भ्य जी पूछते है - हे श्रीराम, मेरी कुटिया मे आपके चरण पड़े यह मेरा सौभाग्य है मेरी कुटिया आपके आने से पवित्र गई, कृपा कर अपने आने का प्रयोजन बताये !
ऋषिमुनि के वचनों को सुन श्रीरामजी कहते- हे ऋषिवर मैं अपने भ्राता लक्ष्मण और अपनी सेना सहित राक्षसराज रावण की लंका जा उससे युध्द मे परास्त कर अपने अर्धांगिनी सीता को रावण के बंधन से मुक्त कराने हेतु यहा आया हूँ। कृपा कर आप मुझे यह विशाल समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। आपके पास आने का मेरा यही प्रयोजन है।
महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- हे राम! मैं आपको एक अति उत्तम व्रत बतलाता हूं। जिसके करने से आपको विजयश्री अवश्य ही प्राप्त होगी।
भगवान श्री राम जिज्ञासु पूर्ण पूछते है, कैसा व्रत है मुनिवर जिसे करने से विजय की प्राप्ति होती है?
महर्षि वकदाल्भ्य ने कहते है- हे राम, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का उपवास करने से आप समुद्र को पार कर लेंगे और युद्ध में भी आपकी विजय होगी। हे मर्यादा पुरुषोत्तम! इस उपवास के लिए दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश ले। उस कलश को जल से भरकर तथा उस पर पंच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करें। उस कलश के नीच सात प्रकार के अनाज और ऊपर जौ रखें। उस पर विष्णु की स्वर्ण की प्रतिमा स्थापित कर भगवान श्रीहरि का पूजन करें। द्वादशी के निवृत्त होकर उस कलश को ब्राह्मण को दे दें। हे दशरथनंदन! यदि आप इस व्रत को सेनापतियों के साथ करेंगे तो अवश्य ही विजयश्री की प्राप्ति होगी। मुनि के वचन सुन तब श्रीराम जी ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से राक्षसों के ऊपर विजय प्राप्त की।
श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था- जो इस व्रत का माहात्म्य श्रवण करता है या पढ़ता है उसे वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है।"
भगवान विष्णु का किसी भी रूप में पूजन मानव मात्र की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता है। श्रीराम हालांकि स्वयं विष्णु के अवतार थे, अपितु अपनी लीलाओं के चलते प्राणियों को सद्मार्ग दिखाने के लिए उन्होंने विष्णु भगवान के निमित्त इस व्रत को किया। विजय की इच्छा रखने वाला इस उपवास को करके अनंत फल का भागी बन सकता है।
जया एकादशी
🌸जया एकादशी🌸
एक बार पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या ने माल्यवान नामक गंधर्व को देखा और उस पर मोहित होकर अपने हाव-भाव से उस माल्यवान गंधर्व को रिझाने का प्रयास करने लगी। माल्यवान भी उस गंधर्व कन्या पर मोहित हो गये और अपने गायन का सुर-ताल भूल गया। जिससे संगीत की लय टूट गई और संगीत का सारा आनंद बिगड़ गया। सभा में उपस्थित सभी देवगणों को यह देख बहुत बुरा लगा। और देवराज इंद्र भी रूष्ट हो गए। और इंद्र कहने लगे कि संगीत एक पवित्र साधना है। इस साधना को भ्रष्ट करना पाप है, और क्रोधवश इंद्र ने पुष्पवती तथा माल्यवान को शाप दे दिया- 'संगीत की साधना को अपवित्र करने वाले माल्यवान और पुष्पवती! तुमने देवी सरस्वती का अपमान किया है, अतः तुम्हें मृत्युलोक में जाना होगा। इस प्रकार के गुरुजनों की सभा में असंयम और लज्जाजनक प्रदर्शन करके तुमने गुरुजनों का घोर अपमान किया है, इसलिए इंद्रलोक में तुम्हारा रहना अब वर्जित है, अब तुम अधम पिशाच असंयमी का-सा जीवन बिताओगे।
देवराज इंद्र का शाप सुनकर वे अत्यंत दुखी हुए और पिशाच योनि में दुःख पूर्वक जीवनयापन करने लगे। उन्हें गंध, रस, स्पर्श आदि का बिलकुल भी बोध नहीं था। साथ ही दोनो को असहनीय दुःख सहन करना पड़ रहा था। दुःख के कारण उन्हें एक क्षण के लिए भी नींद नहीं आती थी।
एक दिन माल्यवान जो कि पिशाच बन गया था वह पुष्पवती से कहता है- नही पता हमने पिछले जन्म में कौन-से ऐसे पाप किए थे, जिसके कारण हमें इतनी दुःखदायी योनि प्राप्त हुई है? यहा से तो नरक के दुःख कहीं ज्यादा उत्तम है। इसी प्रकार अपने विचारों को कहते हुए दिन व्यतीत करने लगे।
एक बार माघ के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन इन दोनों ने कुछ भी भोजन नहीं किया और न ही कोई पाप कर्म किया। उस दिन मात्र फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। उस दिन सूर्य भगवान अस्ताचल को जा रहे थे। वह रात इन दोनों ने एक-दूसरे से सटकर बड़ी कठिनता से काटी।
दूसरे दिन प्रातः काल होते ही प्रभु की कृपा से इनकी पिशाच योनि से मुक्ति हो गई और पुनः अपनी अत्यंत सुंदर अप्सरा और गंधर्व की देह धारण करके तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत होकर दोनों स्वर्ग लोक को चले गए। उस समय आकाश में देवगण तथा गंधर्व इनकी स्तुति करने लगे। नागलोक में जाकर इन दोनों ने देवेंद्र को दण्डवत् किया।
देवेंद्र को भी उन्हें उनके रूप में देखकर महान विस्मय हुआ और उन्होंने पूछा- 'तुम्हें पिशाच योनि से किस प्रकार मुक्ति मिली, उसका पूरा वृत्तांत मुझे बताओ।'
देवेंद्र की बात सुन माल्यवान ने कहा- 'हे देवताओं के राजा इंद्र! श्रीहरि की कृपा तथा जया एकादशी के व्रत के पुण्य से हमें पिशाच योनि से मुक्ति मिली है।'
इंद्र ने कहा- 'हे माल्यवान! एकादशी व्रत करने से तथा भगवान श्रीहरि की कृपा से तुम लोग पिशाच योनि को छोड़कर पवित्र हो गए हो, इसलिए हम लोगों के लिए भी वंदनीय हो गए हो, क्योंकि शिव तथा विष्णु-भक्त हम देवताओं के वंदना करने योग्य हैं, अतः आप दोनों धन्य हैं। अब आप प्रसन्नतापूर्वक देवलोक में निवास कर सकते हैं।
संगीत देवी सरस्वती का एक अलौकिक वरदान है, यह एक साधना है, एक विद्या है। इसमें पवित्रता आवश्यक है। फिर जिस सभा में अपने से बड़े गुरुजन आदि उपस्थित हों, वहां प्राणी को संयम और मर्यादा को बनाए रखना चाहिए, ताकि गुरुजनों का अपमान न हो, उनका सम्मान बना रहे। गुरुजनों का अपमान करने वाला मनुष्य घोर नरक का भागी है।
एक बार पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या ने माल्यवान नामक गंधर्व को देखा और उस पर मोहित होकर अपने हाव-भाव से उस माल्यवान गंधर्व को रिझाने का प्रयास करने लगी। माल्यवान भी उस गंधर्व कन्या पर मोहित हो गये और अपने गायन का सुर-ताल भूल गया। जिससे संगीत की लय टूट गई और संगीत का सारा आनंद बिगड़ गया। सभा में उपस्थित सभी देवगणों को यह देख बहुत बुरा लगा। और देवराज इंद्र भी रूष्ट हो गए। और इंद्र कहने लगे कि संगीत एक पवित्र साधना है। इस साधना को भ्रष्ट करना पाप है, और क्रोधवश इंद्र ने पुष्पवती तथा माल्यवान को शाप दे दिया- 'संगीत की साधना को अपवित्र करने वाले माल्यवान और पुष्पवती! तुमने देवी सरस्वती का अपमान किया है, अतः तुम्हें मृत्युलोक में जाना होगा। इस प्रकार के गुरुजनों की सभा में असंयम और लज्जाजनक प्रदर्शन करके तुमने गुरुजनों का घोर अपमान किया है, इसलिए इंद्रलोक में तुम्हारा रहना अब वर्जित है, अब तुम अधम पिशाच असंयमी का-सा जीवन बिताओगे।
देवराज इंद्र का शाप सुनकर वे अत्यंत दुखी हुए और पिशाच योनि में दुःख पूर्वक जीवनयापन करने लगे। उन्हें गंध, रस, स्पर्श आदि का बिलकुल भी बोध नहीं था। साथ ही दोनो को असहनीय दुःख सहन करना पड़ रहा था। दुःख के कारण उन्हें एक क्षण के लिए भी नींद नहीं आती थी।
एक दिन माल्यवान जो कि पिशाच बन गया था वह पुष्पवती से कहता है- नही पता हमने पिछले जन्म में कौन-से ऐसे पाप किए थे, जिसके कारण हमें इतनी दुःखदायी योनि प्राप्त हुई है? यहा से तो नरक के दुःख कहीं ज्यादा उत्तम है। इसी प्रकार अपने विचारों को कहते हुए दिन व्यतीत करने लगे।
एक बार माघ के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन इन दोनों ने कुछ भी भोजन नहीं किया और न ही कोई पाप कर्म किया। उस दिन मात्र फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। उस दिन सूर्य भगवान अस्ताचल को जा रहे थे। वह रात इन दोनों ने एक-दूसरे से सटकर बड़ी कठिनता से काटी।
दूसरे दिन प्रातः काल होते ही प्रभु की कृपा से इनकी पिशाच योनि से मुक्ति हो गई और पुनः अपनी अत्यंत सुंदर अप्सरा और गंधर्व की देह धारण करके तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत होकर दोनों स्वर्ग लोक को चले गए। उस समय आकाश में देवगण तथा गंधर्व इनकी स्तुति करने लगे। नागलोक में जाकर इन दोनों ने देवेंद्र को दण्डवत् किया।
देवेंद्र को भी उन्हें उनके रूप में देखकर महान विस्मय हुआ और उन्होंने पूछा- 'तुम्हें पिशाच योनि से किस प्रकार मुक्ति मिली, उसका पूरा वृत्तांत मुझे बताओ।'
देवेंद्र की बात सुन माल्यवान ने कहा- 'हे देवताओं के राजा इंद्र! श्रीहरि की कृपा तथा जया एकादशी के व्रत के पुण्य से हमें पिशाच योनि से मुक्ति मिली है।'
इंद्र ने कहा- 'हे माल्यवान! एकादशी व्रत करने से तथा भगवान श्रीहरि की कृपा से तुम लोग पिशाच योनि को छोड़कर पवित्र हो गए हो, इसलिए हम लोगों के लिए भी वंदनीय हो गए हो, क्योंकि शिव तथा विष्णु-भक्त हम देवताओं के वंदना करने योग्य हैं, अतः आप दोनों धन्य हैं। अब आप प्रसन्नतापूर्वक देवलोक में निवास कर सकते हैं।
संगीत देवी सरस्वती का एक अलौकिक वरदान है, यह एक साधना है, एक विद्या है। इसमें पवित्रता आवश्यक है। फिर जिस सभा में अपने से बड़े गुरुजन आदि उपस्थित हों, वहां प्राणी को संयम और मर्यादा को बनाए रखना चाहिए, ताकि गुरुजनों का अपमान न हो, उनका सम्मान बना रहे। गुरुजनों का अपमान करने वाला मनुष्य घोर नरक का भागी है।
उत्पन्ना एकादशी
🌸उत्पन्ना एकादशी🌸
सतयुग में एक दैत्य था, जिसका नाम मुर था। वह दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं को युध्द मे परास्त कर विजय प्राप्त की और उन्हें उनके पद से हटा दिया और इन्द्रलोक पर भी अपना कब्जा कर लिया । तब इन्द्र ने भगवान शंकर जी समक्ष जाकर प्रार्थना की- 'हे भोलेनाथ, हम सभी देवता, दैत्य मुर के अत्याचारों से पीडित होकर अपना जीवन मृत्युलोक में व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से यह बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। मैं स्वयं बहुत दुखी और भयभीत हूँ | हे कैलाशपति! कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।'
देवराज की प्रार्थना सुन शंकरजी ने कहा- 'हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि के पास जाइए। मधु-कैटभ का संहार करने वाले भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।
भगवान महादेवजी के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता भगवान श्री हरि के धाम क्षीर सागर पहुचे, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।
सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उनकी स्तुति की - 'हे तीनों लोकों के स्वामी! हम आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हे दैत्यों के संहारक! हम आपकी शरण में हैं, हमारी रक्षा करें। हे त्रिलोकपति! हम दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। आप ही हमारी रक्षक है |
देवताओं की करुण पुकार सुनकर, भगवान श्रीहरि बाले- 'हे देवगणो! वह दैत्य कौन है? जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है?
भगवान विष्णु के वचनों को सुन देवेन्द्र ने कहा- 'हे प्रभु! प्राचीन काल में ब्रह्मवंश में उत्पन्न हुआ नाड़ी जंगम नाम का एक असुर था, जिसका मुर नामक एक पुत्र है, जो चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करता है, जिसने अपने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, और दैत्य अपने कुल के असुरों को इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, चन्द्रमा आदि लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।
देवेन्द्र के वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ' मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।
भगवान विष्णु देवताओम उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि स्वंय भगवान विष्णु युद्ध के लिये उसकी राजधानी आ रहे हैं, अतः वह भी अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि पर आ गया।और युद्ध शुरू हो गया, असुर ने अस्त्रों-शस्त्रों को धारण कर देवताओं से युद्ध करने लगे, किन्तु देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। दैत्य भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को श्रीविष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। और देखते ही देखते दैत्य सदा के लिए मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्यराज मुर भगवान विष्णु के साथ निश्चल भाव से युद्ध करता रहा। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। इस प्रकार युध्द करते करते कई वर्ष लग गये ¦अतः अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नाम की एक गुफा में प्रवेश कर गए।
उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। वह सोच मैं आज अपने चिर शत्रु को मार हमेशा के लिए निष्कण्टक हो जाऊँगा, परन्तु उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस से युद्ध करने लगी।
उस कन्या को देख राक्षस को आश्चर्य हुआ और वह सोचने लगा कि यह दिव्य कन्या कहाँ से उत्पन्न हुई और फिर वह असुर उस कन्या से युद्ध करने लगा, कुछ समय पश्चात उस कन्या ने क्रोध में आकर उस दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अब दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा।
उस तेजस्वी कन्या ने उस असुर का सिर काट दिया और बाकी बचे असुर अपने राजा का ऐसा दुःखद अन्त देखकर भयभीत होकर पाताल लोक में भाग गए। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इसे किसने मारा है?
तब वह कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- 'हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।'
कन्या की बात सुन भगवान बोले- 'तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने तीनों लोकों के देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।'
भगवान की बात सुन कन्या बोली- 'हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।
भगवान श्रीहरि ने कहा- 'हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। हे कल्याणी! तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप समूल नष्ट हो जाएँगे। यह मेरा अकाट्य कथन है।' इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अन्तर्धान हो गए।
अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे, उद्धृतापि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
मृत्तिके हर में पाप यन्मया पूर्वक संचितम्, त्वचा हतेन पापेन गच्छामि परमां गतिम्॥
श्रीहरि के नाम का जप करना चाहिए, इस एकादशी के व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए। एकादशी भगवान विष्णु की साक्षात शक्ति है, जिस शक्ति ने उस असुर का वध किया है ।
सतयुग में एक दैत्य था, जिसका नाम मुर था। वह दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं को युध्द मे परास्त कर विजय प्राप्त की और उन्हें उनके पद से हटा दिया और इन्द्रलोक पर भी अपना कब्जा कर लिया । तब इन्द्र ने भगवान शंकर जी समक्ष जाकर प्रार्थना की- 'हे भोलेनाथ, हम सभी देवता, दैत्य मुर के अत्याचारों से पीडित होकर अपना जीवन मृत्युलोक में व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से यह बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। मैं स्वयं बहुत दुखी और भयभीत हूँ | हे कैलाशपति! कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।'
देवराज की प्रार्थना सुन शंकरजी ने कहा- 'हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि के पास जाइए। मधु-कैटभ का संहार करने वाले भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।
भगवान महादेवजी के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता भगवान श्री हरि के धाम क्षीर सागर पहुचे, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।
सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उनकी स्तुति की - 'हे तीनों लोकों के स्वामी! हम आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हे दैत्यों के संहारक! हम आपकी शरण में हैं, हमारी रक्षा करें। हे त्रिलोकपति! हम दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। आप ही हमारी रक्षक है |
देवताओं की करुण पुकार सुनकर, भगवान श्रीहरि बाले- 'हे देवगणो! वह दैत्य कौन है? जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है?
भगवान विष्णु के वचनों को सुन देवेन्द्र ने कहा- 'हे प्रभु! प्राचीन काल में ब्रह्मवंश में उत्पन्न हुआ नाड़ी जंगम नाम का एक असुर था, जिसका मुर नामक एक पुत्र है, जो चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करता है, जिसने अपने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, और दैत्य अपने कुल के असुरों को इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, चन्द्रमा आदि लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।
देवेन्द्र के वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ' मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।
भगवान विष्णु देवताओम उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि स्वंय भगवान विष्णु युद्ध के लिये उसकी राजधानी आ रहे हैं, अतः वह भी अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि पर आ गया।और युद्ध शुरू हो गया, असुर ने अस्त्रों-शस्त्रों को धारण कर देवताओं से युद्ध करने लगे, किन्तु देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। दैत्य भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को श्रीविष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। और देखते ही देखते दैत्य सदा के लिए मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्यराज मुर भगवान विष्णु के साथ निश्चल भाव से युद्ध करता रहा। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। इस प्रकार युध्द करते करते कई वर्ष लग गये ¦अतः अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नाम की एक गुफा में प्रवेश कर गए।
उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। वह सोच मैं आज अपने चिर शत्रु को मार हमेशा के लिए निष्कण्टक हो जाऊँगा, परन्तु उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस से युद्ध करने लगी।
उस कन्या को देख राक्षस को आश्चर्य हुआ और वह सोचने लगा कि यह दिव्य कन्या कहाँ से उत्पन्न हुई और फिर वह असुर उस कन्या से युद्ध करने लगा, कुछ समय पश्चात उस कन्या ने क्रोध में आकर उस दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अब दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा।
उस तेजस्वी कन्या ने उस असुर का सिर काट दिया और बाकी बचे असुर अपने राजा का ऐसा दुःखद अन्त देखकर भयभीत होकर पाताल लोक में भाग गए। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इसे किसने मारा है?
तब वह कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- 'हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।'
कन्या की बात सुन भगवान बोले- 'तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने तीनों लोकों के देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।'
भगवान की बात सुन कन्या बोली- 'हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।
भगवान श्रीहरि ने कहा- 'हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। हे कल्याणी! तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप समूल नष्ट हो जाएँगे। यह मेरा अकाट्य कथन है।' इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अन्तर्धान हो गए।
अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे, उद्धृतापि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
मृत्तिके हर में पाप यन्मया पूर्वक संचितम्, त्वचा हतेन पापेन गच्छामि परमां गतिम्॥
श्रीहरि के नाम का जप करना चाहिए, इस एकादशी के व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए। एकादशी भगवान विष्णु की साक्षात शक्ति है, जिस शक्ति ने उस असुर का वध किया है ।
रमा एकादशी
🌸रमा एकादशी🌸
पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम का राजा था। इंद्र, वरुण, कुबेर, विभीषण आदि उसके मित्र थे। वह बड़ा ही सत्यवादी तथा भगवान विष्णुभक्त था। राजा की चंद्रभागा नाम की एक कन्या थी, जिसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से हुआ था। राजा एकादशी का व्रत करता था और पुरा राज्य भी क्रठोरता से एकादशी नियम का पालन करते थे।
एक बार सोभन अपने ससुराल आया हुआ था। वह कार्तिक का महीना था। इसी मास रमा एकादशी थी और इस दिन सभी व्रत रखते थे। चंद्रभागा ने सोचा कि मेरे पति तो बड़े कमजोर हृदय के हैं, वह व्रत कैसे करेंगे, जबकि यहां तो सभी को व्रत करने की आज्ञा है। राजा ने आदेश किया कि सारी प्रजा विधानपूर्वक एकादशी का व्रत करे। यह सुन सोभन अपनी पत्नी के पास गया और बोला- हे प्रिय तुम कुछ उपाय बताओ, क्योंकि मैं उपवास नहीं कर सकता।
पति की बात सुन चंद्रभागा ने कहा- स्वामी मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता। यहां तक कि हाथी, घोड़ा, ऊंट, पशु आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर भला आप कैसे भोजन कर सकते हैं? यदि आप उपवास नहीं कर सकते तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहां रहेंगे तो आपको व्रत तो अवश्य ही करना पड़ेगा।'
पत्नी की बात सुन सोभन ने कहा- हे प्रिय तुम्हारी राय उचित है, परंतु मैं व्रत करने के डर से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा, मैं व्रत करूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी हो।
सोभन ने एकादशी का व्रत किया और भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने लगा।
सूर्य अस्त हो रात्रि भी आ गई। सोभन को असहनीय दुख देने वाली थी। दूसरे दिन सूर्योदय होने से पूर्व ही भूख-प्यास के कारण सोभन के प्राण निकल गये। राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल-प्रवाह कर अपनी पुत्री को आज्ञा दी कि वह सती न हो और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखे।
चंद्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार सती नहीं हुई। और अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी। एकादशी प्रभाव से सोभन को जल से निकाला गया और भगवान विष्णु की कृपा से वह पुन जीवित हो गया और उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण देवपुर नाम का नगर प्राप्त हुआ। उसे वहां का राजा बना दिया गया। राजा सोभन मानो इंद्र प्रतीत हो रहा था। मुचुकुंद नगर में रहने वाला सोम शर्मा नामक एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था। घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। राजा सोभन ब्राह्मण को देख आसन से उठ खड़े हुए और अपने श्वसुर तथा स्त्री चंद्रभागा की कुशल क्षेम पूछने लगे।
सोमशर्मा ने कहा- 'हे राजन! हमारे राजा कुशल से हैं तथा आपकी पत्नी चंद्रभागा भी कुशल है। आप रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको कैसे प्राप्त हुआ?
सोभन ने कहा यह सब कार्तिक माह के रमा एकादशी के व्रत का फल है। इसी से यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है, किंतु यह अस्थिर है।'
सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोले- 'हे राजन! यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, आप मुझे समझाइए। यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो वह मैं अवश्य ही करूंगा।
राजा सोभन ने कहा- हे ब्राह्मण देव मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ, यदि आप इस वृत्तांत को चंद्रभागा से कहोगे तो वही इसे स्थिर बना सकती है ।
राजा की बात सुन ब्राह्मण वहा से लौट आया और चंद्रभागा को सारा वृत्तांत सुनाया। तब चंद्रभागा बोली- 'हे ब्राह्मण देव!क्या आप यह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं या स्वप्न कह रहे हैं?
चंद्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोले - मैंने सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है, किंतु वह नगर अस्थिर है। यदि तुम कोई उपाय करो तो वह स्थिर हो जाए।
ब्राह्मण की बात सुन चंद्रभागा बोली- ब्राह्मण देव आप मुझे उस नगर चलिए, मैं अपने पति को देखना चाहती हूं। मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।'
चंद्रभागा की बात सुनकर ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चंद्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चंद्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई।
सोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा को देखकर प्रसन्न हो गया ।
चंद्रभागा ने कहा- स्वामी आप मेरे पुण्य को सुनिए, जब मैं आठ वर्ष की थी, तब से मैं विधिपूर्वक एकादशी का व्रत कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से मै आपके नगर स्थिर करूंगा और सभी कर्मों से परिपूर्ण होकर यह प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। चंद्रभागा दिव्य स्वरूप धारण कर अपने पुण्य से नगर को स्थिर कर दिया और वही अपने पति के साथ रहने लगी ।
एकादशी व्रत का फल अवश्य प्राप्त होता है । इसलिये अवश्य एकादशी व्रत करे ।
भगवान श्रीहरि बड़े दयालु और क्षमावान हैं। श्रद्धापूर्वक या विवश होकर भी कोई उनका पूजन या एकादशी करे तो भी उत्तम फल प्राप्त होता हैं ।
पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम का राजा था। इंद्र, वरुण, कुबेर, विभीषण आदि उसके मित्र थे। वह बड़ा ही सत्यवादी तथा भगवान विष्णुभक्त था। राजा की चंद्रभागा नाम की एक कन्या थी, जिसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से हुआ था। राजा एकादशी का व्रत करता था और पुरा राज्य भी क्रठोरता से एकादशी नियम का पालन करते थे।
एक बार सोभन अपने ससुराल आया हुआ था। वह कार्तिक का महीना था। इसी मास रमा एकादशी थी और इस दिन सभी व्रत रखते थे। चंद्रभागा ने सोचा कि मेरे पति तो बड़े कमजोर हृदय के हैं, वह व्रत कैसे करेंगे, जबकि यहां तो सभी को व्रत करने की आज्ञा है। राजा ने आदेश किया कि सारी प्रजा विधानपूर्वक एकादशी का व्रत करे। यह सुन सोभन अपनी पत्नी के पास गया और बोला- हे प्रिय तुम कुछ उपाय बताओ, क्योंकि मैं उपवास नहीं कर सकता।
पति की बात सुन चंद्रभागा ने कहा- स्वामी मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता। यहां तक कि हाथी, घोड़ा, ऊंट, पशु आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर भला आप कैसे भोजन कर सकते हैं? यदि आप उपवास नहीं कर सकते तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहां रहेंगे तो आपको व्रत तो अवश्य ही करना पड़ेगा।'
पत्नी की बात सुन सोभन ने कहा- हे प्रिय तुम्हारी राय उचित है, परंतु मैं व्रत करने के डर से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा, मैं व्रत करूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी हो।
सोभन ने एकादशी का व्रत किया और भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने लगा।
सूर्य अस्त हो रात्रि भी आ गई। सोभन को असहनीय दुख देने वाली थी। दूसरे दिन सूर्योदय होने से पूर्व ही भूख-प्यास के कारण सोभन के प्राण निकल गये। राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल-प्रवाह कर अपनी पुत्री को आज्ञा दी कि वह सती न हो और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखे।
चंद्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार सती नहीं हुई। और अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी। एकादशी प्रभाव से सोभन को जल से निकाला गया और भगवान विष्णु की कृपा से वह पुन जीवित हो गया और उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण देवपुर नाम का नगर प्राप्त हुआ। उसे वहां का राजा बना दिया गया। राजा सोभन मानो इंद्र प्रतीत हो रहा था। मुचुकुंद नगर में रहने वाला सोम शर्मा नामक एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था। घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। राजा सोभन ब्राह्मण को देख आसन से उठ खड़े हुए और अपने श्वसुर तथा स्त्री चंद्रभागा की कुशल क्षेम पूछने लगे।
सोमशर्मा ने कहा- 'हे राजन! हमारे राजा कुशल से हैं तथा आपकी पत्नी चंद्रभागा भी कुशल है। आप रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको कैसे प्राप्त हुआ?
सोभन ने कहा यह सब कार्तिक माह के रमा एकादशी के व्रत का फल है। इसी से यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है, किंतु यह अस्थिर है।'
सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोले- 'हे राजन! यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, आप मुझे समझाइए। यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो वह मैं अवश्य ही करूंगा।
राजा सोभन ने कहा- हे ब्राह्मण देव मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ, यदि आप इस वृत्तांत को चंद्रभागा से कहोगे तो वही इसे स्थिर बना सकती है ।
राजा की बात सुन ब्राह्मण वहा से लौट आया और चंद्रभागा को सारा वृत्तांत सुनाया। तब चंद्रभागा बोली- 'हे ब्राह्मण देव!क्या आप यह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं या स्वप्न कह रहे हैं?
चंद्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोले - मैंने सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है, किंतु वह नगर अस्थिर है। यदि तुम कोई उपाय करो तो वह स्थिर हो जाए।
ब्राह्मण की बात सुन चंद्रभागा बोली- ब्राह्मण देव आप मुझे उस नगर चलिए, मैं अपने पति को देखना चाहती हूं। मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।'
चंद्रभागा की बात सुनकर ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चंद्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चंद्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई।
सोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा को देखकर प्रसन्न हो गया ।
चंद्रभागा ने कहा- स्वामी आप मेरे पुण्य को सुनिए, जब मैं आठ वर्ष की थी, तब से मैं विधिपूर्वक एकादशी का व्रत कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से मै आपके नगर स्थिर करूंगा और सभी कर्मों से परिपूर्ण होकर यह प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। चंद्रभागा दिव्य स्वरूप धारण कर अपने पुण्य से नगर को स्थिर कर दिया और वही अपने पति के साथ रहने लगी ।
एकादशी व्रत का फल अवश्य प्राप्त होता है । इसलिये अवश्य एकादशी व्रत करे ।
भगवान श्रीहरि बड़े दयालु और क्षमावान हैं। श्रद्धापूर्वक या विवश होकर भी कोई उनका पूजन या एकादशी करे तो भी उत्तम फल प्राप्त होता हैं ।
इंदिरा एकादशी
🌸इंदिरा एकादशी🌸
इस दिन भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है, उनके निमित्त व्रत किया जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और वैकुंठ को प्राप्त होता है व नरक में गए हुए पितरों का उद्धार हो जाता है। और पितरों को भी स्वर्ग में स्थान मिलता है। जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान हृषिकेश की पूजा करता है वह मृत्यु के बाद यमलोक जाने से बच जाता है। उसके व्रत के प्रभाव से बड़े बड़े पापों का नाश हो जाता है । इस एकादशी से पितरों को भी सदगति मिलती है । पितृपक्ष में इस एकादशी के आने का उद्देश्य भी यही है कि जिनके पितर यम की यातना सह रहे हैं उन्हें मुक्ति मिल जाए।
सतयुग में महिष्मति नाम की नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए रहता था। राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और भगवान विष्णु का परम भक्त था। एक दिन राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठे थे । वही महर्षि नारद उनकी सभा में आए । राजा ने उन्हें देख जोड़कर प्रणाम कर उन्हें आदर सहित आसन दिया । महर्षि नारद जी आपकी कृपा से मेरी सर्वथा कुशल हूँ । आज आपके दर्शन से मेरी सम्पूर्ण यज्ञ क्रियाएँ सफल हो गयीं । कृपा कर मुझे आपके आने का कारण बताये । तब नारद जी ने कहा मैं आपकी धर्मपरायणता देखकर अत्यंत प्रसन्न हूँ।
राजा ने कहा आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल हैं तथा मेरे सभी यज्ञ कर्म आदि सफल हो गए हैं। हे नारद जी आप कृपा कर आपके आगमन का प्रयोजन बताये?
नारद जी कहते है: हे राजन मैं एक बार ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ जाकर मुझे एक श्रेष्ठ आसन पर मुझे बैठा गया और यमराज ने भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की । उसी यमराज की सभा में मैैने तुम्हारे पिता को भी देखा | तुम्हारे पिता महान ज्ञानी, दानी तथा धर्मात्मा थे, किंतु उनसे पूर्व जन्म में उनसे कोई विघ्न हो जाने के कारण उनसे व्रत भंग हो गया था । वे एकादशी व्रतभंग के दोष से वहाँ आये थे । इसलिये मुझे यही यमराज के पास रहना पड़ रहा है। तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है।
राजा ने पूछा मेरे पिता जी ने क्या संदेश भेजा है? कृपा कर बताये |
राजन तुम्हारे पिता ने कहा है- कि मेरे पुत्र इंद्रसेन के पास जाकर एक संदेश देने की कृपा करें कि मेरे पूर्व जन्म के व्रत भंग होने के कारण ही मुझे यह लोक मिला है। यदि मेरा पुत्र आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का व्रत करे और उस व्रत के फल को मुझे दे दे तो यमलोक से मेरी मुक्ति हो जाएगी। और मैं इस लोक से छूटकर स्वर्गलोक में वास करूं।
इंद्रसेन को यह बात सुनकर महान दुख हुआ और उसने नारदजी कृपा कर मेरे पिता की मुक्ति हेतु उपाय बताये मै अवश्य करूंगा। और मुझे इन्दिरा एकादशी व्रत का विधान बताने की कृपा करें।'
राजन आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक स्नान करना चाहिए। जल से निकलकर श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करें और एक समय भोजन करे | तथा एकादशी के दिन भक्तिपूर्वक व्रत कर यह संकल्प करें कि मैं आज निराहार रहूँगा और सभी भोगों का त्याग कर दूंगा।
इस प्रकार एकादशी के दिन दोपहर मे शालिग्राम की प्रतिमा को स्थापित कर पुजा करे और ब्राह्मण को बुलाकर भोजन कराएं ।
भोजन का कुछ हिस्सा गाय को अवश्य दें और भगवान विष्णु का धूप, नैवेद्य आदि से पूजन करें तथा रात्रि को जागरण करें। तदुपरांत द्वादशी के दिन पूजा कर भोजन करें। यही इन्दिरा एकादशी के व्रत की विधि है। यदि तुम इस एकादशी के व्रत को करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्ग जाएंगे।
नारदजी राजा को यह बचाकर कर चले गए । राजा ने इन्दिरा एकादशी पर विधी पूर्वक्र व्रत किया । तथा राजा ने अपने व्रत का लाभ अपने पिता को दे दिया जिससे वो यमलोक से मुक्त होकर स्वर्ग को चले गए।
अपने पिता को स्वर्ग लोक की प्राप्ति कराने हेतु भक्तिभाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करो :
अघ स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः ।
श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥
‘कमलनयन भगवान नारायण ! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करुँगा । हे अच्युत आप मुझे शरण दें |'
"जय जय श्री राधे"
इस दिन भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है, उनके निमित्त व्रत किया जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और वैकुंठ को प्राप्त होता है व नरक में गए हुए पितरों का उद्धार हो जाता है। और पितरों को भी स्वर्ग में स्थान मिलता है। जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान हृषिकेश की पूजा करता है वह मृत्यु के बाद यमलोक जाने से बच जाता है। उसके व्रत के प्रभाव से बड़े बड़े पापों का नाश हो जाता है । इस एकादशी से पितरों को भी सदगति मिलती है । पितृपक्ष में इस एकादशी के आने का उद्देश्य भी यही है कि जिनके पितर यम की यातना सह रहे हैं उन्हें मुक्ति मिल जाए।
सतयुग में महिष्मति नाम की नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए रहता था। राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और भगवान विष्णु का परम भक्त था। एक दिन राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठे थे । वही महर्षि नारद उनकी सभा में आए । राजा ने उन्हें देख जोड़कर प्रणाम कर उन्हें आदर सहित आसन दिया । महर्षि नारद जी आपकी कृपा से मेरी सर्वथा कुशल हूँ । आज आपके दर्शन से मेरी सम्पूर्ण यज्ञ क्रियाएँ सफल हो गयीं । कृपा कर मुझे आपके आने का कारण बताये । तब नारद जी ने कहा मैं आपकी धर्मपरायणता देखकर अत्यंत प्रसन्न हूँ।
राजा ने कहा आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल हैं तथा मेरे सभी यज्ञ कर्म आदि सफल हो गए हैं। हे नारद जी आप कृपा कर आपके आगमन का प्रयोजन बताये?
नारद जी कहते है: हे राजन मैं एक बार ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ जाकर मुझे एक श्रेष्ठ आसन पर मुझे बैठा गया और यमराज ने भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की । उसी यमराज की सभा में मैैने तुम्हारे पिता को भी देखा | तुम्हारे पिता महान ज्ञानी, दानी तथा धर्मात्मा थे, किंतु उनसे पूर्व जन्म में उनसे कोई विघ्न हो जाने के कारण उनसे व्रत भंग हो गया था । वे एकादशी व्रतभंग के दोष से वहाँ आये थे । इसलिये मुझे यही यमराज के पास रहना पड़ रहा है। तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है।
राजा ने पूछा मेरे पिता जी ने क्या संदेश भेजा है? कृपा कर बताये |
राजन तुम्हारे पिता ने कहा है- कि मेरे पुत्र इंद्रसेन के पास जाकर एक संदेश देने की कृपा करें कि मेरे पूर्व जन्म के व्रत भंग होने के कारण ही मुझे यह लोक मिला है। यदि मेरा पुत्र आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का व्रत करे और उस व्रत के फल को मुझे दे दे तो यमलोक से मेरी मुक्ति हो जाएगी। और मैं इस लोक से छूटकर स्वर्गलोक में वास करूं।
इंद्रसेन को यह बात सुनकर महान दुख हुआ और उसने नारदजी कृपा कर मेरे पिता की मुक्ति हेतु उपाय बताये मै अवश्य करूंगा। और मुझे इन्दिरा एकादशी व्रत का विधान बताने की कृपा करें।'
राजन आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक स्नान करना चाहिए। जल से निकलकर श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करें और एक समय भोजन करे | तथा एकादशी के दिन भक्तिपूर्वक व्रत कर यह संकल्प करें कि मैं आज निराहार रहूँगा और सभी भोगों का त्याग कर दूंगा।
इस प्रकार एकादशी के दिन दोपहर मे शालिग्राम की प्रतिमा को स्थापित कर पुजा करे और ब्राह्मण को बुलाकर भोजन कराएं ।
भोजन का कुछ हिस्सा गाय को अवश्य दें और भगवान विष्णु का धूप, नैवेद्य आदि से पूजन करें तथा रात्रि को जागरण करें। तदुपरांत द्वादशी के दिन पूजा कर भोजन करें। यही इन्दिरा एकादशी के व्रत की विधि है। यदि तुम इस एकादशी के व्रत को करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्ग जाएंगे।
नारदजी राजा को यह बचाकर कर चले गए । राजा ने इन्दिरा एकादशी पर विधी पूर्वक्र व्रत किया । तथा राजा ने अपने व्रत का लाभ अपने पिता को दे दिया जिससे वो यमलोक से मुक्त होकर स्वर्ग को चले गए।
अपने पिता को स्वर्ग लोक की प्राप्ति कराने हेतु भक्तिभाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करो :
अघ स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः ।
श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥
‘कमलनयन भगवान नारायण ! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करुँगा । हे अच्युत आप मुझे शरण दें |'
"जय जय श्री राधे"
कामदा एकादशी
🌸कामदा एकादशी🌸
प्राचीन काल में भागीपुर नामक एक नगर था। जहाँ पुण्डरीक नाम के राजा हुआ करते था। उनके राज्य में अनेक अप्सराएँ, गन्धर्व, किन्नर आदि निवास करते थे। उसी नगर में ललित और ललिता नाम के गायन विद्या में पारन्गत गन्धर्व दंपति निवास करते थे। उन दोनों में बहुत प्रेम था, कि वे अलग हो जाने की कल्पना मात्र से ही व्यथित हो उठते थे। एक बार राजा पुण्डरीक की सभा में गन्धर्वों सहित सभी विराजमान थे। वहाँ गन्धर्वों के साथ ललित भी गायन कर रहा था। उस समय उसकी प्रियतमा ललिता वहाँ उपस्थित नहीं थी। ललित को गायन करते-करते अचानक से ललिता ख्याल आ गया, जिसके कारण गायन का लय बिगड़ गया। इससे नाराज हो नागराज कर्कोटक ने राजा पुण्डरीक से गंधर्व ललित की शिकायत कर दी। जिससे राजा को क्रोध आया और उन्होंने क्रोधवश ललित को श्राप दिया- कि तू मेरे सम्मुख गायन करते हुए भी स्त्री का स्मरण कर रहा है |जा तू नरभक्षी दैत्य बनकर अपने कर्म का फल भोग।
गंधर्व ललित उसी समय राजा पुण्डरीक के श्राप से एक दैत्य के परिवेश में बदल गया | इस तरह गंधर्व ललित राक्षस बन जाने पर वह अनेक दुःख भोगने लगा। अपने प्रियतम ललित की ऐसी हालत देख ललिता दुःख से व्यथित हो गई। और अपने पति के उद्धार के लिए विचार करने लगी कि मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ? किस तरह अपने पति को इस नरक से मुक्त कराऊँ?
राक्षस बन ललित वनों में रह पाप करने लगा। ललिता भी उसके पीछे-पीछे जाती और उसकी हालत देखकर विलाप करने लगती। एक बार अपने पति के पीछे-पीछे चलते हुए ललिता विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई। उस स्थान पर उसने श्रृंगी मुनि का आश्रम देखा। वह शीघ्रता से उस आश्रम पर गई और मुनि को प्रणाम कर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी- 'हे महर्षि! मैं वीरधन्वा नामक गन्धर्व की पुत्री ललिता हूँ, मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से दैत्य बन गये है। मै अपने पति के हालत को देखकर बहुत दुखी हूँ। कृपा कर आप उन्हें राक्षस योनि से मुक्ति का कोई उत्तम उपाय बताएँ।'
ललिता की बात सुनकर मुनि श्रृंगी ने कहा- 'हे पुत्री! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी का व्रत करने से प्राणी के सभी मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण हो जाते हैं। यदि तुम इस व्रत को कर अपने पुण्य अपने पति को देगी तो वह सहज ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा।
ललिता ने श्रद्धापूर्वक कामदा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों के समक्ष अपने व्रत का फल अपने पति को दे दिया और ईश्वर से प्रार्थना की - हे प्रभु मैंने जो यह व्रत किया है, इसका फल मेरे पतिदेव को मिले, जिससे उन्हें राक्षस योनि से शीघ्र ही मुक्ति मिल जाए ।
ललिता द्वारा एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त हो गया और अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुआ। वह अनेक सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत हो पहले की भाँति गंधर्व योनि को प्राप्त किया।
प्राणी अपने सुखों का चिन्तन करे | लेकिन समय-असमय चिन्तन करने से प्राणी को उसके दायित्वों से विमुख कर देता है, जिससे कारण कष्ट भोगने पड़ते हैं। गन्धर्व ललित ने भी राक्षस होकर निन्दित कर्म किये और कष्ट भोगे, परन्तु भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा और एकादशी के फल से उसे पुन: गंधर्व योनि प्राप्त हो गई ।
!!जय श्री हरि!!
प्राचीन काल में भागीपुर नामक एक नगर था। जहाँ पुण्डरीक नाम के राजा हुआ करते था। उनके राज्य में अनेक अप्सराएँ, गन्धर्व, किन्नर आदि निवास करते थे। उसी नगर में ललित और ललिता नाम के गायन विद्या में पारन्गत गन्धर्व दंपति निवास करते थे। उन दोनों में बहुत प्रेम था, कि वे अलग हो जाने की कल्पना मात्र से ही व्यथित हो उठते थे। एक बार राजा पुण्डरीक की सभा में गन्धर्वों सहित सभी विराजमान थे। वहाँ गन्धर्वों के साथ ललित भी गायन कर रहा था। उस समय उसकी प्रियतमा ललिता वहाँ उपस्थित नहीं थी। ललित को गायन करते-करते अचानक से ललिता ख्याल आ गया, जिसके कारण गायन का लय बिगड़ गया। इससे नाराज हो नागराज कर्कोटक ने राजा पुण्डरीक से गंधर्व ललित की शिकायत कर दी। जिससे राजा को क्रोध आया और उन्होंने क्रोधवश ललित को श्राप दिया- कि तू मेरे सम्मुख गायन करते हुए भी स्त्री का स्मरण कर रहा है |जा तू नरभक्षी दैत्य बनकर अपने कर्म का फल भोग।
गंधर्व ललित उसी समय राजा पुण्डरीक के श्राप से एक दैत्य के परिवेश में बदल गया | इस तरह गंधर्व ललित राक्षस बन जाने पर वह अनेक दुःख भोगने लगा। अपने प्रियतम ललित की ऐसी हालत देख ललिता दुःख से व्यथित हो गई। और अपने पति के उद्धार के लिए विचार करने लगी कि मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ? किस तरह अपने पति को इस नरक से मुक्त कराऊँ?
राक्षस बन ललित वनों में रह पाप करने लगा। ललिता भी उसके पीछे-पीछे जाती और उसकी हालत देखकर विलाप करने लगती। एक बार अपने पति के पीछे-पीछे चलते हुए ललिता विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई। उस स्थान पर उसने श्रृंगी मुनि का आश्रम देखा। वह शीघ्रता से उस आश्रम पर गई और मुनि को प्रणाम कर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी- 'हे महर्षि! मैं वीरधन्वा नामक गन्धर्व की पुत्री ललिता हूँ, मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से दैत्य बन गये है। मै अपने पति के हालत को देखकर बहुत दुखी हूँ। कृपा कर आप उन्हें राक्षस योनि से मुक्ति का कोई उत्तम उपाय बताएँ।'
ललिता की बात सुनकर मुनि श्रृंगी ने कहा- 'हे पुत्री! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी का व्रत करने से प्राणी के सभी मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण हो जाते हैं। यदि तुम इस व्रत को कर अपने पुण्य अपने पति को देगी तो वह सहज ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा।
ललिता ने श्रद्धापूर्वक कामदा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों के समक्ष अपने व्रत का फल अपने पति को दे दिया और ईश्वर से प्रार्थना की - हे प्रभु मैंने जो यह व्रत किया है, इसका फल मेरे पतिदेव को मिले, जिससे उन्हें राक्षस योनि से शीघ्र ही मुक्ति मिल जाए ।
ललिता द्वारा एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त हो गया और अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुआ। वह अनेक सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत हो पहले की भाँति गंधर्व योनि को प्राप्त किया।
प्राणी अपने सुखों का चिन्तन करे | लेकिन समय-असमय चिन्तन करने से प्राणी को उसके दायित्वों से विमुख कर देता है, जिससे कारण कष्ट भोगने पड़ते हैं। गन्धर्व ललित ने भी राक्षस होकर निन्दित कर्म किये और कष्ट भोगे, परन्तु भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा और एकादशी के फल से उसे पुन: गंधर्व योनि प्राप्त हो गई ।
!!जय श्री हरि!!
मोहिनी एकादशी
🌸मोहिनी एकादशी🌸
एक बार भगवान श्री राम जी ने महर्षि वशिष्ठ जी से पूछा - हे गुरूवर मैं जनक नन्दिनी सीता जी के वियोग में बहुत कष्ट भोगे है कृपया कर आप मुझे कोई ऐसा उपाय या व्रत बतलाई जिसके करने से मेरे कष्टों का निवारण हो सके।
महर्षि वशिष्ठ जी ने कहा - हे श्री राम आपके नाम के स्मरण मात्र से ही संसार के मनुष्यों के सारे कष्ट अपने आप ही समाप्त हो जाते है। लेकिन आपने लोकहित के लिए बहुत ही सुंदर प्रश्न किया है। इस हेतु मैं आपको एक ऐसे व्रत की माहात्म्य बतलाना चाहता हूॅ। जिसके करने मात्र से ही मनुष्य के सारे पाप, कष्ट, दुख एंव क्लेश स्वंय ही समाप्त हो जाते है। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी जिसका नाम मोहिनी एकादशी है। इस एकादशी के व्रत करने से मनुष्य के सारे कष्ट और पाप समाप्त हो जाते है। अतः हे राम, यह एकादशी का व्रत सभी को करना चाहिए। मैं आपको इसका एक रोचक कथा सुनाता हूॅ।
प्राचीन काल में सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगर हुआ करती थी, जहाॅ द्युतिमान नाम एक चंद्रवशी राजा था । वही उसके ही नगर में एक वैश्य भी था। जिसका नाम धनपाल था, जो कि धन-धान्य से संपन्न था। धन-धान्य से संपन्न होने के साथ - साथ वह धार्मिक प्रवृत्ति और भगवान नारायण का भक्त भी था। उस धर्मपाल ने नगर में अनके जगहों पर धर्मशालाएं, भोजनालय, कुएॅ, तालाब आदि का निर्माण कराया था, और नगर के सड़कों के किनारे अलग-अलग किस्म के वृक्ष का रोपण भी कराये थे । जिससे आने-जाने वाले जनों को उसका लाभ मिलता था। धर्मपाल के पाॅच पुत्र थे, जिनका नाम सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबृद्धि था। जिनमें उनका एक पुत्र धृष्टबृद्धि अत्यधिक पापी एवं दुष्ट प्रवृत्ति का था। वह हमेशा दुष्टों संगत में ही लीन रहता था, और साथ ही देवता एवं पितृ का मान-सम्मान भी नही किया था। वह हमेशा अपने पिता के धनों को बुरे व्यसन में ही खर्च किया करता। मदिरापान करना, मांस खाना और घर से आभूषणों की चोरी करता इस प्रकार वह अन्य प्रकार के पापकर्म किया करता । जिससे कारण परिवार के सभी सदस्यों ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह किसी कि बात नहीं समझता था, तब राजा ने उसे कारागार में बंद करावा दिया । लेकिन फिर भी नहीं मानने के बाद राजा ने उसे राज्य से बाहर करने का आदेश दे दिया । जिससे उसे राज्य से बाहर निकाल दिया गया, राज्य से बाहर निकालने के बाद कुछ ही दिन में उसके सारे धन समाप्त हो गये। जिससे उसके सारे साथियो ने भी उसका साथ छोड़ दिया। और फिर वह अकेले ही वन में जाकर वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा और अपना जीवन यापन करने लगा । कुछ समय बाद ही वह एक बहेलिया बन गया। एक बार भूख से विचलित हो खाने की तलाश करते हुए कौडिन्य ऋषि के आश्रम के समीप जा पहुॅचा । वह वैशाख का माह था, ऋषि कौडिन्य गंगा स्नान करके गीले वस्त्र धारण करके ही आश्रम वापस आ रहे थे । जिसके कारण उनके वस्त्रों से पानी के छीटे पड़ रहे थे । उसी पानी के कुछ छीटे धृष्टबृद्धि पर भी पड़ी जिससे उसमें थोड़ी सद्बुद्धि की प्राप्त हुई। और वह ऋषि कौडिन्य मुनि के समक्ष हाथ जोड़कर कहने लगा। हे ऋषिवर मैंने आज तक जीवन से बहुत पाप किए है । कृपया कर आप मुझे कोई ऐसा उपाय बताये जिसके करने से मैं पापमुक्त हो सकू । कौडिन्य उसकी बात सुन प्रसन्न हो गये और उसे वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले मोहिनी एकादशी के बारे में संक्षिप्त विधि अनुसार बताया । जिससे उसके सारे पाप समाप्त हो गये । और एकादशी के प्रभाव के कारण उसे श्री हरि के धाम के करने इसकी कथा का श्रवण करने से ही हजारों गौदान के फल की प्राप्ति होती है। इसलिए कहाॅ जाता हैं, मनुष्य को हमेशा संतो का संग करना अति आवश्यक है, जिससे जीवन में हमेशा सही राह और सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है। दुष्टजनाें की संगत हमेशा कष्टदायक होती है।
॥ हरेकृष्णा ॥ जय श्री हरि ॥ हरे रामा ॥
एक बार भगवान श्री राम जी ने महर्षि वशिष्ठ जी से पूछा - हे गुरूवर मैं जनक नन्दिनी सीता जी के वियोग में बहुत कष्ट भोगे है कृपया कर आप मुझे कोई ऐसा उपाय या व्रत बतलाई जिसके करने से मेरे कष्टों का निवारण हो सके।
महर्षि वशिष्ठ जी ने कहा - हे श्री राम आपके नाम के स्मरण मात्र से ही संसार के मनुष्यों के सारे कष्ट अपने आप ही समाप्त हो जाते है। लेकिन आपने लोकहित के लिए बहुत ही सुंदर प्रश्न किया है। इस हेतु मैं आपको एक ऐसे व्रत की माहात्म्य बतलाना चाहता हूॅ। जिसके करने मात्र से ही मनुष्य के सारे पाप, कष्ट, दुख एंव क्लेश स्वंय ही समाप्त हो जाते है। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी जिसका नाम मोहिनी एकादशी है। इस एकादशी के व्रत करने से मनुष्य के सारे कष्ट और पाप समाप्त हो जाते है। अतः हे राम, यह एकादशी का व्रत सभी को करना चाहिए। मैं आपको इसका एक रोचक कथा सुनाता हूॅ।
प्राचीन काल में सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगर हुआ करती थी, जहाॅ द्युतिमान नाम एक चंद्रवशी राजा था । वही उसके ही नगर में एक वैश्य भी था। जिसका नाम धनपाल था, जो कि धन-धान्य से संपन्न था। धन-धान्य से संपन्न होने के साथ - साथ वह धार्मिक प्रवृत्ति और भगवान नारायण का भक्त भी था। उस धर्मपाल ने नगर में अनके जगहों पर धर्मशालाएं, भोजनालय, कुएॅ, तालाब आदि का निर्माण कराया था, और नगर के सड़कों के किनारे अलग-अलग किस्म के वृक्ष का रोपण भी कराये थे । जिससे आने-जाने वाले जनों को उसका लाभ मिलता था। धर्मपाल के पाॅच पुत्र थे, जिनका नाम सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबृद्धि था। जिनमें उनका एक पुत्र धृष्टबृद्धि अत्यधिक पापी एवं दुष्ट प्रवृत्ति का था। वह हमेशा दुष्टों संगत में ही लीन रहता था, और साथ ही देवता एवं पितृ का मान-सम्मान भी नही किया था। वह हमेशा अपने पिता के धनों को बुरे व्यसन में ही खर्च किया करता। मदिरापान करना, मांस खाना और घर से आभूषणों की चोरी करता इस प्रकार वह अन्य प्रकार के पापकर्म किया करता । जिससे कारण परिवार के सभी सदस्यों ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह किसी कि बात नहीं समझता था, तब राजा ने उसे कारागार में बंद करावा दिया । लेकिन फिर भी नहीं मानने के बाद राजा ने उसे राज्य से बाहर करने का आदेश दे दिया । जिससे उसे राज्य से बाहर निकाल दिया गया, राज्य से बाहर निकालने के बाद कुछ ही दिन में उसके सारे धन समाप्त हो गये। जिससे उसके सारे साथियो ने भी उसका साथ छोड़ दिया। और फिर वह अकेले ही वन में जाकर वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा और अपना जीवन यापन करने लगा । कुछ समय बाद ही वह एक बहेलिया बन गया। एक बार भूख से विचलित हो खाने की तलाश करते हुए कौडिन्य ऋषि के आश्रम के समीप जा पहुॅचा । वह वैशाख का माह था, ऋषि कौडिन्य गंगा स्नान करके गीले वस्त्र धारण करके ही आश्रम वापस आ रहे थे । जिसके कारण उनके वस्त्रों से पानी के छीटे पड़ रहे थे । उसी पानी के कुछ छीटे धृष्टबृद्धि पर भी पड़ी जिससे उसमें थोड़ी सद्बुद्धि की प्राप्त हुई। और वह ऋषि कौडिन्य मुनि के समक्ष हाथ जोड़कर कहने लगा। हे ऋषिवर मैंने आज तक जीवन से बहुत पाप किए है । कृपया कर आप मुझे कोई ऐसा उपाय बताये जिसके करने से मैं पापमुक्त हो सकू । कौडिन्य उसकी बात सुन प्रसन्न हो गये और उसे वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले मोहिनी एकादशी के बारे में संक्षिप्त विधि अनुसार बताया । जिससे उसके सारे पाप समाप्त हो गये । और एकादशी के प्रभाव के कारण उसे श्री हरि के धाम के करने इसकी कथा का श्रवण करने से ही हजारों गौदान के फल की प्राप्ति होती है। इसलिए कहाॅ जाता हैं, मनुष्य को हमेशा संतो का संग करना अति आवश्यक है, जिससे जीवन में हमेशा सही राह और सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है। दुष्टजनाें की संगत हमेशा कष्टदायक होती है।
॥ हरेकृष्णा ॥ जय श्री हरि ॥ हरे रामा ॥
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