रूसी मैं बालों की कैसे करे देख रेख

No comments :
अपने बालों से हम सभी को प्यार है. बाल सिर्फ हमारे look का हिस्सा ही नहीं बल्कि हमारे confidence का भी एक main पार्ट है. शीशा सामने आते ही जिस चीज की तरफ हमारी सबसे पहले नजर पड़ती है वह है हमारे बाल. लेकिन जब इन बालों में रूसी पड़ जाती है तो ये हमारे बालों के लिए कई तरह की दिक्कते पैदा कर देती है.रूसी से न सिर्फ हमारे बालो की सुन्दरता खराब होती बल्कि खुजली, रूखापन और बालों का झड़ना भी शुरू हो जाता है. तो चलिए हम जानते है की इससे छुटकारा पाया जा सकता है।

नींबू से धुलना :-  3-4 नीबुओं के छिलके उतारकर उन्हें 4-5 कप पानी में 15-20 मिनट के लिये उबालें। जब ठंडा हो जाये तो इस घोल से सप्ताह में कम से कम एक बार अपने बालों को धोयें।

मेथी से उपचार:-   2 चम्मच मेंथी को रात भर पानी में भिगोयें और अगली सुबह उन्हें पीस कर लेप बना लें। इस लेप को अपने बालों और सिर पर कम से कम 30 मिनट के लिये लगायें। 30 मिनट के बाद बालों को अच्छी तरह से धुलें। बेहतर परिणाम के लिये इस प्रक्रिया को चार हफ्तों के लिये दोहरायें।


सिरके से उपचार:-   सिरके और पानी की समान मात्रा में मिलाकर एक मिश्रण बना लें। इस मिश्रण को अपने सिर पर लगाकर रात भर के लिये छोड़ दें। अगली सुबह अपने बालों को बच्चों वाले सौम्य शैम्पू से धुलें।
दही का घोल:-   अपने सिर और बालों पर थोड़ा सा दही लगाकर कम से से कम एक घण्टे इन्तजार करें। इसके बाद सौम्य शैंपू से इसे अच्छी तरह धो लें। यह प्रक्रिया सप्ताह में कम से कम दो बार करें।

गुनगुने तेल की मालिश :-   बादाम, नारियल या जैतून के गुनगुने तेल से सिर की मालिश करने से रूसी कम होगी। मालिश के बाद तेल को सिर पर रात भर के लिये छोड़ें।
एलोवेरा का प्रयोग :-  नहाने से 20 मिनट पूर्व एलोवेरा जेल अपने सिर पर लगायें। 20 मिनट के लिये छोड़ने के बाद अपने बालों को शैम्पू से धुलें।

आयुर्वेदिक मैं बालों की कैसे करें देखरेख

No comments :
चाहे महिला हो या पुरुष दोनों को ही अपने बालों से बेहद लगाव होता है। बालों की सुंदरता के लिए हम-आप बाजार में उपलब्ध कई तरह के सौंदर्य उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं। मगर इन सौंदर्य उत्पादों में मौजूद केमिकल बाल की जड़ों को कमजोर करते हैं।
बालों की सुंदरता यानि बालों का काला, घना, लंबा और रेशमी होना तभी संभव है जब बालों की जड़ मजबूत हो। बालों की जड़ को मजबूती आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों, तेल और औषधियों से मिलती है। बालों की संपूर्ण देखभाल के लिए आयुर्वेद में कारगर उपायों का खजाना है। आइए जानते हैं बालों की देखभाल के लिए आयुर्वेद के कारगर टिप्स।

काले बालों के लिए आयुर्वेदिक टिप्स:

1. शिकाकाई और आंवला :
लंबे और रेशमी बालों के लिए शिकाकाई और आंवले से बालों को धोएं। शिकाकाई और सूखा आंवला बराबर मात्रा में लें। रात में दोनों को पानी में भींगने के लिए छोड़ दें। सुबह पानी को कपड़े से छान कर निकाल लें। अब इस पानी को सिर पर मलें और बालों को धोएं। बालों के सूखने के बाद इनमें नारियल तेल लगाएं। इस विधि को आजमाने से बाल काले, घने और लंबे होते हैं।



2. भृंगराज :
भृंगराज को भली-प्रकार काटकर बारीक बनाया हुआ चूर्ण और काले तिल को बराबर मात्रा में मिलाएं। रोज़ सुबह के समय एक चम्मच यह चूर्ण खूब चबाकर खाएं और उपर से ताजा पानी पी लें। लगातार छह महीने इसे आजमाने से समय से पहले बालों का पकने और झड़ने की शिकायत से छुटकारा मिल जाएगा। केश काले, घने और चमकदार होंगे।

3. दही का शैंपू :
साबुन के स्थान पर 100 ग्राम दही में थोड़ी सी काली मिर्च मिलाकर हफ्ते में इससे बालों को धोएं। इससे बाल काले होते हैं, झड़ने बंद होते हैं और बालों का सौंदर्य खिल उठता है।

4. नींबू का शैंपू :
मटमैले बालों को काला बनाने के लिए नींबू का रस निचोड़ कर उसमें दो कप गर्म पानी डालें। बालों को गीला करने के बाद इस नींबू के शैंपू को सिर में डालकर रगड़ें। याद रखें ऐसा करने के बाद बालों को पानी से न धोएं, तौलिए से बाल सुखाएं। कुछ देर बाद सूर्य की धूप में बैठकर कंघी से केश संवारें। हफ्ते में दो-तीन बार ऐसा करने से बाल स्वाभाविक रुप से काले होते हैं।

बर्फ भी बन सकती है सुंदरता का एक हिस्सा

No comments :
जब बात आती है सुंदरता के हैक की तो हम बर्फ़ को बहुत नीचा मानते हैं, इसे बनाना काफ़ी आसान है और सबसे बड़ी बात है की ये बिलकुल मुफ़्त है और हमें पता है की ये अब भी आपके फ़्रिज में मौजूद होगा|
चेहरे पर बर्फ़ के टुकड़ों को रगड़ने के अद्बुध फ़ायदे हैं| नीचे दिए गए इसके कुछ फ़ायदे आपके ब्यूटी रूटीन के लिए काफ़ी सही साबित होंगे, इसका इस्तेमाल आपको त्वचा की कई बीमारियों से भी दूर रखेगा।


1. पिम्पल को घटाना : 


बर्फ़ का सबसे अच्छा इस्तेमाल आता है आपके दाने को घटाने में| आखिर कार पिम्पल एक हलकी-फुलकी चोट जो होती है| बर्फ़ आपके दानों की लाली और सूजन को कम करता है| जिस तरह ये आपकी चोट को सुन करता है उसी तरह ये आपके दाने की दर्द को कम कर सकता है| अपने दानों पर बर्फ़ लगाते समय ध्यान रखें की आपके दाने बैक्टीरिया से भरपूर हैं तो उसपर आहिस्ता से बर्फ़ लगाएं ।

कैसे लगाएं: अपने मुँह को अच्छे से धोएं और उसे एक तौलिये से पोछें। बर्फ़ के टुकड़े को एक साफ़ पेपर की तौलिये या प्लास्टिक बैग में रखकर उसे अपने दाने के ऊपर 1 मिनट के लिए रखें ।5 मिनट का ब्रेक लें और अगर ज़रूरत पड़े तो इसे फ़िरसे दोहराएं।


2. ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ावा देता है : 

अपनी डल त्वचा पर बर्फ़ लगाकर उसे निखारें| बर्फ़ की ठंडक आपके ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ावा देगी जिससे आपकी त्वचा का रंग और निखरेगा| आपका चेहरा बिना मेकअप लगाए चमकेगा, सुबह उठते साथ ही बर्फ़ लगाने से आपकी त्वचा को एक अच्छा एक्सरसाइज मिलेगा ।

कैसे लगाएं: अपने चेहरे को धोएं और उसे तौलिये से पोछें| बर्फ़ के टुकड़े को एक साफ़ पेपर की तौलिये या प्लास्टिक बैग में लपेट कर उसे अपने चेहरे और गर्दन का मसाज करें| अधिक ज़ोर से मालिश करें क्योंकि उससे आपकी त्वचा पर नुकसान पड़ सकता है| अपनी आँखों के आस-पास रगड़ें और चेहरे से पानी को पोछने के बजाए उसे खुद ही सूखने दें।

3. आँखों की सूजन को घटाता है : 

हर तरह का कोल्ड पैक सूजी या थकी हुई आँखों के लिए काफ़ी अच्छा होता है और इन कोल्ड पैक में आते हैं वो प्लेन बर्फ़ के टुकड़े या वो टुकड़ें जो दूध या ग्रीन टी से बनाये गए हों| क्योंकि आपकी आँखों के आस-पास की त्वचा काफ़ी नाज़ुक होते हैं इसलिए बर्फ़ के टुकड़ों को अधिक समय तक अपनी आँखों के नीचे ना रगड़ें।

कैसे लगाएं: 
साधारण पानी, ग्रीन टी या दूध से बर्फ़ के टुकड़े बनाएं| अपने मुँह को धोकर उसे सुखाएं और उस बर्फ़ के टुकड़े को पेपर की तौलिये या प्लास्टिक बैग में लपेट कर अपनी आँखों पर कम समय तक रगड़ें, एक बार जब ये हो जाए तो अपनी त्वचा को तौलिये से पोछ लें।

4. त्वचा को एक्सफोलिएट करता है : 

एक सस्ते फेशियल के लिए, अपनी त्वचा के लिए दूध के इस्तेमाल से बर्फ़ के टुकड़े तैयार करें| दूध में मौजूद लैक्टिक एसिड आपके डेड सेल का सफाया करेगी और आपको फ्रेश महसूस होगा| आप खीरे या ब्लूबेरी के इस्तेमाल से भी बर्फ़ के टुकड़े तैयार कर सकती हैं, ये आपकी त्वचा को में चमक प्रदान करेगा।

कैसे लगाएं: अपनी पसंद की चीज़ों को इस्तेमाल कर के बर्फ़ के टुकड़े तैयार करें| अपने मुँह को धोएं और उसे सूखा कर आहिस्ते-आहिस्ते बर्फ़ के टुकड़े को अपनी त्वचा पर तब तक रगड़ें जब तक बर्फ़ पिघल ना जाए| इसे लगाने के बाद अपने चेहरे को हल्का गर्म पानी से धोएं।

5. नैचरल प्राइमर का काम करता है : 

क्या आप फाउंडेशन के नीचे प्राइमर का इस्तेमाल करती हैं? अगली बार मेकअप करने से पहले अपने चेहरे पर बर्फ़ रगड़ें! ये आदत आपके चेहरे पर मौजूद छेद को घटाएगा और आपको बेदाग़ दिखायेगा।

6. त्वचा को ऑयली लगने से रोकता है : 

ऑयली त्वचा अधिकतर महिलाओं के लिए सबसे बड़ा चिंता का विषय रहती है| लेकिन परेशान ना हों, आपको केवल बर्फ़ के टुकड़े की आवश्यकता है! बर्फ़ के टुकड़े आपकी त्वचा पर चिपचिपा पन को घटाते हैं और उसे तरो-ताज़ा कर देते हैं।

कैसे लगाएं: अपना मुँह धोने के फ़ौरन बाद अपनी त्वचा पर वर्फ़ के टुकड़ों को रगड़ें| इसे करने के बाद अपने चेहरे पर मॉइस्चराइजर लगाएं|


दातुन के फायदे

No comments :
प्राचीनकाल में जब दांत साफ करने के लिए ब्रशों का अविष्‍कार नहीं हुआ था तब लोग अपने दांत साफ रखने के लिए नीम या बबूल की छाल से अपने दांत साफ किया करते थे। दातुन से सिर्फ दांत स्‍वस्‍थ रहता था बल्कि ये दांतों के बीच कीटाणु या बैक्टिरिया पनपने नहीं देते थे। आज हालांकि बाजारों में मौजूद तरह-तरह के हर्बल, केमिकल टूथपेस्ट और पाउडर मौजूद हैं जो दांतों को सुरक्षित और सुंदर बनाने के दावा करते हैं। ऐसे में लोग अब औषधीय गुणों से भरपूर नीम के दातुन या अन्य दातुन को नजरअंदाज करने लगे हैं। लेकिन आज भी कई गांवों में बुजुर्ग दांतों को साफ करने के लिए दातुन का इस्तेमाल करते हैं।
आज की पीढ़ी के बच्‍चों को तो दातुन के बारे में मालूम होगा। आयुर्वेद में भी दातुन करने के फायदों के बारे में बताया गया है, आज हम आपको दातुन के आयुर्वेदिक लाभों के बारे में बताएंगे।

धार्मिक महत्‍व दातुन का वर्णन आयुर्वेद में भी हैं, धर्म और अध्यात्म की दृष्टि से भी बेहतर माना जाता है। यही वजह है कि व्रत, त्यौहार वाले दिन बहुत से लोग ब्रश की बजाय दातुन से दांत साफ करते हैं। धार्मिक दृष्टि से दातुन का महत्व इसलिए भी माना जाता है, क्योंकि दातुन जूठा नहीं होता जबकि टुथब्रश हर दिन नया प्रयोग नहीं किया जा सकता है।



क्‍या कहा गया है आयुर्वेद में :
आयुर्वेद में वर्णित दंतधावन विधि में अर्क, न्यग्रोध, खदिर, करज्ज, नीम, बबूल आदि पेड़ों की डंडी की दातुन करने की सलाह दी जाती है। दरअसल आयुर्वेद में मुख प्रदेश यानी मुंह को कफ का मुख्‍य स्‍थान बताया गया हैं। ऐसे में सुबह का काल भी कफ प्रधान होता है व पूरी रात सोने के कारण मुह के अंदर कफ जमा हो जाता है। इसलिए शास्‍त्रों में कफ दोष का नाश करने वाले कटु, तिक्त एवं कसैला प्रधान रस वाली दातुन का प्रयोग करने को कहा जाता है

नीम का दातुन :
आयुर्वेद में बताया गया है कि नीम का दातुन केवल दांतों को ही स्वस्थ नहीं रखता, बल्कि इसे करने से पाचन क्रिया ठीक होती है और चेहरे पर भी निखार आता है। यही वजह है कि आज भी बहुत से पुराने लोग नियमित नीम की दातुन का ही इस्तेमाल करते हैं।

बेर का दातुन :
आयुर्वेद के अनुसार बेर के दातुन से नियमित दांत साफ करने पर आवज साफ और मधुर होती है। इसलिए जो लोग वाणी से संबंधित क्षेत्रों में रुची रखते हैं या इस क्षेत्र से जुड़े हैं, उन्हें बेर के दातुन का नियमित इस्तेमाल करना चाहिए।

बबूल का दातुन :
मसूड़ों और दांतों की मजबूती के लिए बबूल के दातुन से दांत साफ करने चाहिये। ये दांतो और मसूड़ों दोनों को अच्छा रखता है।

कैसे करें दातुन :
दातुन को ऊपर के दांतों में ऊपर से नीचे की ओर और नीचे के दांतों में नीचे से ऊपर की ओर करा चाहिये। इससे मसूड़े मजबूत होंगे और पायरिया की समस्या भी नहीं होगी। नीम का दातुन नेचुरल सांसों की बदबू को भी खत्‍म करता हैं।

ईमानदारी का साथ कभी नही छोड़ना चाहिये ,परिस्थितियां चाहे केसी भी हो जाये

No comments :

एक व्यापारी के पास दो हीरे थे, एक असली और दूसरा नकली, उसने राजा ने कहा कि कोई इन हीरों की पहचान नहीं कर सकता, राजा भी असली हीरे को नहीं पहचान पाए, तब एक अंधे ने बता दिया असली हीरा कौन-सा है



किसी नगर में एक राजा रहता था। एक दिन उसके पास एक व्यापारी आया। उसने राजा से कहा कि- मेरे पास दो हीरे हैं, दोनों एक जैसे दिखते हैं, लेकिन इनमें से एक नकली है और दूसरी असली। अगर आप या आपके नगर में कोई और ये बता दे कि कौन-सा हीरा असली है और कौन-सा नकली तो मैं आपको ये हीरा उपहार में दे दूंगा और अगर कोई न बता पाया तो आपको इस हीरे का मूल्य मुझे देना होगा।




राजा ने जब दोनों हीरों को देखा तो वो भी पहचान नहीं पाए। राजा ने व्यापारी से कहा कि- कल हम महल के बाहर हमारे बगीचे में इन हीरों को रखेंगे, तब हमारे नागरिक और मंत्री आपके इस प्रश्न को उत्तर देंगे। व्यापारी ने कहा ठीक है। राजा ने राज्य में इस बात का एलान करवा दिया।

अगले दिन राजा के बगीचे में बहुत से लोग आए। राजा ने ये भी कहा कि जो गलत उत्तर देगा और सजा भी दी जाएगी। बहुत सारे लोग आए, उन्होंने दोनों हीरों को देखा, लेकिन कोई भी जवाब नहीं दे पाया, क्योंकि उन्हें लगा कि अगर उनका उत्तर गलत निकला तो राजा उसे सजा देंगे। इस तरह बहुत देर हो गई।

कुछ देर बाद एक अंधा आदमी राजा के पास आया और बोला कि- मैं बता सकता हूं कि कौन-सा हीरा असली है और कौन-सा नकली। उसकी बात सुनकर राजा के मंत्री हंसने लगे। राजा ने उसे एक मौक दे दिया। उस अंधे आदमी ने दोनों हीरों को हाथ लगाया और बता दिया कि कौन-सा हीरा असली है।

व्यापारी ने भी मान लिया कि अंधा जो बोल रहा है, वह सच है। राजा ने अंधे से पूछा कि- तुम्हें कैसे पता चला कि कौन-सा हीरा नकली है और कौन-सा नकली। अंधे ने कहा कि- मैंने जब पहले हीरे को छुआ तो वह धूप की वजह से गर्म हो चुका था, जबकि दूसरा हीरा बिल्कुल ठंडा था। जो धूप में गर्म हो गया वह कांच का टुकड़ा था और दूसरा असली हीरा।

नारियल पानी से हटाये चेहरे के दाग धब्बे

No comments :
चेहरे के दाग धब्बों और कील मुंहासों , को दूर करेगा नारियल पानी करें प्रयोग

नारियल पानी आपकी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है, यह तो आप भी जानते हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि नारियल पानी आपकी त्वचा के दाग-धब्बों को दूर कर इसकी खूबसूरती भी बढ़ाता है। नारियल पानी में ढेर सारे एंटीऑक्सिडेंट्स और पोषकतत्व होते हैं, जो शरीर के साथ-साथ त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। आजकल प्रदूषण और धूप-धूल के कारण चेहरे की त्वचा सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। चेहरे पर रूखापन, दाग-धब्बे और कील-मुंहासों की समस्या आम हो गई है। ऐसे में नारियल पानी के त्वचा पर प्रयोग से आप त्वचा संबंधी सभी समस्याओं से राहत पा सकते हैं। आइए आपको बताते हैं कैसे करें इसका प्रयोग।



निखार लाता है नारियल पानी

नारियल पानी से चेहरा धोने से चेहरे पर निखार आता है। दरअसल नारियल पानी में ढेर सारे एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल्स होते हैं, जो त्वचा की गहराई में जाकर त्वचा को पोषण देते हैं। नारियल पानी में विटामिन सी, मैग्नीशियम, मैग्नीज, पोटैशियम, सोडियम और कैल्शियम भी भरपूर मात्रा में होता है। इसलिए ये त्वचा की अच्छी तरह टोनिंग करता है और प्राकृतिक रंगत को बाहर लाता है।

चेहरे के दाग-धब्बे दूर करे

नारियल पानी से चेहरा धोने से चेहरे के दाग-धब्‍बों में काफी राहत मिलती है। इसके लिए सप्ताह में 2-3 बार चेहरे पर नारियल पानी लगाकर 10 मिनट के लिए छोड़ दें और फिर नारियल पानी से ही चेहरे पर मसाज करें। इसके बाद सादे पानी से इसे धो लें। इस प्रयोग से त्वचा में मौजूद दाग धब्बे धीरे-धीरे कम हो जाएंगे और झाइयों से भी राहत मिलेगी। नारियल पानी के इस्तेमाल से चेहरे की प्राकृतिक चमक भी बरकरार रहेगी।

दूर होगी मुंहासों की समस्या

हार्मोनल बदलाओं और गलत खान-पान या इंफेक्शन के कारण कई बार मुंहासे हो जाते हैं। ऑयली स्किन वाले लोगों को अक्सर कील-मुंहासों की शिकायत रहती है। ऐसे में नारियल पानी का इस्‍तेमाल बहुत फायदेमंद होता है। अगर आपके चेहरे पर मुंहासे हो गये हैं तो नारियल पानी से चेहरा साफ करें। इससे धीरे-धीरे मुंहासे ठीक हो जाएंगे और चेहरे पर धब्बे भी नहीं बनेंगे।

टैनिंग की समस्या से छुटकारा

सर्दी हो या गर्मी, धूप में ज्यादा देर रहने से त्वचा पर टैनिंग की समस्या हो जाती है। टैनिंग और सनबर्न की समस्‍या से भी नारियल पानी आपको तुरंत छुटकारा दिलाता है। यदि धूप में ज्यादा देर रहने से त्वचा झुलस गई है या चेहरा जलने लगा है, तो इसपर रूई की मदद से नारियल पानी लगाएं। प्रतिदिन दो बार चेहरे पर नारियल पानी लगाने से त्वचा साफ हो जाती है। यदि चेहरे पर आवंछनीय निशान काफी परेशान करते हैं, तो आप नारियल पानी को फेसपैक की तरह इस्‍तेमाल कर सकते हैं।

महाराणा प्रताप सिंह कौन थे ??

No comments :
राजपूत शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह उदयपुर,मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे।वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर मेवाड़ मुकुटमणि राणा प्रताप का जन्म हुआ।महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर
के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती
है।महाराणा का नाम इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिये अमर है।महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था,जिसका नाम 'चेतक' था।मित्रो आप सब ने महाराणा
प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा,लेकिन उनका एक हाथीभी था। जिसका नाम था रामप्रसाद।

     नाम - कुँवर प्रताप जी (श्री महाराणा प्रताप सिंह जी)
     जन्म - 9 मई, 1540 ई.
     जन्म भूमि - कुम्भलगढ़, राजस्थान
     पुण्य तिथि - 29 जनवरी, 1597 ई.
     पिता - श्री महाराणा उदयसिंह जी
     माता - राणी जीवत कँवर जी
     राज्य - मेवाड़
     शासन काल - 1568–1597ई.
     शासन अवधि - 29 वर्ष
     वंश - सुर्यवंश
     राजवंश - सिसोदिया
     राजघराना - राजपूताना
     धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म
     युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध
     राजधानी - उदयपुर
     पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह
     उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह



महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी:-


  •  महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
  • जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए| तब माँ का जवाब मिला- उस महान देश की वीर भूमिहल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था |“बुक ऑफ़प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब में आप यह बात पढ़ सकते 
  • महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।
  • आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
  • अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी|लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया । 
  • हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए ।
  • महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
  • महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं| इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है|मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को |
  • हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था |
  •  महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे।जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे ।
  • महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |
  • मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे|आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं तो दूसरी तरफ भील |
  •  महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |
  •  राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथीकी सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे।
  • मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे |
  •  महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।

सर्दियों में रूखी त्वचा वाले ऐसे रखे अपनी त्वचा का ख्याल नहीं पड़ेगी झुर्रियां

No comments :
सर्दियों में रूखी त्वचा वाले ऐसे रखे अपनी त्वचा का ख्याल नहीं पड़ेगी झुर्रियां 

हमारी त्वचा पोर्स (रोम छिद्रों) के माध्यम से सांस लेती है और पोर्स के बंद हो जाने पर न केवल त्वचा को सांस लेने में रुकावट आती है बल्कि पसीने के रूप में निकलने वाले विकार भी रुककर पनपने लगते हैं। ठंड में त्वचा का रूखापन काफी परेशान करता है। इसे ड्राई स्किन की समस्या कहते हैं। रूखी त्वचा पर बार-बार कोल्ड क्रीम लगानी पड़ती हैं, फिर भी राहत नहीं मिल पाती। ये समस्या पूरी सर्दियां पीछा नहीं छोड़ती। त्वचा के रूखे होने से उसकी सुंदरता में भी कमी आती है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि सर्दियों के इस मौसम में ड्राई स्किन की समस्या से बचा जाए। आइए जानते हैं स्किन से जुड़ी समस्या और उनके समाधान।

त्वचा रोगों का उपचार 

त्वचा संबंधी कोई रोग हो जाने पर सभी प्रकार के नहाने के साबुनों और बाहरी तेलों के प्रयोग को बंद कर देना सबसे पहला उपाय है। इसके स्थान पर आपको नहाते समय गीले तौलिये से त्वचा को धीरे-धीरे रगडऩा चाहिए। इस उपाय को करने से पोर्स खुलने के साथ-साथ शरीर की मसाज के रूप में अच्छी एक्सरसाइज हो जाती है। वैसे तो गीले तौलिये से रगडऩे से ही त्वचा की सफाई अच्छी तरह से हो जाती है, फिर भी अगर आपको लगे कि त्वचा अच्छी तरह साफ नहीं हुई है, तो सप्ताह में एक बार किसी हर्बल साबुन का उपयोग किया जा सकता है। 


त्वचा रोगों के लिए मिट्टी 

गीले तौलिए वाला उपाय करने से त्वचा रोगों में राहत मिलती है, लेकिन अगर आपकी समस्या बहुत पुरानी है, तो उसे जल्द ठीक करने के लिए उस स्थान पर गीली मिट्टी का लेप करना चाहिए। ऐसी मिट्टी पूरी तरह साफ की हुई होनी चाहिए और उसमें किसी भी प्रकार की गंदगी, कूड़ा-करकट या कंकड़ नहीं होने चाहिए। इस मामले में चिकनी मिट्टी और पीली मिट्टी सबसे अच्छी होती है। या आप बाजार में हर जगह उपलब्ध मुल्तानी मिट्टी को पानी में भिगोकर उसका उपयोग कर सकते हैं। मुल्तानी मिट्टी त्वचा से गंदगी साफ करने के लिए बहुत कारगर है और इसके कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। यह त्वचा रोगों में राहत प्रदान करने और त्वचा को मुलायम रखने में बहुत सहायक है।

मिट्टी का इस्तेमाल 

  • अगर समस्या पूरे शरीर में हो, तो पूरे शरीर पर मिट्टी का लेप करना चाहिए। लेप करने के बाद थोड़ी देर धूप में बैठना चाहिए। इससे समस्या जल्द ठीक हो जायेगी। धूप सेवन के बाद अच्छी तरह रगड़ कर नहा लेना चाहिए। यह उपाय मात्र दो से चार बार करने से ही आप कई त्वचा रोगों में राहत पा सकते हैं। 
  • इस बात भी ध्यान रखें कि त्वचा रोग से परेशान लोगों को इन उपायों के साथ मिर्च, मसाले, अचार, तली चीजों और बाजार में मिलने वाले आहार और पेय पदार्र्थों  से भी परहेज करना चाहिए। इसके बजाय हरी सब्जियों, मौसमी फलों और अंकुरित अन्न का उपयोग आपको अधिक से अधिक मात्रा में करना चाहिए।



कभी न भूलें सुबह का नाश्ता

No comments :
जानें क्यों जरूरी है नाश्ता करना 

पूरा दिन काम करने के लिए आपके शरीर को पर्याप्‍त मात्रा में ऊर्जा की आवश्‍यकता होती है। और इस ऊर्जा के लिए नाश्‍ते से बेहतर और कुछ नहीं। आइए इस स्‍लाइड शो के जरिये जाने नाश्‍ता हमारे लिए क्‍यों जरूरी हैं।

1  सुबह का नाशता
पूरा दिन काम करने के लिए आपके शरीर को पर्याप्‍त मात्रा में ऊर्जा की आवश्‍यकता होती है। और इस ऊर्जा के लिए नाश्‍ते से बेहतर और कुछ नहीं। इसलिए नाश्‍ते को दिन का सबसे महत्‍वपूर्ण भोजन माना जाता है। दरअसल, रात के खाने के बाद हम काफी लंबे समय तक कुछ नहीं खाते, ऐसे में सुबह का नाश्‍ता पौष्टिक तत्‍वों से भरपूर होना जरूरी होता है।


2  खाली पेट बनता है एसिड
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो खाली पेट रहने से पेट में जो पाचन रस उत्‍पन्‍न होते हैं, उनसे एसिड बनने लगता है। इससे एसिड से हमारी आंतों को तो नुकसान पहुंचाता ही हैं साथ ही हम कमजोर भी होने लगते हैं। सही मायनों में देखा जाए तो नाश्ता ना करने का अर्थ है शरीर को पर्याप्त ऊर्जा ना मिलना।

अनहेल्थी खाने की तड़प
अगर नाश्‍ता नहीं करते है तो कुछ समय बाद खाने की इच्‍छा होती है और फिर हम पूरा दिन कुछ न कुछ खाते ही रहते हैं। ऐसे में हम भूख मिटाने के चक्‍कर में हम अनहैल्‍दी फूड लेने लगते हैं।

मैटाबोलिज् पर असर
मैटाबोलिज्‍म हमारे शरीर का वह ईंधन है जिससे हमारा शरीर ठीक से काम करता है। विभिन्‍न कार्य को करने के लिए मस्तिष्‍क और स्‍नायुतंत्र को इस ईंधन की आवश्‍यकता होती है। इसकी पूर्ति न होने पर बॉडी अनहैल्‍दी फूड खाने लगता है। इस तरह से अगर आप सुबह का नाश्‍ता नहीं लेते तो इसका असर आपके मैटाबोलिज्‍म पर असर पड़ता है।

5 क्या है मैटाबोलिज्म
मैटाबोलिज्‍म वह प्रक्रिया है, जिसमें बॉडी भोजन को एनर्जी में बदलती है। ताकि बॉडी का कार्य ठीक से चलता रहे। नाश्ता पूरी रात की नींद के बाद मैटाबोलिज्म को काम पर लगाता है। अगर नाश्ता न किया जाए तो बॉडी में मैटाबोलिज्म की प्रक्रिया धीमी होने के कारण कैलोरी जलने के स्‍थान पर बॉडी में जमा होने लगती हैं।

नाशते के बिना दिन गुजरे ना
युवा लोग मानते है कि अगर वह सुबह नाश्‍ता नहीं करेंगे तो उनपर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन उनका सोचना गलत हैं। नाश्ता न करने का परिणाम युवा अवस्था में भी कम नुकसानदेह नहीं है। अगर पौष्टिक नाश्ता उचित मात्रा में न लिया जाए तो शरीर कमजोर हो जाता है व दिनभर काम करना मुश्किल हो जाता है।

मोटापे का खतरा
नाश्‍ता न करने से डायबिटीज व मोटापे जैसी परेशानियां भी घेर सकती हैं। दिन का भोजन कम मात्रा में हो या थोड़ी देर से भी हो, तो चल सकता है लेकिन सुबह का नाश्ता अच्छी मात्रा में, पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक होना बहुत जरूरी है।

महिलाओं के लिए भी जरूरी नाश्ता
हैल्थ इज वैल्थ सिर्फ यह कहावत तो आपने सुनी होगी यह महज एक कहावत नहीं, बल्कि जिन्दगी की हकीकत है। अक्सर महिलाएं सुबह के नाश्ते को नजरअंदाज करती हैं। वे घर के लोगों के खानपान पर तो पूरा ध्यान देती हैं लेकिन स्‍वयं को हमेशा भूल जाती हैं। उनके लिए भी ब्रेकफास्ट करना जरूरी है। सुबह का नाश्ता दिनभर की एनर्जी तो देता ही है, साथ ही यह शरीर को संतुलित भी बनाए रखता है। इसलिए चाहे वह युवा हो, बुजुर्ग हो, बच्‍चा हो या फिर महिला सभी के लिए नाश्‍ता जरूरी है।

दिन भर रखता है संतुष्
नाश्ता अधिक फैट बर्न करके आपके मैटाबोलिज्म को बढा देता है। नाश्‍ता अगर प्रोटीनयुक्त और फैट फ्री किया जाए तो दिन में अधिक खाने की इच्‍छा नहीं होती है। साथ ही नाश्‍ते में न्यूट्रिशन फूड ना लेने की वजह से वजन बढता है। जिसे कम करना आसान नहीं होता।

10 चुस् बनाये नाशता
बॉडी में एनर्जी और दिन भर स्‍फूर्ति को बनाए रखने के लिए ताजा और पौष्टिक तत्वों से युक्त नाश्ता करना चाहिए। ऐसा नाश्‍ता लेना चाहिए जो ईंधन की तरह काम करे। काबोंहाइडे्ट युक्त नाश्‍ता सबसे बेहतर होता है। यह आहार ग्लूकोज को धीरे-धीरे रक्तप्रवाह में जाने देता है। जिससे आप लम्बे समय तक चुस्त बनी रहती है।




शिशु को नहलाते समय ध्‍यान रखें बातें, नहीं पड़ेंगे बीमार

No comments :

शिशु को नहलाते समय ध्यान रखें बातें,नहीं पड़ेंगे बीमार

बच्चों को समय पर मालिश करना और उनको नहलाना बहुत जरूरी है। हालांकि बच्‍चों को कब और कैसे नहलाना है ये आप स्‍वयं तय कर सकती हैं। आपको नहलाते समय ऐसा काम बिल्‍कुल भी नहीं करना है जिससे बच्‍चे को किसी प्रकार की समस्‍या न हो। लेकिन कुछ बातों का ध्‍यान रखना जरूरी है। शिशु को उसकी नींद के समय के आसपास न नहलाएं, शिशु जब भूखा हो तब उसे न नहलाएं और नहलाते समय शिशु को ठंड न लगे ऐसी कुछ बातों का ध्‍यान रखना जरूरी है। 

कब नहलाएं?  

पारंपरिक तौर पर कहा जाए तो शिशु को सूर्योदय से पहले या फिर सुबह के समय नहलाना सबसे अच्छा माना जाता था। ऐसा शायद इसलिए था ताकि नहाने के बाद दिन चढ़ने पर गर्मी बढ़ने से शिशु को फिर से गर्माहट मिल सके।
इस पुरानी परंपरा के पीछे शायद कुछ तर्क जरुर है। नवजात शिशु अपने शरीर का तापमान सही से नियंत्रित नहीं कर पाते और उन्हें बहुत जल्दी ठंड लग सकती है। यदि शिशु को ठंड लगेगी, तो वह स्नान का आनंद नहीं ले सकेगा। इसलिए जब दिन चढ़ने लगे और गर्मी बढ़ती जाए, तब शिशु को आरामदायक तरीके से नहलाया जा सकता है।
इस तरह नहाने के बाद भी शिशु को गर्माहट मिलती रहेगी। यदि आपकी दिनचर्या में ऐसा कर पाना आसान हो, तो अच्छा है। मगर, शिशु को शाम के समय नहलाना भी उतना ही सही है और इससे शिशु को सर्दी-जुकाम लगने का खतरा नहीं बढ़ता, जैसा कि अक्सर माना जाता है। 

कैसा हो पानी तापमान  

नहलाने के लिए हल्का गर्म पानी इस्तेमाल करें। शिशु को नहलाने के लिए पानी का आदर्श तापमान 38 डिग्री सेल्सियस या 100.4 डिग्री फेहरनहाइट माना जाता है। यदि आपके पास बाथ थर्मोमीटर नहीं है, तो आप अपनी कोहनी से पानी का तापमान जांच सकती हैं। यह आपको हल्का गर्म महसूस होना चाहिए, तेज गर्म नहीं।

बच्‍चों को नहलाने से पहले क्‍या करें 

  • बच्चे को नहलाने से पहले ही सारी तैयारी कर लें और पानी हल्का गुनगुना रखें ताकि उसे सर्दी न लग जाये।
  • सप्ताह में हर दिन साबुन और शैम्पू लगाने की जरूरत नहीं है, दो से तीन बार ही इसका प्रयोग करें।
  • जो उतपाद आप प्रयोग कर रही हैं उसकी मैनुफैक्चरिंग डेट आदि अच्छे से देख लें और उसमें पड़े तत्व भी देख लें। सभी निर्देशों को अच्छी तरह पढ़ने के बाद ही इस्तेमाल करें।
  • नहाने से पहले बच्चे की मालिश करें और नहाने के बाद उसकी त्वचा पर मॉइश्चेराइजर लगाना न भूलें। इससे उसे खुजली और जलन नहीं होगी।
  • साबुन के प्रयोग से पहले
  • पहली बार बच्चे को शैम्पू या साबुन से नहलाने वाली हैं और तो इस्ते माल से पहले उसकी त्वचा पर साबुन लगाकर देख लें कि कहीं उसे इससे नुकसान तो नहीं होगा। त्वचा के लाल पड़ने पर या खुजली होने पर उस उत्‍पाद का प्रयोग न करें।
  • छ: महीने से छोटे बच्चे को साबुन की बट्टी से रगड़कर कभी न नहलायें। साबुन को हाथ में लगाकर तब बच्चे के शरीर पर लगायें। इससे उसकी त्वचा पर रगड़ नहीं होगी।
  • सुगंध मुक्त साबुन का प्रयोग करें, जिन साबुनों में महक आती है उनमें केमिकल अधिक होते हैं, उनका प्रयोग करने से बचें।
  • बच्चे की त्वचा को बहुत ज्यादा रगड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती है क्योंकि उनकी त्वचा पर धूल जमा नहीं होती है। आप सिर्फ मालिश करें और नहला दें।

वसंत पंचमी पर्व कैसे मानते हैं आओ जाने

No comments :


वसन्त पंचमी शिक्षा, साक्षरता, विद्या और विनय का पर्व है। कला, विविध गुण, विद्या को- साधना को बढ़ाने, उन्हें प्रोत्साहित करने का पर्व है- वसन्त पंचमी।

भगवती सरस्वती के जन्म दिन पर उनके अनुग्रह के लिए कृतज्ञता भरा अभिनन्दन करें- उनकी अनुकम्पा का वरदान प्राप्त होने की पुण्यतिथि पर हर्षोल्लास मनाएँ, यह उचित ही है। 

दिव्य शक्तियों को मानवी आकृति में चित्रित करके ही उनके प्रति भावनाओं की अभिव्यक्ति सम्भव है। भावोद्दीपन मनुष्य की निज की महती आवश्यकता है। शक्तियाँ सूक्ष्म, निराकार होने से उनकी महत्ता तो समझी जा सकती है, शरीर और मस्तिष्क द्वारा उनसे लाभ उठाया जा सकता है, पर अन्तःकरण की मानस चेतना जगाने के लिए दिव्यतत्त्वों को भी मानवी आकृति में संवेदनायुक्त मनःस्थिति में मानना और प्रतिष्ठापित करना पड़ता है। इसी चेतना विज्ञान को ध्यान में रखते हुए भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने प्रत्येक दिव्य शक्तियों को मानुषी आकृति और भाव गरिमा में सँजोया है। इनकी पूजा, अर्चना, वन्दना, धारणा हमारी अपनी चेतना को उसी प्रतिष्ठापित देव गरिमा के समतुल्य उठा देती है, साधना विज्ञान का सारा ढाँचा इसी आधार पर खड़ा है।

भगवती सरस्वती की प्रतिमा, मूर्ति अथवा तस्वीर के आगे पूजा- अर्चा की प्रक्रिया की जाए, इसका सीधा तात्पर्य यह है कि शिक्षा की महत्ता को स्वीकार, शिरोधार्य किया जाए, उनको मस्तक झुकाया जाए अर्थात् मस्तक में उनके लिए स्थान दिया जाए। अपनी आज की ज्ञान सीमा जितनी है, उसे और अधिक बढ़ाने का प्रयत्न किया जाए। वास्तव में संग्रह करने और बढ़ाने योग्य सम्पदा धन नहीं, ज्ञान है। लक्ष्मी नहीं, विद्या का अधिक संग्रह सम्पादन किया जाना चाहिए।

यह समझा जाता है कि विद्या नौकरी करने के लिए प्राप्त की जानी चाहिए- यह विचार बहुत ही ओछा और निकृष्ट है। विद्या मनुष्य के मस्तिष्क के व्यक्तित्व के गौरव के निखार एवं विकास के लिए है। पेट भरने की तरह मानसिक भूख बुझाने के लिए दैनिक जीवन में अध्ययन के लिए भी स्थान रखना चाहिए।

भगवती सरस्वती के हाथ में वीणा है, उनका वाहन मयूर है, मयूर अर्थात् मधुरभाषी। हमें सरस्वती का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए उनका वाहन मयूर बनना चाहिए। मीठा, नम्र, विनीत, सज्जनता, शिष्टता और आत्मीयतायुक्त सम्भाषण हर किसी से करना चाहिए। जीभ को कड़ुआ, धृष्ट, अशिष्ट बोलने की आदत कदापि न पड़ने दें। हर किसी के सम्मान की रक्षा करें; ताकि किसी को आत्महीनता की ग्रन्थि का शिकार बनाने का पाप अपने सिर पर न चढ़े।

प्रकृति ने मोर को कलात्मक तथा सुसज्जित बनाया है। हमें भी अपनी अभिरुचि परिष्कृत बनानी चाहिए, हम प्रेमी बनें, सौन्दर्य, स्वच्छता और सुसज्जनता अपने प्रत्येक उपकरण एवं क्रियाकलाप में नियोजित रखें, तभी भगवती सरस्वती हमें अपना वाहन, पार्षद, प्रिय पात्र मानेंगी। 
हाथ में वीणा, अर्थात्- संगीत गायन जैसी भावोत्तेजक प्रक्रिया को अपने प्रसुप्त अन्तःकरण में सजगता भरने के लिए प्रयुक्त करना है। हम कला प्रेमी बनें, कला पारखी बनें, कला के पुजारी और संरक्षक भी। माता की तरह उसका सात्त्विक एवं पोषक पय पान करें, उच्च भावनाओं के जागरण में उसे सँजोएँ। जो अनाचारी कला के साथ व्यभिचार क रने पर तुले हुए हों, पशु प्रवृत्ति भड़काने और कामुकता, अश्लीलता एवं कुरुचि उत्पन्न करने में लगे हों, उनका न केवल असहयोग- विरोध ही करें, वरन् विरोध- भर्त्सना के अतिरिक्त उन्हें असफल बनाने में भी कुछ कसर उठा न रखें।

सरस्वती के अवतरण पर्व पर प्रकृति खिलखिला पड़ती है, हँसी और मुस्कान के फूल खिल पड़ते हैं। उल्लास, उत्साह और प्रकृति के अभिनव सृजन के प्रतीक नवीन पल्लव प्रत्येक वृक्ष पर परिलक्षित होते हैं। मनुष्य में भी जब ज्ञान का, शिक्षा का प्रवेश होता है- सरस्वती का अनुग्रह अवतरित होता है, तो स्वभाव में, दृष्टिकोण में क्रिया कलाप में वसन्त ही बिखरा दीखता है। हलकी- फुलकी, चिन्ता और उद्वेगों से रहित खेल जैसी जिन्दगी जीने की आदत पड़ जाती है। 
हर काम की पूरी- पूरी जिम्मेदारी अनुभव करने पर भी मन पर बोझ किसी भली- बुरी घटना का न पड़ने देना यही है हलकी- फुलकी जिन्दगी, मुसकान चेहरे पर अठखेलियाँ करती रहे। चित्त हलका रखना, आशा और उत्साह से भरे रहना, उमंगें उठने देना, उज्ज्वल भविष्य के सपने सँजोना, अपने व्यक्तित्व को फूल जैसा निर्मल, निर्दोष, आकर्षक एवं सुगन्धित बनाना- ऐसी ही अनेक प्रेरणाएँ वसन्त ऋतु के आगमन पर पेड़- पौधों पर नवीन पल्लवों- पुष्पों को देखकर प्राप्त की जा सकती है। कोयल की तरह मस्ती में कूँकना, भौरों की तरह गूँजना- गुनगुनाना जीवन की कला जानने वाले के चिह्न हैं। 
हर जड़ चेतन में, वसन्त ऋतु में एक सृजनात्मक उमंग देखी जाती है। उस उमंग को वासना से ऊँचा उठाकर भावोल्लास में विकसित किया जाना चाहिए। सरस्वती का अभिनन्दन प्रकृति, वसन्त अवतरण के रूप में करती है। हम पूजा वेदी पर पुष्पाञ्जलि भेंट करने के साथ- साथ जीवन में वसन्त जैसा उल्लास, कलात्मक प्रवृत्तियों का विकास और ज्ञान संवर्धन का प्रयास करके सच्चे अर्थों में भगवती का पूजन कर सकते हैं और उसका लाभ अपने को तथा अन्य असंख्यों को पहुँचा सकते हैं।

वसन्त पंचमी पर्व युग निर्माण परिवार के परिजनों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। उसकी सनातन महत्ता भी कम नहीं है, फिर भी मिशन के सूत्र संचालक के आध्यात्मिक जन्मदिन के रूप में उसका महत्त्व और भी बढ़ गया है।

॥ सरस्वती आवाहन॥
माँ सरस्वती शिक्षा, साक्षरता तथा भौतिक ज्ञान की देवी हैं। चूँकि वसन्त पंचमी भी शिक्षा- साक्षरता का पर्व है, इसलिए इस अवसर पर प्रधान रूप से देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है। सरस्वती का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित कर देवी सरस्वती का आवाहन करना चाहिए।

ॐ पावका नः सरस्वती, वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वष्टु धियावसुः॥ ॐ सरस्वत्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि ध्यायामि। - २०.८४

॥ वाद्ययन्त्र पूजन॥ 
वाद्य सङ्गीत मनुष्य की उदात्त भावनाओं और उसकी हृदय तरंगों को व्यक्त करने के सहयोगी साधन हैं। इसलिए इन साधनों का पूजन करना, उनके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा- भावना प्रकट करना है। स्मरण रहे, स्थूल और जड़ पदार्थ भी चेतनायुक्त तरंगो से स्वर लहरियों के संयोग से सूक्ष्म रूप में एक विशेष प्रकार की चेतना से युक्त हो जाते हैं, इसलिए वाद्य केवल स्थूल वस्तु नहीं; प्रत्युत् उनमें मानव हृदय की सी तरंगो को समझकर उनकी पूजा करनी चाहिए। चर्मरहित जो वाद्ययंत्र उपलब्ध हों, उन्हें एक चौकी पर सजाकर रखें। पुष्प, अक्षत आदि समर्पित कर पूजन करें।

ॐ सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां, पत्नी सुकृतं बिभर्ति।
अपा  रसेन वरुणो न साम्नेन्द्र , श्रियै जनयन्नप्सु राजा॥- १९.९४

॥ मयूरपूजन॥
मयूर- मधुर गान तथा प्रसन्नता का सर्वोत्कृष्ट प्रतीक प्राणी है। मनुष्य मयूर की भाँति अपनी वाणी, व्यवहार तथा जीवन को मधुरतायुक्त आनन्ददायी बनाए, इसके लिए मयूर की पूजा की जाती है।
सरस्वती के चित्र में अंकित अथवा प्रतीक रूप में स्थापित मयूर का पूजन करें। अक्सर चित्रों में मयूर का चित्र होता ही है। यदि कहीं ऐसा चित्र सुलभ न हो, तो मयूर पंख को पूजा के लिए प्रयुक्त कर लेना चाहिए। निम्न मन्त्र से मयूर का पूजन किया जाए।
ॐ मधु वाताऽऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ - १३.२७

॥ वसन्त पूजा॥
पुष्प प्रसन्नता, उल्लास और नवजीवन के खिलखिलाते रूप के मूर्त प्रतीक होते हैं। प्रकृति के गोद में पुष्पों की महक, उनका हँसना, खेलना, घूमना मनुष्य के लिए उल्लास, प्रफुल्लता का जीवन बिताने के लिए मूक सन्देश है। इसी सन्देश को हृदयंगम करने, जीवन में उतारने के लिए पुष्प का पूजन किया जाता है। खेतों में सर्षप (सरसों) पुष्प जो वासन्ती रंग के हों अथवा बाग आदि से फूल पहले ही मँगवाकर एक गुलदस्ता बना लेना चाहिए। वसन्त का प्रतीक मानकर इसका पूजन करें।

ॐ वसन्ताय कपिंजलानालभते, ग्रीष्माय कलविङ्कान्, वर्षाभ्यस्तित्तिरीञ्छरते, वर्त्तिका हेमन्ताय, ककराञ्छिशिराय विककरान्॥- २४.२०
यजमान यही फूल का गुच्छा सरस्वती माता को अर्पित करें।

॥संकल्प ॥
....नामाहं वसन्तपर्वणि नवसृजन- ईश्वरीय योजनां अनुसरन् आत्मनिर्माण- परिवारनिर्माण त्रिविधसाधनासु नियमनिष्ठापूर्वकं सहयोगप्रदानाय संकल्पम् अहं करिष्ये॥

शेर बनने का अपराध किसने किया

No comments :
कुसुमपुर नगर में एक राजा राज्य करता था। उसके नगर में एक ब्राह्मण था, जिसके चार बेटे थे। लड़कों के सयाने होने पर ब्राह्मण मर गया और ब्राह्मणी उसके साथ सती हो गयी। उनके रिश्तेदारों ने उनका धन छीन लिया। वे चारों भाई नाना के यहाँ चले गये। लेकिन कुछ दिन बाद वहाँ भी उनके साथ बुरा व्यवहार होने लगा। तब सबने मिलकर सोचा कि कोई विद्या सीखनी चाहिए। यह सोच करके चारों चार दिशाओं में चल दिये।


कुछ समय बाद वे विद्या सीखकर मिले। एक ने कहा, “मैंने ऐसी विद्या सीखी है कि मैं मरे हुए प्राणी की हड्डियों पर मांस चढ़ा सकता हूँ।” दूसरे ने कहा, “मैं उसके खाल और बाल पैदा कर सकता हूँ।” तीसरे ने कहा, “मैं उसके सारे अंग बना सकता हूँ।” चौथा बोला, “मैं उसमें जान डाल सकता हूँ।”

फिर वे अपनी विद्या की परीक्षा लेने जंगल में गये। वहाँ उन्हें एक मरे शेर की हड्डियाँ मिलीं। उन्होंने उसे बिना पहचाने ही उठा लिया। एक ने माँस डाला, दूसरे ने खाल और बाल पैदा किये, तीसरे ने सारे अंग बनाये और चौथे ने उसमें प्राण डाल दिये। शेर जीवित हो उठा और सबको खा गया।

यह कथा सुनाकर बेताल बोला, “हे राजा, बताओ कि उन चारों में शेर बनाने का अपराध किसने किया?”

राजा ने कहा, “जिसने प्राण डाले उसने, क्योंकि बाकी तीन को यह पता ही नहीं था कि वे शेर बना रहे हैं। इसलिए उनका कोई दोष नहीं है।”

यह सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा जाकर फिर उसे लाया। रास्ते में बेताल ने एक नयी कहानी सुनायी।

योगी पहेल रोया फिर हँसा क्यों ?

No comments :
कलिंग देश में शोभावती नाम का एक नगर है। उसमें राजा प्रद्युम्न राज करता था। उसी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था, जिसके देवसोम नाम का बड़ा ही योग्य पुत्र था। जब देवसोम सोलह बरस का हुआ और सारी विद्याएँ सीख चुका तो एक दिन दुर्भाग्य से वह मर गया। बूढ़े माँ-बाप बड़े दु:खी हुए। चारों ओर शोक छा गया। जब लोग उसे लेकर श्मशान में पहुँचे तो रोने-पीटने की आवाज़ सुनकर एक योगी अपनी कुटिया में से निकलकर आया। पहले तो वह खूब ज़ोर से रोया, फिर खूब हँसा, फिर योग-बल से अपना शरीर छोड़ कर उस लड़के के शरीर में घुस गया। लड़का उठ खड़ा हुआ। उसे जीता देखकर सब बड़े खुश हुए।


वह लड़का वही तपस्या करने लगा।

इतना कहकर बेताल बोला, “राजन्, यह बताओ कि यह योगी पहले क्यों तो रोया, फिर क्यों हँसा?”

राजा ने कहा, “इसमें क्या बात है! वह रोया इसलिए कि जिस शरीर को उसके माँ-बाप ने पाला-पोसा और जिससे उसने बहुत-सी शिक्षाएँ प्राप्त कीं, उसे छोड़ रहा था। हँसा इसलिए कि वह नये शरीर में प्रवेश करके और अधिक सिद्धियाँ प्राप्त कर सकेगा।”

राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा जाकर उसे लाया तो रास्ते में बेताल ने कहा, “हे राजन्, मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि बिना जरा-सा भी हैरान हुए तुम मेरे सवालों का जवाब देते रहे हो और बार-बार आने-जाने की परेशानी उठाते रहे हो। आज मैं तुमसे एक बहुत भारी सवाल करूँगा। सोचकर उत्तर देना।”

रिश्ता क्या होता है

No comments :
किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा राज करता था। उसकी पत्नी का नाम चडवती था। वह मालव देश के राजा की लड़की थी। उसके लावण्यवती नाम की एक कन्या थी। जब वह विवाह के योग्य हुई तो राजा के भाई-बन्धुओं ने उसका राज्य छीन लिया और उसे देश-निकाला दे दिया। राजा रानी और कन्या को साथ लेकर मालव देश को चल दिया। रात को वे एक वन में ठहरे। पहले दिन चलकर भीलों की नगरी में पहुँचे। राजा ने रानी और बेटी से कहा कि तुम लोग वन में छिप जाओ, नहीं तो भील तुम्हें परेशान करेंगे। वे दोनों वन में चली गयीं। इसके बाद भीलों ने राजा पर हमला किया। राजा ने मुकाबला किया, पर अन्त में वह मारा गया। भील चले गये।

उसके जाने पर रानी और बेटी जंगल से निकलकर आयीं और राजा को मरा देखकर बड़ी दु:खी हुईं। वे दोनों शोक करती हुईं एक तालाब के किनारे पहुँची। उसी समय वहाँ चंडसिंह नाम का साहूकार अपने लड़के के साथ, घोड़े पर चढ़कर, शिकार खेलने के लिए उधर आया। दो स्त्रियों के पैरों के निशान देखकर साहूकार अपने बेटे से बोला, “अगर ये स्त्रियाँ मिल जों तो जायें जिससे चाहो, विवाह कर लेना।”


लड़के ने कहा, “छोटे पैर वाली छोटी उम्र की होगी, उससे मैं विवाह कर लूँगा। आप बड़ी से कर लें।”

साहूकार विवाह नहीं करना चाहता था, पर बेटे के बहुत कहने पर राजी हो गया।

थोड़ा आगे बढ़ते ही उन्हें दोनों स्त्रियां दिखाई दीं। साहूकार ने पूछा, “तुम कौन हो?”

रानी ने सारा हाल कह सुनाया। साहूकार उन्हें अपने घर ले गया। संयोग से रानी के पैर छोटे थे, पुत्री के पैर बड़े। इसलिए साहूकार ने पुत्री से विवाह किया, लड़के ने रानी से हुई और इस तरह पुत्री सास बनी और माँ बेटे की बहू। उन दोनों के आगे चलकर कई सन्तानें हुईं।

इतना कहकर बेताल बोला, “राजन्! बताइए, माँ-बेटी के जो बच्चे हुए, उनका आपस में क्या रिश्ता हुआ?”

यह सवाल सुनकर राजा बड़े चक्कर में पड़ा। उसने बहुत सोचा, पर जवाब न सूझ पड़ा। इसलिए वह चुपचाप चलता रहा।

बेताल यह देखकर बोला, “राजन्, कोई बात नहीं है। मैं तुम्हारे धीरज और पराक्रम से खुश हूँ। मैं अब इस मुर्दे से निकला जाता हूँ। तुम इसे योगी के पास ले जाओ। जब वह तुम्हें इस मुर्दे को सिर झुकाकर प्रणाम करने को कहे तो तुम कह देना कि पहले आप करके दिखाओ। जब वह सिर झुकाकर बतावे तो तुम उसका सिर काट लेना। उसका बलिदान करके तुम सारी पृथ्वी के राजा बन जाओगे। सिर नहीं काटा तो वह तुम्हारी बलि देकर सिद्धि प्राप्त करेगा।”

इतना कहकर बेताल चला गया और राजा मुर्दे को लेकर योगी के पास आया।





       

ज्यादा पुण्य किसका ?

No comments :
वर्धमान नगर में रूपसेन नाम का राजा राज करता था। एक दिन उसके यहाँ वीरवर नाम का एक राजपूत नौकरी के लिए आया। राजा ने उससे पूछा कि उसे ख़र्च के लिए क्या चाहिए तो उसने जवाब दिया, हज़ार तोले सोना। सुनकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। राजा ने पूछा, “तुम्हारे साथ कौन-कौन है?” उसने जवाब दिया, “मेरी स्त्री, बेटा और बेटी।” राजा को और भी अचम्भा हुआ। आख़िर चार जने इतने धन का क्या करेंगे? फिर भी उसने उसकी बात मान ली।

उस दिन से वीरवर रोज हज़ार तोले सोना भण्डारी से लेकर अपने घर आता। उसमें से आधा ब्राह्मणों में बाँट देता, बाकी के दो हिस्से करके एक मेहमानों, वैरागियों और संन्यासियों को देता और दूसरे से भोजन बनवाकर पहले ग़रीबों को खिलाता, उसके बाद जो बचता, उसे स्त्री-बच्चों को खिलाता, आप खाता। काम यह था कि शाम होते ही ढाल-तलवार लेकर राज के पलंग की चौकीदारी करता। राजा को जब कभी रात को ज़रूरत होती, वह हाज़िर रहता।



एक आधी रात के समय राजा को मरघट की ओर से किसी के रोने की आवाज़ आयी। उसने वीरवर को पुकारा तो वह आ गया। राजा ने कहा, “जाओ, पता लगाकर आओ कि इतनी रात गये यह कौन रो रहा है ओर क्यों रो रहा है?”

वीरवर तत्काल वहाँ से चल दिया। मरघट में जाकर देखता क्या है कि सिर से पाँव तक एक स्त्री गहनों से लदी कभी नाचती है, कभी कूदती है और सिर पीट-पीटकर रोती है। लेकिन उसकी आँखों से एक बूँद आँसू की नहीं निकलती। वीरवर ने पूछा, “तुम कौन हो? क्यों रोती हो?”

उसने कहा, “मैं राज-लक्ष्मी हूँ। रोती इसलिए हूँ कि राजा विक्रम के घर में खोटे काम होते हैं, इसलिए वहाँ दरिद्रता का डेरा पड़ने वाला है। मैं वहाँ से चली जाऊँगी और राजा दु:खी होकर एक महीने में मर जायेगा।”

सुनकर वीरवर ने पूछा, “इससे बचने का कोई उपाय है!”

स्त्री बोली, “हाँ, है। यहाँ से पूरब में एक योजन पर एक देवी का मन्दिर है। अगर तुम उस देवी पर अपने बेटे का शीश चढ़ा दो तो विपदा टल सकती है। फिर राजा सौ बरस तक बेखटके राज करेगा।”

वीरवर घर आया और अपनी स्त्री को जगाकर सब हाल कहा। स्त्री ने बेटे को जगाया, बेटी भी जाग पड़ी। जब बालक ने बात सुनी तो वह खुश होकर बोला, “आप मेरा शीश काटकर ज़रूर चढ़ा दें। एक तो आपकी आज्ञा, दूसरे स्वामी का काम, तीसरे यह देह देवता पर चढ़े, इससे बढ़कर बात और क्या होगी! आप जल्दी करें।”

वीरवर ने अपनी स्त्री से कहा, “अब तुम बताओ।”

स्त्री बोली, “स्त्री का धर्म पति की सेवा करने में है।”

निदान, चारों जने देवी के मन्दिर में पहुँचे। वीरवर ने हाथ जोड़कर कहा, “हे देवी, मैं अपने बेटे की बलि देता हूँ। मेरे राजा की सौ बरस की उम्र हो।”

इतना कहकर उसने इतने ज़ोर से खांडा मारा कि लड़के का शीश धड़ से अलग हो गया। भाई का यह हाल देख कर बहन ने भी खांडे से अपना सिर अलग कर डाला। बेटा-बेटी चले गये तो दु:खी माँ ने भी उन्हीं का रास्ता पकड़ा और अपनी गर्दन काट दी। वीरवर ने सोचा कि घर में कोई नहीं रहा तो मैं ही जीकर क्या करूँगा। उसने भी अपना सिर काट डाला। राजा को जब यह मालूम हुआ तो वह वहाँ आया। उसे बड़ा दु:ख हुआ कि उसके लिए चार प्राणियों की जान चली गयी। वह सोचने लगा कि ऐसा राज करने से धिक्कार है! यह सोच उसने तलवार उठा ली और जैसे ही अपना सिर काटने को हुआ कि देवी ने प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया। बोली, “राजन्, मैं तेरे साहस से प्रसन्न हूँ। तू जो वर माँगेगा, सो दूँगी।”

राजा ने कहा, “देवी, तुम प्रसन्न हो तो इन चारों को जिला दो।”

देवी ने अमृत छिड़ककर उन चारों को फिर से जिला दिया।

इतना कहकर बेताल बोला, राजा, बताओ, सबसे ज्यादा पुण्य किसका हुआ?”

राजा बोला, “राजा का।”

बेताल ने पूछा, “क्यों?”

राजा ने कहा, “इसलिए कि स्वामी के लिए चाकर का प्राण देना धर्म है; लेकिन चाकर के लिए राजा का राजपाट को छोड़, जान को तिनके के समान समझकर देने को तैयार हो जाना बहुत बड़ी बात है।”

यह सुन बेताल ग़ायब हो गया और पेड़ पर जा लटका। बेचारा राजा दौड़ा-दौड़ा वहाँ पहुँचा ओर उसे फिर पकड़कर लाया तो बोताल ने चौथी कहानी कही।

ज्यादा पापी कौन है ?

No comments :
भोगवती नाम की एक नगरी थी। उसमें राजा रूपसेन राज करता था। उसके पास चिन्तामणि नाम का एक तोता था। एक दिन राजा ने उससे पूछा, “हमारा ब्याह किसके साथ होगा?”

तोते ने कहा, “मगध देश के राजा की बेटी चन्द्रावती के साथ होगा।” राजा ने ज्योतिषी को बुलाकर पूछा तो उसने भी यही कहा।



उधर मगध देश की राज-कन्या के पास एक मैना थी। उसका नाम था मदन मञ्जरी। एक दिन राज-कन्या ने उससे पूछा कि मेरा विवाह किसके साथ होगा तो उसने कह दिया कि भोगवती नगर के राजा रूपसेन के साथ।

इसके बाद दोनों को विवाह हो गया। रानी के साथ उसकी मैना भी आ गयी। राजा-रानी ने तोता-मैना का ब्याह करके उन्हें एक पिंजड़े में रख दिया।

एक दिन की बात कि तोता-मैना में बहस हो गयी। मैना ने कहा, “आदमी बड़ा पापी, दग़ाबाज़ और अधर्मी होता है।” तोते ने कहा, “स्त्री झूठी, लालची और हत्यारी होती है।” दोनों का झगड़ा बढ़ गया तो राजा ने कहा, “क्या बात है, तुम आपस में लड़ते क्यों हो?”

मैना ने कहा, “महाराज, मर्द बड़े बुरे होते हैं।”

इसके बाद मैना ने एक कहानी सुनायी।

इलापुर नगर में महाधन नाम का एक सेठ रहता था। विवाह के बहुत दिनों के बाद उसके घर एक लड़का पैदा हुआ। सेठ ने उसका बड़ी अच्छी तरह से लालन-पालन किया, पर लड़का बड़ा होकर जुआ खेलने लगा। इस बीच सेठ मर गया। लड़के ने अपना सारा धन जुए में खो दिया। जब पास में कुछ न बचा तो वह नगर छोड़कर चन्द्रपुरी नामक नगरी में जा पहुँचा। वहाँ हेमगुप्त नाम का साहूकार रहता था। उसके पास जाकर उसने अपने पिता का परिचय दिया और कहा कि मैं जहाज़ लेकर सौदागरी करने गया था। माल बेचा, धन कमाया; लेकिन लौटते में समुद्र में ऐसा तूफ़ान आया कि जहाज़ डूब गया और मैं जैसे-तैसे बचकर यहाँ आ गया।

उस सेठ के एक लड़की थी रत्नावती। सेठ को बड़ी खुशी हुई कि घर बैठे इतना अच्छा लड़का मिल गया। उसने उस लड़के को अपने घर में रख लिया और कुछ दिन बाद अपनी लड़की से उसका ब्याह कर दिया। दोनों वहीं रहने लगे। अन्त में एक दिन वहाँ से बिदा हुए। सेठ ने बहुत-सा धन दिया और एक दासी को उनके साथ भेज दिया।

रास्ते में एक जंगल पड़ता था। वहाँ आकर लड़के ने स्त्री से कहा, “यहाँ बहुत डर है, तुम अपने गहने उतारकर मेरी कमर में बाँध दो, लड़की ने ऐसा ही किया। इसके बाद लड़के ने कहारों को धन देकर डोले को वापस करा दिया और दासी को मारकर कुएँ में डाल दिया। फिर स्त्री को भी कुएँ में पटककर आगे बढ़ गया।

स्त्री रोने लगी। एक मुसाफ़िर उधर जा रहा था। जंगल में रोने की आवाज़ सुनकर वह वहाँ आया उसे कुएँ से निकालकर उसके घर पहुँचा दिया। स्त्री ने घर जाकर माँ-बाप से कह दिया कि रास्ते में चोरों ने हमारे गहने छीन लिये और दासी को मारकर, मुझे कुएँ में ढकेलकर, भाग गये। बाप ने उसे ढाढस बँधाया और कहा कि तू चिन्ता मत कर। तेरा स्वामी जीवित होगा और किसी दिन आ जायेगा।

उधर वह लड़का जेवर लेकर शहर पहुँचा। उसे तो जुए की लत लगी थी। वह सारे गहने जुए में हार गया। उसकी बुरी हालत हुई तो वह यह बहाना बनाकर कि उसके लड़का हुआ है, फिर अपनी ससुराल चला। वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले उसकी स्त्री मिली। वह बड़ी खुश हुई। उसने पति से कहा, “आप कोई चिन्ता न करें, मैंने यहाँ आकर दूसरी ही बात कही है।” जो कहा था, वह उसने बता दिया।

सेठ अपने जमाई से मिलकर बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे बड़ी अच्छी तरह से घर में रखा।

कुछ दिन बाद एक रोज़ जब वह लड़की गहने पहने सो रही थी, उसने चुपचाप छुरी से उसे मार डाला और उसके गहने लेकर चम्पत हो गया।

मैना बोली, “महाराज, यह सब मैंने अपनी आँखों से देखा। ऐसा पापी होता है आदमी!”

राजा ने तोते से कहा, “अब तुम बताओ कि स्त्री क्यों बुरी होती है?”

इस पर तोते ने यह कहानी सुनायी।

कंचनपुर में सागरदत्त नाम का एक सेठ रहता था। उसके श्रीदत्त नाम का एक लड़का था। वहाँ से कुछ दूर पर एक और नगर था श्रीविजयपुर। उसमें सोमदत्त नाम का सेठ रहता था। उसके एक लड़की थी वह श्रीदत्त को ब्याही थी। ब्याह के बाद श्रीदत्त व्यापार करने परदेस चला गया। बारह बरस हो गये और वह न आया तो जयश्री व्याकुल होने लगी। एक दिन वह अपनी अटारी पर खड़ी थी कि एक आदमी उसे दिखाई दिया। उसे देखते ही वह उस पर मोहित हो गयी। उसने उसे अपनी सखी के घर बुलवा लिया। रात होते ही वह उस सखी के घर चली जाती और रात-भर वहाँ रहकर दिन निकलने से पहले ही लौट आती। इस तरह बहुत दिन बीत गये।

इस बीच एक दिन उसका पति परदेस से लौट आया। स्त्री बड़ी दु:खी हुईं अब वह क्या करे? पति हारा-थका था। जल्दी ही उसकी आँख लग गई और स्त्री उठकर अपने दोस्त के पास चल दी।

रास्ते में एक चोर खड़ा था। वह देखने लगा कि स्त्री कहाँ जाती है। धीरे-धीरे वह सहेली के मकान पर पहुँची। चोर भी पीछे-पीछे गया। संयोग से उस आदमी को साँप ने काट लिया था ओर वह मरा पड़ा था। स्त्री ने समझा सो रहा है। वहीं आँगन में पीपल का एक पेड़ था, जिस पर एक पिशाच बैठा यह लीला देख रहा था। उसने उस आदमी के शरीर में प्रवेश करके उस स्त्री की नाक काट ली औरा फिर उस आदमी की देह से निकलकर पेड़ पर जा बैठा। स्त्री रोती हुई अपनी सहेली के पास गयी। सहेली ने कहा कि तुम अपने पति के पास जाओ ओर वहाँ बैठकर रोने लगो। कोई पूछे तो कह देना कि पति ने नाक काट ली है।

उसने ऐसा ही किया। उसका रोना सुनकर लोग इकट्ठे हो गये। आदमी जाग उठा। उसे सारा हाल मालूम हुआ तो वह बड़ा दु:खी हुआ। लड़की के बाप ने कोतवाल को ख़बर दे दी। कोतवाल उन सबको राजा के पास ले गया। लड़की की हालत देखकर राजा को बड़ा गुस्सा आया। उसने कहा, “इस आदमी को सूली पर लटका दो।”

वह चोर वहाँ खड़ा था। जब उसने देखा कि एक बेक़सूर आदमी को सूली पर लटकाया जा रहा है तो उसने राजा के सामने जाकर सब हाल सच-सच बता दिया। बोला, “अगर मेरी बात का विश्वास न हो तो जाकर देख लीजिए, उस आदमी के मुँह में स्त्री की नाक है।”

राजा ने दिखवाया तो बात सच निकली।

इतना कहकर तोता बोला, “हे राजा! स्त्रियाँ ऐसी होती हैं! राजा ने उस स्त्री का सिर मुँडवाकर, गधे पर चढ़ाकर, नगर में घुमवाया और शहर से बाहर छुड़वा दिया।”

यह कहानी सुनाकर बेताल बोला, “राजा, बताओ कि दोनों में ज्यादा पापी कौन है?”

राजा ने कहा, “स्त्री।”

बेताल ने पूछा, “कैसे?”

राजा ने कहा, “मर्द कैसा ही दुष्ट हो, उसे धर्म का थोड़ा-बहुत विचार रहता ही है। स्त्री को नहीं रहता। इसलिए वह अधिक पापिन है।”

राजा के इतना कहते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा लौटकर गया और उसे पकड़कर लाया। रास्ते में बेताल ने पाँचवीं कहानी सुनायी।

लड़की किसको मिलनी चाहिये ?

No comments :
उज्जैन में महाबल नाम का एक राजा रहता था। उसके हरिदास नाम का एक दूत था जिसके महादेवी नाम की बड़ी सुन्दर कन्या थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो हरिदास को बहुत चिन्ता होने लगी। इसी बीच राजा ने उसे एक दूसरे राजा के पास भेजा। कई दिन चलकर हरिदास वहाँ पहुँचा। राजा ने उसे बड़ी अच्छी तरह से रखा। एक दिन एक ब्राह्मण हरिदास के पास आया। बोला, “तुम अपनी लड़की मुझे दे दो।”

हरिदास ने कहाँ, “मैं अपनी लड़की उसे दूँगा, जिसमें सब गुण होंगे।”


ब्राह्मण ने कहा, “मेरे पास एक ऐसा रथ है, जिस पर बैठकर जहाँ चाहो, घड़ी-भर में पहुँच जाओगे।”

हरिदास बोला, “ठीक है। सबेरे उसे ले आना।”

अगले दिन दोनों रथ पर बैठकर उज्जैन आ पहुँचे। दैवयोग से उससे पहले हरिदास का लड़का अपनी बहन को किसी दूसरे को और हरिदास की स्त्री अपनी लड़की को किसी तीसरे को देने का वादा कर चुकी थी। इस तरह तीन वर इकट्ठे हो गये। हरिदास सोचने लगा कि कन्या एक है, वह तीन हैं। क्या करे! इसी बीच एक राक्षस आया और कन्या को उठाकर विंध्याचल पहाड़ पर ले गया। तीनों वरों में एक ज्ञानी था। हरिदास ने उससे पूछा तो उसने बता दिया कि एक राक्षस लड़की को उड़ा ले गया है और वह विंध्याचल पहाड़ पर है।

दूसरे ने कहा, “मेरे रथ पर बैठकर चलो। ज़रा सी देरी में वहाँ पहुँच जायेंगे।”

तीसरा बोला, “मैं शब्दवेधी तीर चलाना जानता हूँ। राक्षस को मार गिराऊँगा।”

वे सब रथ पर चढ़कर विंध्याचल पहुँचे और राक्षस को मारकर लड़की को बचा जाये।

इतना कहकर बेताल बोला “हे राजन्! बताओ, वह लड़की उन तीनों में से किसको मिलनी चाहिए?”

राजा ने कहा, “जिसने राक्षस को मारा, उसकों मिलनी चाहिए, क्योंकि असली वीरता तो उसी ने दिखाई। बाकी दो ने तो मदद की।”

राजा का इतना कहना था कि बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा फिर उसे लेकर आया तो रास्ते में बेताल ने छठी कहानी सुनायी।

औरत का पति कौन हैं?

No comments :
धर्मपुर नाम की एक नगरी थी। उसमें धर्मशील नाम को राजा राज करता था। उसके अन्धक नाम का दीवान था। एक दिन दीवान ने कहा, “महाराज, एक मन्दिर बनवाकर देवी को बिठाकर पूजा की जाए तो बड़ा पुण्य मिलेगा।”

राजा ने ऐसा ही किया। एक दिन देवी ने प्रसन्न होकर उससे वर माँगने को कहा। राजा के कोई सन्तान नहीं थी। उसने देवी से पुत्र माँगा। देवी बोली, “अच्छी बात है, तेरे बड़ा प्रतापी पुत्र प्राप्त होगा।”


कुछ दिन बाद राजा के एक लड़का हुआ। सारे नगर में बड़ी खुशी मनायी गयी।

एक दिन एक धोबी अपने मित्र के साथ उस नगर में आया। उसकी निगाह देवी के मन्दिर में पड़ी। उसने देवी को प्रणाम करने का इरादा किया। उसी समय उसे एक धोबी की लड़की दिखाई दी, जो बड़ी सुन्दर थी। उसे देखकर वह इतना पागल हो गया कि उसने मन्दिर में जाकर देवी से प्रार्थना की, “हे देवी! यह लड़की मुझे मिल जाय। अगर मिल गयी तो मैं अपना सिर तुझपर चढ़ा दूँगा।”

इसके बाद वह हर घड़ी बेचैन रहने लगा। उसके मित्र ने उसके पिता से सारा हाल कहा। अपने बेटे की यह हालत देखकर वह लड़की के पिता के पास गया और उसके अनुरोध करने पर दोनों का विवाह हो गया।

विवाह के कुछ दिन बाद लड़की के पिता यहाँ उत्सव हुआ। इसमें शामिल होने के लिए न्यौता आया। मित्र को साथ लेकर दोनों चले। रास्ते में उसी देवी का मन्दिर पड़ा तो लड़के को अपना वादा याद आ गया। उसने मित्र और स्त्री को थोड़ी देर रुकने को कहा और स्वयं जाकर देवी को प्रणाम कर के इतने ज़ोर-से तलवार मारी कि उसका सिर धड़ से अलग हो गया।

देर हो जाने पर जब उसका मित्र मन्दिर के अन्दर गया तो देखता क्या है कि उसके मित्र का सिर धड़ से अलग पड़ा है। उसने सोचा कि यह दुनिया बड़ी बुरी है। कोई यह तो समझेगा नहीं कि इसने अपने-आप शीश चढ़ाया है। सब यही कहेंगे कि इसकी सुन्दर स्त्री को हड़पने के लिए मैंने इसकी गर्दन काट दी। इससे कहीं मर जाना अच्छा है। यह सोच उसने तलवार लेकर अपनी गर्दन उड़ा दी।

उधर बाहर खड़ी-खड़ी स्त्री हैरान हो गयी तो वह मन्दिर के भीतर गयी। देखकर चकित रह गयी। सोचने लगी कि दुनिया कहेगी, यह बुरी औरत होगी, इसलिए दोनों को मार आयी इस बदनामी से मर जाना अच्छा है। यह सोच उसने तलवार उठाई और जैसे ही गर्दन पर मारनी चाही कि देवी ने प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, “मैं तुझपर प्रसन्न हूँ। जो चाहो, सो माँगो।”

स्त्री बोली, “हे देवी! इन दोनों को जिला दो।”

देवी ने कहा, “अच्छा, तुम दोनों के सिर मिलाकर रख दो।”

घबराहट में स्त्री ने सिर जोड़े तो गलती से एक का सिर दूसरे के धड़ पर लग गया। देवी ने दोनों को जिला दिया। अब वे दोनों आपस में झगड़ने लगे। एक कहता था कि यह स्त्री मेरी है, दूसरा कहता मेरी।

बेताल बोला, “हे राजन्! बताओ कि यह स्त्री किसकी हो?”

राजा ने कहा, “नदियों में गंगा उत्तम है, पर्वतों में सुमेरु, वृक्षों में कल्पवृक्ष और अंगों में सिर। इसलिए शरीर पर पति का सिर लगा हो, वही पति होना चाहिए।”

इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा उसे फिर लाया तो उसने सातवीं कहानी कही।

पाप किसको लगा ?

No comments :
काशी में प्रतापमुकुट नाम का राजा राज्य करता था। उसके वज्रमुकुट नाम का एक बेटा था। एक दिन राजकुमार दीवान के लड़के को साथ लेकर शिकार खेलने जंगल गया। घूमते-घूमते उन्हें तालाब मिला। उसके पानी में कमल खिले थे और हंस किलोल कर रहे थे। किनारों पर घने पेड़ थे, जिन पर पक्षी चहचहा रहे थे। दोनों मित्र वहाँ रुक गये और तालाब के पानी में हाथ-मुँह धोकर ऊपर महादेव के मन्दिर पर गये। घोड़ों को उन्होंने मन्दिर के बाहर बाँध दिया। वो मन्दिर में दर्शन करके बाहर आये तो देखते क्या हैं कि तालाब के किनारे राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ स्नान करने आई है। दीवान का लड़का तो वहीं एक पेड़ के नीचे बैठा रहा, पर राजकुमार से न रहा गया। वह आगे बढ़ गया। राजकुमारी ने उसकी ओर देखा तो वह उस पर मोहित हो गया। राजकुमारी भी उसकी तरफ़ देखती रही। फिर उसने किया क्या कि जूड़े में से कमल का फूल निकाला, कान से लगाया, दाँत से कुतरा, पैर के नीचे दबाया और फिर छाती से लगा, अपनी सखियों के साथ चली गयी।

उसके जाने पर राजकुमार निराश हो अपने मित्र के पास आया और सब हाल सुनाकर बोला, “मैं इस राजकुमारी के बिना नहीं रह सकता। पर मुझे न तो उसका नाम मालूम है, न ठिकाना। वह कैसे मिलेगी?”
दीवान के लड़के ने कहा, “राजकुमार, आप इतना घबरायें नहीं। वह सब कुछ बता गयी है।”
राजकुमार ने पूछा, “कैसे?”
वह बोला, “उसने कमल का फूल सिर से उतार कर कानों से लगाया तो उसने बताया कि मैं कर्नाटक की रहनेवाली हूँ। दाँत से कुतरा तो उसका मतलब था कि मैं दंतबाट राजा की बेटी हूँ। पाँव से दबाने का अर्थ था कि मेरा नाम पद्मावती है और छाती से लगाकर उसने बताया कि तुम मेरे दिल में बस गये हो।”
इतना सुनना था कि राजकुमार खुशी से फूल उठा। बोला, “अब मुझे कर्नाटक देश में ले चलो।”
दोनों मित्र वहाँ से चल दिये। घूमते-फिरते, सैर करते, दोनों कई दिन बाद वहाँ पहुँचे। राजा के महल के पास गये तो एक बुढ़िया अपने द्वार पर बैठी चरखा कातती मिली।
उसके पास जाकर दोनों घोड़ों से उतर पड़े और बोले, “माई, हम सौदागर हैं। हमारा सामान पीछे आ रहा है। हमें रहने को थोड़ी जगह दे दो।”
उनकी शक्ल-सूरत देखकर और बात सुनकर बुढ़िया के मन में ममता उमड़ आयी। बोली, “बेटा, तुम्हारा घर है। जब तक जी में आए, रहो।”
दोनों वहीं ठहर गये। दीवान के बेटे ने उससे पूछा, “माई, तुम क्या करती हो? तुम्हारे घर में कौन-कौन है? तुम्हारी गुज़र कैसे होती है?”
बुढ़िया ने जवाब दिया, “बेटा, मेरा एक बेटा है जो राजा की चाकरी में है। मैं राजा की बेटी पह्मावती की धाय थी। बूढ़ी हो जाने से अब घर में रहती हूँ। राजा खाने-पीने को दे देता है। दिन में एक बार राजकुमारी को देखने महल में जाती हूँ।”
राजकुमार ने बुढ़िया को कुछ धन दिया और कहा, “माई, कल तुम वहाँ जाओ तो राजकुमारी से कह देना कि जेठ सुदी पंचमी को तुम्हें तालाब पर जो राजकुमार मिला था, वह आ गया है।”
अगले दिन जब बुढ़िया राजमहल गयी तो उसने राजकुमार का सन्देशा उसे दे दिया। सुनते ही राजकुमारी ने गुस्सा होंकर हाथों में चन्दन लगाकर उसके गाल पर तमाचा मारा और कहा, “मेरे घर से निकल जा।”
बुढ़िया ने घर आकर सब हाल राजकुमार को कह सुनाया। राजकुमार हक्का-बक्का रह गया। तब उसके मित्र ने कहा, “राजकुमार, आप घबरायें नहीं, उसकी बातों को समझें। उसने देसों उँगलियाँ सफ़ेद चन्दन में मारीं, इससे उसका मतलब यह है कि अभी दस रोज़ चाँदनी के हैं। उनके बीतने पर मैं अँधेरी रात में मिलूँगी।”
दस दिन के बाद बुढ़िया ने फिर राजकुमारी को ख़बर दी तो इस बार उसने केसर के रंग में तीन उँगलियाँ डुबोकर उसके मुँह पर मारीं और कहा, “भाग यहाँ से।”
बुढ़िया ने आकर सारी बात सुना दी। राजकुमार शोक से व्याकुल हो गया। दीवान के लड़के ने समझाया, “इसमें हैरान होने की क्या बात है? उसने कहा है कि मुझे मासिक धर्म हो रहा है। तीन दिन और ठहरो।”
तीन दिन बीतने पर बुढ़िया फिर वहाँ पहुँची। इस बार राजकुमारी ने उसे फटकार कर पच्छिम की खिड़की से बाहर निकाल दिया। उसने आकर राजकुमार को बता दिया। सुनकर दीवान का लड़का बोला, “मित्र, उसने आज रात को तुम्हें उस खिड़की की राह बुलाया है।”
मारे खुशी के राजकुमार उछल पड़ा। समय आने पर उसने बुढ़िया की पोशाक पहनी, इत्र लगाया, हथियार बाँधे। दो पहर रात बीतने पर वह महल में जा पहुँचा और खिड़की में से होकर अन्दर पहुँच गया। राजकुमारी वहाँ तैयार खड़ी थी। वह उसे भीतर ले गयी।
अन्दर के हाल देखकर राजकुमार की आँखें खुल गयीं। एक-से-एक बढ़कर चीजें थीं। रात-भर राजकुमार राजकुमारी के साथ रहा। जैसे ही दिन निकलने को आया कि राजकुमारी ने राजकुमार को छिपा दिया और रात होने पर फिर बाहर निकाल लिया। इस तरह कई दिन बीत गये। अचानक एक दिन राजकुमार को अपने मित्र की याद आयी। उसे चिन्ता हुई कि पता नहीं, उसका क्या हुआ होगा। उदास देखकर राजकुमारी ने कारण पूछा तो उसने बता दिया। बोला, “वह मेरा बड़ा प्यारा दोस्त हैं बड़ा चतुर है। उसकी होशियारी ही से तो तुम मुझे मिल पाई हो।”
राजकुमारी ने कहा, “मैं उसके लिए बढ़िया-बढ़िया भोजन बनवाती हूँ। तुम उसे खिलाकर, तसल्ली देकर लौट आना।”
खाना साथ में लेकर राजकुमार अपने मित्र के पास पहुँचा। वे महीने भर से मिले नहीं। थे, राजकुमार ने मिलने पर सारा हाल सुनाकर कहा कि राजकुमारी को मैंने तुम्हारी चतुराई की सारी बातें बता दी हैं, तभी तो उसने यह भोजन बनाकर भेजा है।
दीवान का लड़का सोच में पड़ गया। उसने कहा, “यह तुमने अच्छा नहीं किया। राजकुमारी समझ गयी कि जब तक मैं हूँ, वह तुम्हें अपने बस में नहीं रख सकती। इसलिए उसने इस खाने में ज़हर मिलाकर भेजा है।”
यह कहकर दीवान के लड़के ने थाली में से एक लड्डू उठाकर कुत्ते के आगे डाल दिया। खाते ही कुत्ता मर गया।
राजकुमार को बड़ा बुरा लगा। उसने कहा, “ऐसी स्त्री से भगवान् बचाये! मैं अब उसके पास नहीं जाऊँगा।”
दीवान का बेटा बोला, “नहीं, अब ऐसा उपाय करना चाहिए, जिससे हम उसे घर ले चलें। आज रात को तुम वहाँ जाओ। जब राजकुमारी सो जाये तो उसकी बायीं जाँघ पर त्रिशूल का निशान बनाकर उसके गहने लेकर चले आना।”
राजकुमार ने ऐसा ही किया। उसके आने पर दीवान का बेटा उसे साथ ले, योगी का भेस बना, मरघट में जा बैठा और राजकुमार से कहा कि तुम ये गहने लेकर बाज़ार में बेच आओ। कोई पकड़े तो कह देना कि मेरे गुरु के पास चलो और उसे यहाँ ले आना।
राजकुमार गहने लेकर शहर गया और महल के पास एक सुनार को उन्हें दिखाया। देखते ही सुनार ने उन्हें पहचान लिया और कोतवाल के पास ले गया। कोतवाल ने पूछा तो उसने कह दिया कि ये मेरे गुरु ने मुझे दिये हैं। गुरु को भी पकड़वा लिया गया। सब राजा के सामने पहुँचे।
राजा ने पूछा, “योगी महाराज, ये गहने आपको कहाँ से मिले?”
योगी बने दीवान के बेटे ने कहा, “महाराज, मैं मसान में काली चौदस को डाकिनी-मंत्र सिद्ध कर रहा था कि डाकिनी आयी। मैंने उसके गहने उतार लिये और उसकी बायीं जाँघ में त्रिशूल का निशान बना दिया।”
इतना सुनकर राजा महल में गया और उसने रानी से कहा कि पद्मावती की बायीं जाँघ पर देखो कि त्रिशूल का निशान तो नहीं है। रानी देखा, तो था। राजा को बड़ा दु:ख हुआ। बाहर आकर वह योगी को एक ओर ले जाकर बोला, “महाराज, धर्मशास्त्र में खोटी स्त्रियों के लिए क्या दण्ड है?”
योगी ने जवाब दिया, “राजन्, ब्राह्मण, गऊ, स्त्री, लड़का और अपने आसरे में रहनेवाले से कोई खोटा काम हो जाये तो उसे देश-निकाला दे देना चाहिए।” यह सुनकर राजा ने पद्मावती को डोली में बिठाकर जंगल में छुड़वा दिया। राजकुमार और दीवान का बेटा तो ताक में बैठे ही थे। राजकुमारी को अकेली पाकर साथ ले अपने नगर में लौट आये और आनंद से रहने लगे।
इतनी बात सुनाकर बेताल बोला, “राजन्, यह बताओ कि पाप किसको लगा है?”
राजा ने कहा, “पाप तो राजा को लगा। दीवान के बेटे ने अपने स्वामी का काम किया। कोतवाल ने राजा को कहना माना और राजकुमार ने अपना मनोरथ सिद्ध किया। राजा ने पाप किया, जो बिना विचारे उसे देश-निकाला दे दिया।”
राजा का इतना कहना था कि बेताल फिर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा वापस गया और बेताल को लेकर चल दिया। बेताल बोला, “राजन्, सुनो, एक कहानी और सुनाता हूँ।

सबसे बड़ा कौन?

No comments :
अंग देश के एक गाँव मे एक धनी ब्राह्मण रहता था। उसके तीन पुत्र थे। एक बार ब्राह्मण ने एक यज्ञ करना चाहा। उसके लिए एक कछुए की जरूरत हुई। उसने तीनों भाइयों को कछुआ लाने को कहा। वे तीनों समुद्र पर पहुँचे। वहाँ उन्हें एक कछुआ मिल गया। बड़े ने कहा, “मैं भोजनचंग हूँ, इसलिए कछुए को नहीं छुऊँगा।” मझला बोला, “मैं नारीचंग हूँ, मैं नहीं ले जाऊँगा।” सबसे छोटा बोल, “मैं शैयाचंग हूँ, सो मैं नहीं ले जाऊँगा।”

वे तीनों इस बहस में पड़ गये कि उनमें कौन बढ़कर है। जब वे आपस में इसका फैसला न कर सके तो राजा के पास पहुँचे। राजा ने कहा, “आप लोग रुकें। मैं तीनों की अलग-अलग जाँच करूँगा।”


इसके बाद राजा ने बढ़िया भोजन तैयार कराया और तीनों खाने बैठे। सबसे बड़े ने कहा, “मैं खाना नहीं खाऊँगा। इसमें मुर्दे की गन्ध आती है।” वह उठकर चला। राजा ने पता लगाया तो मालूम हुआ कि वह भोजन श्मशान के पास के खेत का बना था। राजा ने कहा, “तुम सचमुच भोजनचंग हो, तुम्हें भोजन की पहचान है।”

रात के समय राजा ने एक सुन्दर वेश्या को मझले भाई के पास भेजा। ज्योंही वह वहाँ पहुँची कि मझले भाई ने कहा, “इसे हटाओ यहाँ से। इसके शरीर से बकरी का दूध की गंध आती है।”

राजा ने यह सुनकर पता लगाया तो मालूम हुआ कि वह वेश्या बचपन में बकरी के दूध पर पली थी। राजा बड़ा खुश हुआ और बोला, “तुम सचमुच नारीचंग हो।”

इसके बाद उसने तीसरे भाई को सोने के लिए सात गद्दों का पलंग दिया। जैसे ही वह उस पर लेटा कि एकदम चीखकर उठ बैठा। लोगों ने देखा, उसकी पीठ पर एक लाल रेखा खींची थी। राजा को ख़बर मिली तो उसने बिछौने को दिखवाया। सात गद्दों के नीचे उसमें एक बाल निकला। उसी से उसकी पीठ पर लाल लकीर हो गयी थीं।

राजा को बड़ा अचरज हुआ उसने तीनों को एक-एक लाख अशर्फियाँ दीं। अब वे तीनों कछुए को ले जाना भूल गये, वहीं आनन्द से रहने लगे।

इतना कहकर बेताल बोला, “हे राजा! तुम बताओ, उन तीनों में से बढ़कर कौन था?”

राजा ने कहा, “मेरे विचार से सबसे बढ़कर शैयाचंग था, क्योंकि उसकी पीठ पर बाल का निशान दिखाई दिया और ढूँढ़ने पर बिस्तर में बाल पाया भी गया। बाकी दो के बारे में तो यह कहा जा सकता है कि उन्होंने किसी से पूछकर जान लिया होगा।”

इतना सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा लौटकर वहाँ गया और उसे लेकर लौटा तो उसने यह कहानी कही।

राजा और सेवक काम किसका बड़ा

No comments :
मिथलावती नाम की एक नगरी थी। उसमें गुणधिप नाम का राजा राज करता था। उसकी सेवा करने के लिए दूर देश से एक राजकुमार आया। वह बराबर कोशिश करता रहा, लेकिन राजा से उनकी भेंट न हुई। जो कुछ वह अपने साथ लाया था, वह सब बराबर हो गया।

एक दिन राजा शिकार खेलने चला। राजकुमार भी साथ हो लिया। चलते-चलते राजा एक वन में पहुँचा। वहाँ उसके नौकर-चाकर बिछुड़ गये। राजा के साथ अकेला वह राजकुमार रह गया। उसने राजा को रोका। राजा ने उसकी ओर देखा तो पूछा, “तू इतना कमजोर क्यों हो रहा है।” उसने कहा, “इसमें मेरे कर्म का दोष है। मैं जिस राजा के पास रहता हूँ, वह हजारों को पालता है, पर उसकी निगाह मेरी और नहीं जाती। राजन् छ: बातें आदमी को हल्का करती हैं—खोटे नर की प्रीति, बिना कारण हँसी, स्त्री से विवाद, असज्जन स्वामी की सेवा, गधे की सवारी और बिना संस्कृत की भाषा। और हे राजा, ये पाँच चीज़ें आदमी के पैदा होते ही विधाता उसके भाग्य में लिख देता है—आयु, कर्म, धन, विद्या और यश। राजन्, जब तक आदमी का पुण्य उदय रहता है, तब तक उसके बहुत-से दास रहते हैं। जब पुण्य घट जाता है तो भाई भी बैरी हो जाते हैं। पर एक बात है, स्वामी की सेवा अकारथ नहीं जाती। कभी-न-कभी फल मिल ही जाता है।”



यह सुन राजा के मन पर उसका बड़ा असर हुआ। कुछ समय घूमने-घामने के बाद वे नगर में लौट आये। राजा ने उसे अपनी नौकरी में रख लिया। उसे बढ़िया-बढ़िया कपड़े और गहने दिये।

एक दिन राजकुमार किसी काम से कहीं गया। रास्ते में उसे देवी का मन्दिर मिला। उसने अन्दर जाकर देवी की पूजा की। जब वह बाहर निकला तो देखता क्या है, उसके पीछे एक सुन्दर स्त्री चली आ रही है। राजकुमार उसे देखते ही उसकी ओर आकर्षित हो गया। स्त्री ने कहा, “पहले तुम कुण्ड में स्नान कर आओ। फिर जो कहोगे, सो करूँगी।”

इतना सुनकर राजकुमार कपड़े उतारकर जैसे ही कुण्ड में घुसा और गोता लगाया कि अपने नगर में पहुँच गया। उसने जाकर राजा को सारा हाल कह-सुनाया। राजा ने कहा, “यह अचरज मुझे भी दिखाओ।”

दोनों घोड़ों पर सवार होकर देवी के मन्दिर पर आये। अन्दर जाकर दर्शन किये और जैसे ही बाहर निकले कि वह स्त्री प्रकट हो गयी। राजा को देखते ही बोली, “महाराज, मैं आपके रूप पर मुग्ध हूँ। आप जो कहेंगे, वही करुँगी।”

राजा ने कहा, “ऐसी बात है तो तू मेरे इस सेवक से विवाह कर ले।”

स्त्री बोली, “यह नहीं होने का। मैं तो तुम्हें चाहती हूँ।”

राजा ने कहा, “सज्जन लोग जो कहते हैं, उसे निभाते हैं। तुम अपने वचन का पालन करो।”

इसके बाद राजा ने उसका विवाह अपने सेवक से करा दिया।

इतना कहकर बेताल बोला, “हे राजन्! यह बताओ कि राजा और सेवक, दोनों में से किसका काम बड़ा हुआ?”

राजा ने कहा, “नौकर का।”

बेताल ने पूछा, “सो कैसे?”

राजा बोला, “उपकार करना राजा का तो धर्म ही था। इसलिए उसके उपकार करने में कोई खास बात नहीं हुई। लेकिन जिसका धर्म नहीं था, उसने उपकार किया तो उसका काम बढ़कर हुआ?”

इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा जब उसे पुन: लेकर चला तो उसने आठवीं कहानी सुनायी।

किसकी स्री ??

No comments :
यमुना के किनारे धर्मस्थान नामक एक नगर था। उसे नगर में गणाधिप नाम का राजा राज करता था। उसी में केशव नाम का एक ब्राह्मण भी रहता था। ब्राह्मण यमुना के तीर पर जप-तप किया करता था। उसके एक लड़की थी, जिसका नाम मालती था। वह बड़ी रूपवती थी। जब वह ब्याह के योग्य हुई तो उसके माता, पिता और भाई को चिन्ता हुई। संयोग से एक दिन जब ब्राह्मण अपने किसी यजमान की बारात में गया था और भाई पढ़ने गया था, तभी उनके घर में एक ब्राह्मण का लड़का आया। लड़की की माँ ने उसके रूप और गुणों को देखकर उससे कहा कि मैं तुमसे अपनी लडकी का ब्याह करूँगी। होनहार की बात कि उधर ब्राह्मण पिता को भी एक दूसरा लड़का मिल गया और उसने उस लड़के को भी यही वचन दे दिया। उधर ब्राह्मण का लड़का जहाँ पढ़ने गया था, वहाँ वह एक लड़के से यही वादा कर आया।
कुछ समय बाद बाप-बेटे घर में इकट्ठे हुए तो देखते क्या हैं कि वहाँ एक तीसरा लड़का और मौजूद है। दो उनके साथ आये थे। अब क्या हो? ब्राह्मण, उसका लड़का और ब्राह्मणी बड़े सोच में पड़े। दैवयोग से हुआ क्या कि लड़की को साँप ने काट लिया और वह मर गयी। उसके बाप, भाई और तीनों लड़कों ने बड़ी भाग-दौड़ की, ज़हर झाड़नेवालों को बुलाया, पर कोई नतीजा न निकला। सब अपनी-अपनी करके चले गये।
दु:खी होकर वे उस लड़की को श्मशान में ले गये और क्रिया-कर्म कर आये। तीनों लड़कों में से एक ने तो उसकी हड्डियाँ चुन लीं और फकीर बनकर जंगल में चला गया। दूसरे ने राख की गठरी बाँधी और वहीं झोपड़ी डालकर रहने लगा। तीसरा योगी होकर देश-देश घुमने लगा।
एक दिन की बात है, वह तीसरा लड़का घूमते-घामते किसी नगर में पहुँचा और एक ब्राह्मणी के घर भोजन करने बैठा। जैसे ही उस घर की ब्राह्मणी भोजन परोसने आयी कि उसके छोटे लड़के ने उसका आँचल पकड़ लिया। ब्राह्मणी से अपना आँचल छुड़ता नहीं था। ब्राह्मणी को बड़ा गुस्सा आया। उसने अपने लड़के को झिड़का, मारा-पीटा, फिर भी वह न माना तो ब्राह्मणी ने उसे उठाकर जलते चूल्हें में पटक दिया। लड़का जलकर राख हो गया। ब्राह्मण बिना भोजन किये ही उठ खड़ा हुआ। घरवालों ने बहुतेरा कहा, पर वह भोजन करने के लिए राजी न हुआ। उसने कहा जिस घर में ऐसी राक्षसी हो, उसमें मैं भोजन नहीं कर सकता।


इतना सुनकर वह आदमी भीतर गया और संजीवनी विद्या की पोथी लाकर एक मन्त्र पढ़ा। जलकर राख हो चुका लड़का फिर से जीवित हो गया।
यह देखकर ब्राह्मण सोचने लगा कि अगर यह पोथी मेरे हाथ पड़ जाये तो मैं भी उस लड़की को फिर से जिला सकता हूँ। इसके बाद उसने भोजन किया और वहीं ठहर गया। जब रात को सब खा-पीकर सो गये तो वह ब्राह्मण चुपचाप वह पोथी लेकर चल दिया। जिस स्थान पर उस लड़की को जलाया गया था, वहाँ जाकर उसने देखा कि दूसरे लड़के वहाँ बैठे बातें कर रहे हैं। इस ब्राह्मण के यह कहने पर कि उसे संजीवनी विद्या की पोथी मिल गयी है और वह मन्त्र पढ़कर लड़की को जिला सकता है, उन दोनों ने हड्डियाँ और राख निकाली। ब्राह्मण ने जैसे ही मंत्र पढ़ा, वह लड़की जी उठी। अब तीनों उसके पीछे आपस में झगड़ने लगे।
इतना कहकर बेताल बोला, “राजा, बताओ कि वह लड़की किसकी स्त्री होनी चाहिए?”
राजा ने जवाब दिया, “जो वहाँ कुटिया बनाकर रहा, उसकी।”
बेताल ने पूछा, “क्यों?”
राजा बोला, “जिसने हड्डियाँ रखीं, वह तो उसके बेटे के बराबर हुआ। जिसने विद्या सीखकर जीवन-दान दिया, वह बाप के बराबर हुआ। जो राख लेकर रमा रहा, वही उसकी हक़दार है।”
राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा को फिर लौटना पड़ा और जब वह उसे लेकर चला तो बेताल ने तीसरी कहानी सुनायी।

विक्रम और बेताल 

विक्रम और बेताल

No comments :


बहुत पुरानी बात है। धारा नगरी में गंधर्वसेन नाम का एक राजा राज करते थे। उसके चार रानियाँ थीं। उनके छ: लड़के थे जो सब-के-सब बड़े ही चतुर और बलवान थे। संयोग से एक दिन राजा की मृत्यु हो गई और उनकी जगह उनका बड़ा बेटा शंख गद्दी पर बैठा। उसने कुछ दिन राज किया, लेकिन छोटे भाई विक्रम ने उसे मार डाला और स्वयं राजा बन बैठा। उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता गया और वह सारे जम्बूद्वीप का राजा बन बैठा। एक दिन उसके मन में आया कि उसे घूमकर सैर करनी चाहिए और जिन देशों के नाम उसने सुने हैं, उन्हें देखना चाहिए। सो वह गद्दी अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर, योगी बन कर, राज्य से निकल पड़ा।



उस नगर में एक ब्राह्मण तपस्या करता था। एक दिन देवता ने प्रसन्न होकर उसे एक फल दिया और कहा कि इसे जो भी खायेगा, वह अमर हो जायेगा। ब्रह्मण ने वह फल लाकर अपनी पत्नी को दिया और देवता की बात भी बता दी। ब्राह्मणी बोली, “हम अमर होकर क्या करेंगे? हमेशा भीख माँगते रहेंगें। इससे तो मरना ही अच्छा है। तुम इस फल को ले जाकर राजा को दे आओ और बदले में कुछ धन ले आओ।”

यह सुनकर ब्राह्मण फल लेकर राजा भर्तृहरि के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। भर्तृहरि ने फल ले लिया और ब्राह्मण को एक लाख रुपये देकर विदा कर दिया। भर्तृहरि अपनी एक रानी को बहुत चाहता था। उसने महल में जाकर वह फल उसी को दे दिया। रानी की मित्रता शहर-कोतवाल से थी। उसने वह फल कोतवाल को दे दिया। कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। वह उस फल को उस वेश्या को दे आया। वेश्या ने सोचा कि यह फल तो राजा को खाना चाहिए। वह उसे लेकर राजा भर्तृहरि के पास गई और उसे दे दिया। भर्तृहरि ने उसे बहुत-सा धन दिया; लेकिन जब उसने फल को अच्छी तरह से देखा तो पहचान लिया। उसे बड़ी चोट लगी, पर उसने किसी से कुछ कहा नहीं। उसने महल में जाकर रानी से पूछा कि तुमने उस फल का क्या किया। रानी ने कहा, “मैंने उसे खा लिया।” राजा ने वह फल निकालकर दिखा दिया। रानी घबरा गयी और उसने सारी बात सच-सच कह दी। भर्तृहरि ने पता लगाया तो उसे पूरी बात ठीक-ठीक मालूम हो गयी। वह बहुत दु:खी हुआ। उसने सोचा, यह दुनिया माया-जाल है। इसमें अपना कोई नहीं। वह फल लेकर बाहर आया और उसे धुलवाकर स्वयं खा लिया। फिर राजपाट छोड, योगी का भेस बना, जंगल में तपस्या करने चला गया।

भर्तृहरि के जंगल में चले जाने से विक्रम की गद्दी सूनी हो गयी। जब राजा इन्द्र को यह समाचार मिला तो उन्होंने एक देव को धारा नगरी की रखवाली के लिए भेज दिया। वह रात-दिन वहीं रहने लगा।

भर्तृहरि के राजपाट छोड़कर वन में चले जाने की बात विक्रम को मालूम हुई तो वह लौटकर अपने देश में आया। आधी रात का समय था। जब वह नगर में घुसने लगा तो देव ने उसे रोका। राजा ने कहा, “मैं विक्रम हूँ। यह मेरा राज है। तुम रोकने वाले कौन होते होते?”

देव बोला, “मुझे राजा इन्द्र ने इस नगर की चौकसी के लिए भेजा है। तुम सच्चे राजा विक्रम हो तो आओ, पहले मुझसे लड़ो।”

दोनों में लड़ाई हुई। राजा ने ज़रा-सी देर में देव को पछाड़ दिया। तब देव बोला, “हे राजन्! तुमने मुझे हरा दिया। मैं तुम्हें जीवन-दान देता हूँ।”

इसके बाद देव ने कहा, “राजन्, एक नगर और एक नक्षत्र में तुम तीन आदमी पैदा हुए थे। तुमने राजा के घर में जन्म लिया, दूसरे ने तेली के और तीसरे ने कुम्हार के। तुम यहाँ का राज करते हो, तेली पाताल का राज करता था। कुम्हार ने योग साधकर तेली को मारकर शम्शान में पिशाच बना सिरस के पेड़ से लटका दिया है। अब वह तुम्हें मारने की फिराक में है। उससे सावधान रहना।”

इतना कहकर देव चला गया और राजा महल में आ गया। राजा को वापस आया देख सबको बड़ी खुशी हुई। नगर में आनन्द मनाया गया। राजा फिर राज करने लगा।

एक दिन की बात है कि शान्तिशील नाम का एक योगी राजा के पास दरबार में आया और उसे एक फल देकर चला गया। राजा को आशंका हुई कि देव ने जिस आदमी को बताया था, कहीं यह वही तो नहीं है! यह सोच उसने फल नहीं खाया, भण्डारी को दे दिया। योगी आता और राजा को एक फल दे जाता।

संयोग से एक दिन राजा अपना अस्तबल देखने गया था। योगी वहीं पहुँच और फल राजा के हाथ में दे दिया। राजा ने उसे उछाला तो वह हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़ा। उसी समय एक बन्दर ने झपटकर उसे उठा लिया और तोड़ डाला। उसमें से एक लाल निकला, जिसकी चमक से सबकी आँखें चौंधिया गयीं। राजा को बड़ा अचरज हुआ। उसने योगी से पूछा, “आप यह लाल मुझे रोज़ क्यों दे जाते हैं?”

योगी ने जवाब दिया, “महाराज! राजा, गुरु, ज्योतिषी, वैद्य और बेटी, इनके घर कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”

राजा ने भण्डारी को बुलाकर पीछे के सब फल मँगवाये। तुड़वाने पर सबमें से एक-एक लाल निकला। इतने लाल देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ। उसने जौहरी को बुलवाकर उनका मूल्य पूछा। जौहरी बोला, “महाराज, ये लाल इतने कीमती हैं कि इनका मोल करोड़ों रुपयों में भी नहीं आँका जा सकता। एक-एक लाल एक-एक राज्य के बराबर है।”

यह सुनकर राजा योगी का हाथ पकड़कर गद्दी पर ले गया। बोला, “योगीराज, आप सुनी हुई बुरी बातें, दूसरों के सामने नहीं कही जातीं।”

राजा उसे अकेले में ले गया। वहाँ जाकर योगी ने कहा, “महाराज, बात यह है कि गोदावरी नदी के किनारे मसान में मैं एक मंत्र सिद्ध कर रहा हूँ। उसके सिद्ध हो जाने पर मेरा मनोरथ पूरा हो जायेगा। तुम एक रात मेरे पास रहोगे तो मंत्र सिद्ध हो जायेगा। एक दिन रात को हथियार बाँधकर तुम अकेले मेरे पास आ जाना।”

राजा ने कहा “अच्छी बात है।”

इसके उपरान्त योगी दिन और समय बताकर अपने मठ में चला गया।

वह दिन आने पर राजा अकेला वहाँ पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

योगी ने कहा, “राजन्, “यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर मसान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा लटका है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”

यह सुनकर राजा वहाँ से चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन राजा हिम्मत से आगे बढ़ता गया। जब वह मसान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे किर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

राजा ने नीचे आकर पूछा, “तू कौन है?”

राजा का इतना कहना था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा। राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी वह मुर्दा फिर पेड़ पर जा लटका। राजा फिर चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। बोला, “बता, तू कौन है?”

मुर्दा चुप रहा।

तब राजा ने उसे एक चादर में बाँधा और योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है!

राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”

बेताल बोला, “मैं एक शर्त पर चलूँगा। अगर तू रास्ते में बोलेगा तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।”

राजा ने उसकी बात मान ली। फिर बेताल बोला, “ पण्डित, चतुर और ज्ञानी, इनके दिन अच्छी-अच्छी बातों में बीतते हैं, जबकि मूर्खों के दिन कलह और नींद में। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।


किसकी स्री ?