निसंतान दम्पति करे संतान सप्तमी पूजा

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भादो महीने के शुक्ल पक्ष कि सप्तमी को संतान सप्तमी व्रत किया जाता है. इस बार यह व्रत 16 सितंबर 2018 को है. संतान सप्तमी व्रत को भुक्ताभरण संतान सप्तमी व्रत भी कहा जाता है। माएं अपनी संतान की लंबी आयु और उन्नति के लिए यह व्रत रखती हैं. संतान सप्तमी व्रत के दिन भगवान शंकर और माता पार्वती की पूजा होती है. इस दिन व्रत रखने का खास महत्व है।




 श्री कृष्ण युधिष्ठिर को स्वयं सुनायी थी कथा  तब माँ देवकी के जन्मे थे कृष्ण
आदिकालांतर पहले भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को एक कथा सुनाई। कथा में बताया कि कुछ समय पहले मथुरा में लोमश नाम के ऋषि आए थे। ऋषि जी की माता देवकी और पिता वासुदेव ने बड़े ही भक्ति-भाव से सेवा और पूजा की। सेवाभाव से प्रसन्न होकर ऋषि ने कंस द्वारा मारे गए पुत्रों के शोक से उभरने के लिए उन्हे संतान सप्तमी का व्रत करने के लिए कहा। लोमश ऋषि ने उन्हें व्रत की पूजा-अर्चना विधि-विधान से करने के लिए मार्गदर्शित किया।

संतान सप्तमी व्रत का महत्व
ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और मां पार्वती व भगवान शंकर की पूजा करने से जिन महिलाओं को संतान नहीं है, उन्हें महादेव और मां पार्वती के आर्शीवाद से कार्तिक और गणेश जैसी तेजस्वी संतान की प्राप्ति होती है. जिन माताओं की संतान है, उन्हें भोलेनाथ और मां गौरी उन्नति और लंबी आयु का वरदान देते हैं।

संतान सप्तमी व्रत पूजन विधि
1. सबसे पहले सुबह-सुबह उठकर स्नान कर लें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें.
2. इसके बाद भगवान विष्णु और भगवान शंकर की पूजा करें. साथ में भगवान शंकर के पूरे परिवार और नारायण के पूरे परिवार की भी पूजा करें.

3. निराहार सप्तमी व्रत का संकल्प लें.
4. दोपहर में चौक पूरकर चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेध, सुपारी तथा नारियल आदि से फिर से भगवान शंकर और माता पार्वती की पूजा करें.
5. सप्तमी तिथि के व्रत में नैवेद्ध के रूप में खीर-पूरी तथा गुड़ के पुए बनाये जाते हैं.
6. संतान की रक्षा की कामना करते हुए शिवजी को कलावा चढ़ाएं और बाद में इसे खुद धारण करें। आज कल कुछ लोग कलावा की जगह चाँदी का कड़ा बनवा कर उसको सीधे हाथ में धारण कर लेते है। ये कड़ा आपको दूसरे साल की पूजा मैं भी काम आ  जाता है।
7 .चाँदी के कड़े मैं हर साल कुछ चाँदी बड़ाई जाती है।
8. इसके बाद व्रत कथा सुनें ओर शिव और पार्वती जी की आरती करें।
9. पूजा के पशचात उपवास करे और एक समय व्रत का भोजन करे।


संतान सप्तमी व्रत कथा



संतान सप्तमी व्रत कथा

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पौराणिक कथा के अनुसार यह कथा श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी. एक बार मथुरा में लोमश ऋषि आए. देवकी और वसुदेव ने भक्तिपूर्वक उनकी सेवा की. देवकी और वसुदेव की सेवा से प्रसन्न होकर लोमेश ऋषि ने उन्हें कंस द्वारा मारे गए पुत्रों के शोक से उबरने का उपाया बताया और कहा कि उन्हें ‘संतान सप्तमी’ का व्रत करना चाहिए.लोमश ऋषि ने देवकी और वसुदेव को व्रत की विधि और कथा सुनाई, जो इस प्रकार है।

अयोध्यापुरी नगर का प्रतापी राजा था, जिसका नाम नहुष था. उसकी पत्नी का नाम चंद्रमुखी था. उसी राज्य में विष्णुदत्त नाम का एक ब्राह्मण भी रहता था. उसकी पत्नी का नाम रूपवती था.रानी चंद्रमुखी तथा रूपवती सखियां थीं. दोनों साथ में ही सारा काम करतीं. स्नान से लेकर पूजन तक दोनों एक साथ ही करतीं. एक दिन सरयू नदी में दोनों स्नान कर रही थीं और वहीं कई स्त्रियां स्नान कर रही थीं. सभी ने मिलकर वहां भगवान शंकर और मां पार्वती की एक मूर्ति बनाई और उसकी पूजा करने लगीं.
चंद्रमुखी और रूपवती ने उन स्त्रियों से इस पूजन का नाम और विधि बताने कहा. उन्होंने बताया कि यह संतान सप्तमी व्रत है और यह व्रत संतान देने वाला है. यह सुनकर दोनों सखियों ने इस व्रत को जीवनभर करने का संकल्प लिया. लेकिन घर पहुंचकर रानी भूल गईं और भोजन कर लिया. मृत्यु के बाद रानी वानरी और ब्राह्मणी मुर्गी की योनि में पैदा हुईं.
कालांतर में दोनों पशु योनि छोड़कर पुनः मनुष्य योनि में आईं. चंद्रमुखी मथुरा के राजा पृथ्वीनाथ की रानी बनी तथा रूपवती ने फिर एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया. इस जन्म में रानी का नाम ईश्वरी तथा ब्राह्मणी का नाम भूषणा था. भूषणा का विवाह राजपुरोहित अग्निमुखी के साथ हुआ. इस जन्म में भी उन दोनों में बड़ा प्रेम हो गया।लेकिन पिछले जन्म में व्रत करना भूल गई थीं, इसलि रानी को इस जन्म में संतान प्राप्ति का सुख नहीं मिला. लेकिन भूषणा नहीं भूली थी. उसने व्रत किया था. इसलिए उसे सुंदर और स्वस्थ आठ पुत्र हुए.
संतान ना होने के कारण रानी परेशान रहने लगी, तभी एक दिन भूषणा उन्हें मिली. भूषणा के पुत्रों को देखकर रानी को जलन हुई और उसने बच्चों को मारने का प्रयास किया. लेकिन भूषणा के किसी भी पुत्र को नुकसान नहीं पहुंचा और वह अंत में रानी को क्षमा मांगना पड़ा.
भूूूषणा ने रानी को पिछले जन्म की बात याद दिलाई और कहा उसी के प्रभाव से आपको संतान प्राप्ति नहीं हुई है और मेरे पुत्रों को चाहकर भी आप नुकसान नहीं पहुंचा पाईं. यह सुनकर रानी ने विधिपूर्वक संतान सुख देने वाला यह मुक्ताभरण व्रत रखा. जिसके बाद रानी के गर्भ से भी संतान का जन्म हुआ।

शिव जी की आरती 

पार्वती जी की आरती

मुबारक हो जन्मदिन हो राधारानी

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हिंदू धर्म में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधा अष्टमी मनाई जाती है । शास्त्रों में इस तिथि को श्री राधाजी का जन्म दिवस माना गया है। श्री राधाजी वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। वेद तथा पुराणादि में जिनका ‘कृष्ण वल्लभा’ कहकर गुणगान किया गया है, वे श्री वृन्दावनेश्वरी राधा कृष्णप्रिया थीं। कुछ महानुभाव श्री राधाजी का प्राकट्य श्री वृषभानुपुरी (बरसाना) या उनके ननिहाल रावल ग्राम में प्रातःकाल का मानते हैं। कल्पभेद से यह मान्य है, पर पुराणों में मध्याह्न का वर्णन ही प्राप्त होता है।


शास्त्रों में श्री राधा कृष्ण की शाश्वत शक्तिस्वरूपा एवम प्राणों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में वर्णित हैं अतः राधा जी की पूजा के बिना श्रीकृष्ण जी की पूजा अधूरी मानी गयी है। श्रीमद देवी भागवत में श्री नारायण ने नारद जी के प्रति ‘श्री राधायै स्वाहा’ षडाक्षर मंत्र की अति प्राचीन परंपरा तथा विलक्षण महिमा के वर्णन प्रसंग में श्री राधा पूजा की अनिवार्यता का निरूपण करते हुए कहा है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो मनुष्य श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार नहीं रखता। अतः समस्त वैष्णवों को चाहिए कि वे भगवती श्री राधा की अर्चना अवश्य करें। श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान इनके अधीन रहते हैं। यह संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती हैं, इसी कारण इन्हें श्री राधा कहा गया है।
राधारानी की पूजन  विधि  
अन्य व्रतों की भांति इस दिन भी प्रात: उठकर स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर श्री राधा जी का विधिवत पूजन करना चाहिए। इस पूजन हेतु मध्याह्न का समय उपयुक्त माना गया है। पूजन स्थल में पांच रंगों से मंडप सजाएं,कमलयंत्र या कमल के आकार की रंगोली बनाएं, उस कमल के मध्य में दिव्य आसन पर श्री राधा कृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख करके स्थापित करें। राधा कृष्णा की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराकर, उनका श्रृंगार करें। राधा जी को सोलह सिंगार चढ़ाये।इस दिन पूजन स्थल में ध्वजा, पुष्पमाला,वस्त्र, पताका, तोरणादि व विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्नों एवं फलों से श्री राधा जी की स्तुति करनी चाहिए। मंदिर में दिपदान करना चाहिए।पूजा के पश्चात उपवास रखना चाहिए  अथवा एक समय व्रत का भोजन करना चाहिए।

राधारानी व्रत कथा
राधा जी का जन्म वरदान के रूप में बृषभान के घर गोकुल के पास रावलग्राम में हुआ था।कुछ दिन बाद राधा के पिता ने वृंदावन में व्रषभानुपुरा नामक गांव बसाया जिसे आज बरसाना के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर राधा जी का अधीश्वरी के रूप में महाभिषेक हुआ था। अभिषेक के समय सभी देवी-देवता वहां उपस्थित थे और राधा जी को स्वर्ग सिंहासन पर बैठाया गया। लेकिन आरती करते समय सभी के मन में प्रश्न आया कि राधा रानी पूरें ब्रह्माण्ड की अधीश्वरी है तो फिर उन्हें सोलह कोस में फैले वृंदावन का आधिपत्य सौपनें की क्या जरूरत है। काफी विचार-विमर्श के साथ यह निर्णय हुआ कि बैकुंठ से ज्य़ादा महत्व मथुरा का है, तो इससे ज्यादा महत्व वृंदावन का होगा। महाभिषेक में सभी देवी-देवताओं ने दान के रूप में उन्हें कुछ न कुछ दिया। सावित्री ने पद्ममाला, इंद्रपत्नी शची ने स्वर्ण सिहांसन, कुबेर की पत्नी मनोरमा ने रत्नालकार, वरुण की पत्नी प्रिया गौरी ने दिव्य छत्र, पवन पत्नी शिवा ने यामर-युगल आदि दिए। साथ ही राधा जी की सेवा में पजारों सखियों में कुछ का स्थान सर्वोपरि है। जिनका नाम श्री ललिता, श्री विशाखा, श्री चिना, श्री रंग देवी, श्री तुंगा विघा आदि थी। इन्ही सखियों में वृंदावन का अष्ट सश्वी मंदिर बना है।

राधाष्टमी पूजन व व्रत का महत्व

वेद तथा पुराणादि में राधाजी का ‘कृष्ण वल्लभा’ कहकर गुणगान किया गया है, वहीं वे कृष्णप्रिया हैं। राधा जन्म कथा का श्रवण करने से भक्त सुखी, धनी और सर्वगुण संपन्न बनता है। भक्तिपूर्वक श्री राधाजी का मंत्र जाप एवं स्मरण मोक्ष प्रदान करता है। श्रीमद देवी भागवत श्री राधा जी कि पूजा की अनिवार्यता का निरूपण करते हुए कहा है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो भक्त श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार भी नहीं रखता। श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी मानी गई हैं।

राधाष्टमी प्रसाद 
 राधा अष्टमी पर राधा जी को अरबी की सब्जी का भोग जरूर लगना चाहिए। जिस प्रकार कृष्ण को मक्खन मिश्री पसंद है उसी प्रकार राधा जी को अरबी बहुत प्रिय है ।


राधाजी की आरती 



आरती राधा जी की

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                    🍂  राधा जी आरती 🍂
आरती श्री वृषभानुसुता की,
मंजु मूर्ति मोहन ममता की।।
त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,
विमल विवेक विराग विकासिनि।
पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि,
सुन्दरतम छवि सुन्दरता की।।
आरती श्री वृषभानुसुता की।












मुनि मन मोहन मोहन मोहनि,
मधुर मनोहर मूरती सोहनि।
अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि,
प्रिय अति सदा सखी ललिता की।।
आरती श्री वृषभानुसुता की।

संतत सेव्य सत मुनि जनकी,
आकर अमित दिव्यगुन गनकी।
आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी,
अति अमूल्य सम्पति समता की।।
आरती श्री वृषभानुसुता की।

कृष्णात्मिका, कृषण सहचारिणि,
चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि।
जगज्जननि जग दुखनिवारिणि,
आदि अनादिशक्ति विभुता की।।
आरती श्री वृषभानुसुता की।


आओ मिलकर भेज गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं।।

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         ।।गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं।।





भगवान श्री गणेश की कृपा, बनी रहे आप हर दम। 
हर कार्य में सफलता मिले, जीवन में न आये कोई गम। 
                 गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं।।

         
                           🕉️🕉️🕉️

रूप बड़ा निराला,गणपति मेरा बड़ा प्यार। जब कभी भी कोई आई मुसीबत, मेरे बप्पा ने पल में हाल कर डाला।
                      हैप्पी गणेश चतुर्थी।।

                              
                              🕉️🕉️🕉️



चलो खुशियो का जाम हो जाए, लेके बप्पा का नाम कुछ अच्छा काम हो जाए। खुशिया बाँट के हर जगह, आज का दिन बप्पा के नाम हो जाए। 

                        हैप्पी गणेश चतुर्थी।।

                               🕉️🕉️🕉️


रिद्धि-सिद्धि के तुम दाता, दीन दुखियों के भाग्य विधाता। जय गणपति देवा।


                               🕉️🕉️🕉️


एक, दो ,तीन ,चार, गणपति की जय जयकार। पाँच, छः, सात, आठ, गणपति है सबके साथ। 

                           
                           हैप्पी गणेश चतुर्थी।।

                                  🕉️🕉️🕉️


भगवान गणेश जी आपको खुशियाँ सम्पूर्ण दे, जो भी भक्ति इनकी करे उसे सुख-सम्पति भरपूर दे।


                            हैप्पी गणेश चतुर्थी।।

                          
                                 🕉️🕉️🕉️


ज़मीन पर आकाश झूम के बरसे, आपके ऊपर अपनों का प्यार बरसे। भगवान गणेश जी से बस यही प्रार्थना हैं, आप ख़ुशी के लिए नही, ख़ुशी आप के लिए तरसे। 


             गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें।। 

          
                                🕉️🕉️🕉️


सुख करता जय मोरया, दुख हरता जय मोरया। 

             गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं।।

        
                             🕉️🕉️🕉️

गणेश जी आपको नूर दे, खुशियाँ आपको संपूर्ण दे। आप जाए गणेश जी के दर्शन को, और गणेश जी आपको सुख संपति भरपूर दे। 

                         हैप्पी गणेश चतुर्थी।।

     
                                🕉️🕉️🕉️



पग में फूल खिले, हर ख़ुशी आपको मिले, कभी न हो दुखों का सामना, यही है मेरी गणेश चतुर्थी की शुभकामना।।



                                🕉️🕉️🕉️


वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।

                           शुभ गणेश चतुर्थी।।


                               🕉️🕉️🕉️



दिल से जो भी मांगोगे मिलेगा, ये गणेश जी का दरबार है; देवों के देव वक्रतुंड महाकाय को, अपने हर भक्त से प्यार है। 

                गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाये।।


                                   🕉️🕉️🕉️


भगवान श्री गणेश की कृपा, बनी रहे आप हर दम; हर कार्य में सफलता मिले, जीवन में न आये कोई गम। 
       
                     गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं।।

           
                                 🕉️🕉️🕉️




खुशियो की सौगात आए, गणेश जी आपके पास आए। आपके जीवन मे आए सुख संपाति की बाहर, गणेश जी अपने साथ लाए धन सम्पति अपार। 

          
          गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाये।।



                               🕉️🕉️🕉️




गणेश जी का रूप निराला है, चेहरा भी कितना भोला भाला है। जिसे भी आती है कोई मुसीबत, उसे इन्ही ने तो संभाला है। 

                            शुभ गणेश चतुर्थी।।


                                  🕉️🕉️🕉️



करके जग का दूर अंधेरा, आई सुबह लेकर साथ ख़ुशियाँ। गणपती जी की होगी कृपा, हैं सब पर आशीर्वाद उनका।

     
                             हैप्पी गणेश चतुर्थी।।



                                  🕉️🕉️🕉️



कर दो हमारे जीवन से, दु:ख दर्दो का नाश। चिंतामण कर दो कृपा, पुर्ण कर दो सब काज। 

      

                            हैप्पी गणेश चतुर्थी।।






पार्वती माता की आरती

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श्री पार्वती माता जी की आरती




जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
ब्रह्म सनातन देवी शुभ फल की दाता॥
जय पार्वती माता

अरिकुल पद्म विनाशिनि जय सेवक त्राता।
जग जीवन जगदम्बा, हरिहर गुण गाता॥
जय पार्वती माता
सिंह को वाहन साजे, कुण्डल हैं साथा।
देव वधू जस गावत, नृत्य करत ताथा॥
जय पार्वती माता

सतयुग रूपशील अतिसुन्दर, नाम सती कहलाता।
हेमांचल घर जन्मी, सखियन संग राता॥
जय पार्वती माता

शुम्भ निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्थाता।
सहस्त्र भुजा तनु धरि के, चक्र लियो हाथा॥
जय पार्वती माता

सृष्टि रूप तुही है जननी शिवसंग रंगराता।
नन्दी भृंगी बीन लही सारा जग मदमाता॥
जय पार्वती माता

देवन अरज करत हम चित को लाता।
गावत दे दे ताली, मन में रंगराता॥
जय पार्वती माता

श्री प्रताप आरती मैया की, जो कोई गाता।
सदासुखी नित रहता सुख सम्पत्ति पाता॥
जय पार्वती माता

हरितालिका तीज : पूजा, कथा और नियम

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          🌺।।ओम नमः शिवाय।।🌺

सौभाग्य से जुड़ा हरितालिका तीज का व्रत स्त्रियों और कुंवारी कन्याओं द्वारा किया जाता है। करवाचौथ के अलावा हमारे देश में पति की दीघार्यु के लिए एक और व्रत रहा जाता है वो है हरतालिका तीज। भाद्र मास के शुक्‍ल पक्ष की तीज को सुहागिन महिलाएं हरतालिका तीज के रूप में मनाती हैं। इस पावन व्रत में भगवान शिव, माता गौरी, एवं श्री गणेश जी की विधि-विधान से पूजा साधना-अराधना का बड़ा महत्व है। यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता है।   



कब आता है यह व्रत : 

हरितालिका तीज का व्रत भाद्रपद शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को हस्त नक्षत्र में दिनभर का निर्जल व्रत रहना चाहिए। मान्यता है कि सबसे पहले इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव के लिए रखा था। इस व्रत में भगवान शिव-पार्वती के विवाह की कथा सुनने का काफी महत्व है।


व्रत के नियम :

हरतालिका तीज का व्रत निर्जला किया जाता है। यानी पूरा दिन, पूरी रात और अगले दिन सूर्योदय के पश्‍चात अन्‍न और जल ग्रहण किया जाता है।
1 यह व्रत कुंवारी कन्‍याएं और सुहागिन महिलाएं रखती हैं।

2 इस व्रत को एक बार प्रारंभ करने के पश्‍चात छोड़ा नहीं जाता।

3 यदि कोई महिला खराब स्‍वास्‍थ्‍य के चलते यह व्रत नहीं रख पा रही है तो एक बार उद्यापन करने के पश्‍चात फलाहार के साथ यह व्रत रह सकती है।

4 हरतालिका व्रत में रात में सोया नहीं जाता है बल्कि पूरी रात प्रभु का भजन कीर्तन करना शुभ माना जाता है।

हरतालिका तीज व्रत कथा :

श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया। 

तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा। 

विष्‍णु से विवाह कराना चाहते थे पिता :

नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं। नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे। तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।

पार्वतीजी को नहीं था स्‍वीकार्य :

तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

सखियों के साथ चली गईं पार्वतीजी :

उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे। 













तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी। 


इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

तब मैं 'तथास्तु' कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।

गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।


हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

कुवारी कन्‍याएं भी रख सकती हैं व्रत :

पार्वतीजी की इस तपस्‍या से ही महिलाओं को हरतालिका तीज का व्रत करने की प्रेरणा मिलीं। कुंवारी कन्‍याएं भी सुयोग्‍य वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रख सकती हैं।

  पूजन के पश्चात क्या करें :

पूजन की समाप्ति पर पुष्पांजलि चढ़ाकर आरती, प्रदक्षिणा और प्रणाम करें। फिर कथा श्रवण करें। कथा के अंत में बांस की टोकरी या डलिया में मिष्ठान्न, वस्त्र, पकवान, सौभाग्य की सामग्री, दक्षिणा आदि रखकर आचार्य पुरोहित को दान करें। पूरे दिन और रात में जागरण करें और यथाशक्ति ओम नम: शिवाय का जप करें। दूसरे दिन और प्रात: भगवान शिव-पार्वती का व्रत का पारण करना चाहिए।

तीज शुभकामना संदेश

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हरियाली तीज का त्यौहार है
गुंजियों की बहार है
पेड़ों पर पड़े है झूले
दिलो में सबके प्यार है
हरियाली तीज की हार्दिक बधाई

Hariyali teej ki hardik badhai…




मदहोश कर देती है
हरियाली तीज की बहार
गाता है ये दिल झूम कर
जब झुलु में सखियों के साथ
तीज की हार्दिक शुभकामनाए
Teej ki hardik shubhkaamnayen

मेरा मन झूम-झूम नाचे गाये 
तीज के हरियाले गीत आज 
पिया संग झूलेंगे संग में मनाएंगे हरियाली तीज
हरियाली तीज की शुभकामनाएं
पेड़ों पर झूले
सावन की फुहार
मुबारक हो आपको
तीज का त्यौहार
बारिश की बूंदें इस सावन में
फैलाय चारों ओर हरियाली
ये हरतालिका का त्यौहार ले जाए
हर के आपकी सब परेशानी
हरतालिका तीज की बधाई
माँ पार्वती आप पर अपनी कृपा हमेशा बनाए रखे
आपको तीज की हार्दिक शुभकामनाएं

तीज है उमंगो का त्यौहार
फूल खिले है बागों में बारिश की है फुहार
दिल से आप सब को हो मुबारक
प्यारा ये तीज का त्यौहार
चंदन की खुशबू, बादलों की फुहार
आप सभी को मुबारक हो तीज का त्यौहार
शिवजी की कृपा होगी मिलेगा आशीर्वाद
जब मनायें मिलकर तीज, मिल जाये खुशियों की सौगात
तीज मुबारक!
बारिश की बूंदें इस सावन में
फैलाय चारों ओर हरियाली
ये हरतालिका का त्यौहार ले जाए
हर के आपकी सब परेशानी
हरतालिका तीज की बधाई