रंगों का त्योहार होली क्यों मनाया जाता है?
हिंदी मेरी पहचान मैं आपका स्वगत करती हूँ । आप सभी को मेरी तरफ से होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाये। आप सभी के जीवन मैं रंगों का त्योहार होली के उड़े रंग खिले दिल और मोहब्बत रहें बरक़रार खुशियाँ दे इस वर्ष आपको यह होली का त्यौहार। आज मैंं आपको ये बताना चाहती हूँ। हम होली क्यों मानते है।रंगों के त्यौहार’ के तौर पर मशहूर होली फाल्गुन महीने में पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। तेज संगीत और ढोल के बीच एक दूसरे पर रंग और पानी फेंका जाता है। भारत के अन्य त्यौहारों की तरह होली भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार होली से हिरण्यकश्यप की कहानी जुड़ी है।होली के त्योहार की अलग अलग विशेषताएं है। आईये जानते पौराणिक मान्यता क्या कहती हैं।
पौराणिक मान्यता :
● नृसिंह रूप में भगवान इसी दिन प्रकट हुए थे और हिरण्यकश्यप नामक असुर का वध कर भक्त प्रहलाद को दर्शन दिए थे।
● हिन्दू मास के अनुसार होली के दिन से नए संवत की शुरुआत होती है।
● चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन धरती पर प्रथम मानव मनु का जन्म हुआ था।
● इसी दिन कामदेव का पुनर्जन्म हुआ था। इन सभी खुशियों को व्यक्त करने के लिए रंगोत्सव मनाया जाता है।
● त्रेतायुग में विष्णु के 8वें अवतार श्री कृष्ण और राधारानी की होली ने रंगोत्सव में प्रेम का रंग भी चढ़ाया। श्री कृष्ण होली के दिन राधारानी के गांव बरसाने जाकर राधा और गोपियों के साथ होली खेलते थे। कृष्ण की रंगलीला ने होली को और भी आनंदमय बना दिया और यह प्रेम एवं अपनत्व का पर्व बन गया।
● भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।
सामाजिक मान्यता :
हिरण्यकश्यप प्राचीन भारत का एक राजा था जो कि राक्षस की तरह था वह अपने छोटे भाई की मौत का बदला लेना चाहता था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। इसलिए ताकत पाने के लिए उसने सालों तक प्रार्थना की आखिरकार उसे वरदान मिला। लेकिन इससे हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझने लगा और लोगों से खुद की भगवान की तरह पूजा करने को कहने लगा। इस दुष्ट राजा का एक बेटा था जिसका नाम प्रहलाद था और वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। प्रहलाद ने अपने पिता का कहना कभी नहीं माना और वह भगवान विष्णु की पूजा करता रहा। बेटे द्वारा अपनी पूजा ना करने से नाराज उस राजा ने अपने बेटे को मारने का निर्णय किया। उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए क्योंकि होलिका आग में जल नहीं सकती थी। उनकी योजना प्रहलाद को जलाने की थी, लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि प्रहलाद सारा समय भगवान विष्णु का नाम लेता रहा और बच गया पर होलिका जलकर राख हो गई। होलिका की ये हार बुराई के नष्ट होने का प्रतीक है। इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया, लेकिन होली से होलिका की मौत की कहानी जुड़ी है। इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होली जलाई जाती है।
रंगों का त्योहार कैसे बना होली?
यह कहानी भगवान विष्णु के अवतार भगवान कृष्ण के समय तक जाती है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण रंगों से होली खेलते थे, इसलिए होली का यह तरीका लोकप्रिय हुआ। वे वृंदावन और गोकुल में अपने साथियों के साथ होली खेलते थे। वे पूरे गांव में मज़ाक भरी शैतानियां करते थे। आज भी वृंदावन जैसी मस्ती भरी होली कहीं नहीं मनाई जाती होली वसंत का त्यौहार है और इसके आने पर सर्दियां खत्म होती हैं। कुछ हिस्सों में इस त्यौहार का संबंध वसंत की फसल पकने से भी है। किसान अच्छी फसल पैदा होने की खुशी में होली मनाते हैं। होली को ‘वसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहते हैं।
होली समारोह :
होली एक दिन का त्यौहार नहीं है। कई राज्यों में यह तीन दिन तक मनाया जाता है।
पूर्णिमा के दिन एक थाली में रंगों को सजाया जाता है और परिवार का सबसे बड़ा सदस्य बाकी सदस्यों पर रंग छिड़कता है।
इसे पूनो भी कहते हैं। इस दिन होलिका के चित्र जलाते हैं और होलिका और प्रहलाद की याद में होली जलाई जाती है। अग्नि देवता के आशीर्वाद के लिए मांएं अपने बच्चों के साथ जलती हुई होली के पांच चक्कर लगाती हैं।
इस दिन को ‘पर्व’ कहते हैं और यह होली उत्सव का अंतिम दिन होता है। इस दिन एक दूसरे पर रंग और पानी डाला जाता है।
पूर्णिमा के दिन एक थाली में रंगों को सजाया जाता है और परिवार का सबसे बड़ा सदस्य बाकी सदस्यों पर रंग छिड़कता है।
इसे पूनो भी कहते हैं। इस दिन होलिका के चित्र जलाते हैं और होलिका और प्रहलाद की याद में होली जलाई जाती है। अग्नि देवता के आशीर्वाद के लिए मांएं अपने बच्चों के साथ जलती हुई होली के पांच चक्कर लगाती हैं।
इस दिन को ‘पर्व’ कहते हैं और यह होली उत्सव का अंतिम दिन होता है। इस दिन एक दूसरे पर रंग और पानी डाला जाता है।
दशरथ मांझी “माउंटेन मैन” की कहानी
दशरथ मांझी “माउंटेन मैन” की कहानी
(जन्म: 1934 - 17 अगस्त 2007)
(जन्म: 1934 - 17 अगस्त 2007)
हिंदी मेरी पहचान मैं आपका स्वगत करती हूँ। आज यह मे एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बता रही हूँ ।जिसने ऐसा मुक़ाम हासिल किया कि उनके जाने के बाद उनके बनाये रास्ते पर लोग उन्हें अपनी ही परछाई मै ढूढते हैं।
दशरथ मांझी जिन्हें "माउंटेन मैन" के रूप में भी जाना जाता है । दशरथ मांझी, एक ऐसा नाम जो इंसानी जज़्बे और जुनून की मिसाल है।दशरथ मांझी एक बहेद पिछडे इलाके से आते थे और दलित जाति से थे दशरथ मांझी जो बिहार में गया के करीब गहलौर गांव के एक गरीब मजदूर थे।उन्होनें केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट के एक सड़क बना डाली। 22 वर्षों के परीश्रम के बाद, दशरथ की बनायी सड़क ने अतरी और वजीरगंज ब्लाक दूरी को 55 किलोमीटर से 15 किलोमीटर कर दिया।
जीवन चरित्र :
दशरथ मांझी काफी कम उम्र में अपने घर से भाग गए थे और धनबाद की कोयले की खानों में उन्होनें काम किया। फिर वे अपने घर लौट आए और फाल्गुनी देवी (दशरथ मांझी की पत्नी )से शादी की। दशरथ मांझी पहाड़ पर लकड़ी काटते थे।उनकी पत्नी उनके लिए खाना ले जाते समय पहाड़ के दर्रे में गिर गयी । और उनका निधन हो गया। अगर फाल्गुनी देवी को अस्पताल ले जाया गया होता तो शायद वो बच जाती । यह बात उनके मन में हमेशां के लिए दर्द बन गई। इसके बाद दशरथ मांझी ने संकल्प लिया कि वह अकेले अपने दम पर वे पहाड़ के बीचों बीच से रास्ता निकालेगे और जिस दर्द से उन्हें गुजरना पड़ा उस दर्द से फिर कभी कोई और न गुजरे फिर उन्होंने 360 फ़ुट-लम्बा (110 मी), 25 फ़ुट-गहरा (7.6 मी) 30 फ़ुट-चौड़ा (9.1 मी)गेहलौर की पहाड़ियों से रास्ता बनाना शुरू किया। इन्होंने बताया, “जब मैंने पहाड़ी तोड़ना शुरू किया तो लोगों ने मुझे पागल कहा लेकिन इस बात ने मेरे निश्चय को और भी मजबूत किया।
निर्माण कार्य :
उन्होंने अपने काम को 22 वर्षों (1960-1982) में पूरा किया। इस सड़क ने गया के अत्रि और वज़ीरगंज सेक्टर्स की दूरी को 55 किमी से 15 किमी कर दिया। माँझी के प्रयास का मज़ाक उड़ाया गया पर उनके इस प्रयास ने गेहलौर के लोगों के जीवन को सरल बना दिया आज लोग उनके जाने के बाद उन्हें अपनी ही परछाई मै ढूढते है।
हालांकि उन्होंने एक सुरक्षित पहाड़ को काटा, जो भारतीय वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम अनुसार दंडनीय है फिर भी उनका ये प्रयास सराहनीय है। बाद में मांझी ने कहा , पहले-पहले गाँव वालों ने मुझपर ताने कसे लेकिन उनमें से कुछ ने मुझे खाना दीया और औज़ार खरीदने में मेरी सहायता भी की।
स्वर्गवास :
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (all India Institute of Medical Sciences (AIMS) एम्स), नई दिल्ली में पित्ताशय (गॉल ब्लैडर) के कैंसर से पीड़ित मांझी का 73 साल की उम्र में, 17 अगस्त 2007 को निधन हो गया। बिहार की राज्य सरकार के द्वारा उनका अंतिम संस्कार किया गया मांझी ‘माउंटेन मैन’ (Mountain Man) के रूप में विख्यात हैं। उनकी इस उपलब्धि के लिए बिहार सरकार ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्म श्री हेतु उनके नाम का प्रस्ताव रखा। मार्च 2014 में प्रसारित टीवी शो सत्यमेव जयते का सीजन 2 जिसकी मेजबानी आमिर खान ने की, उनका पहला एपिसोड दशरथ मांझी को समर्पित किया गया।
सम्मान :
मांझी 'माउंटेन मैन' के रूप में विख्यात हैं। उनकी इस उपलब्धि के लिए बिहार सरकार ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्म श्री हेतु उनके नाम का प्रस्ताव रखा। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दशरथ मांझी के नाम पर रखा गहलौर से 3 किमी पक्की सड़क का और गहलौर गांव में उनके नाम पर एक अस्पताल के निर्माण का प्रस्ताव रखा है।
दशरथ मांझी का वक्तव्य :
अपने बुलंद हौसलों और खुद को जो कुछ आता था, उसी के दम पर मैं मेहनत करता रहा. संघर्ष के दिनों में मेरी मां कहा करती थीं कि 12 साल में तो घूरे के भी दिन फिर जाते हैं. उनका यही मंत्र था कि अपनी धुन में लगे रहो. बस, मैंने भी यही मंत्र जीवन में बांध रखा था कि अपना काम करते रहो, चीजें मिलें, न मिलें इसकी परवाह मत करो. हर रात के बाद दिन तो आता ही है.
सकारात्मक दृष्टिकोण
हिंदी मेरी पहचान मैं आपका स्वगत करती हूँ। आज यह मे एक ऐसी कहानी के बारे में बता रही हूँ , जिसमे एक आम अपने अंतिम क्षण में ये सोचता है कि ना तो में किसी के काम आ पाया ओर न ही में खुद को प्रकर्ति के नियमों से खुद को बच सका ,ओर जब मेरे जाने का समय आ गया तो मैंने आज चाहकर भी किसी के काम नही आ सकता ।
यह उस आम का एक अभिमान ही उसका सबसे बड़ा परेशानी का कारण । दोस्तों आज हम अभियान को तयाग कर किसी के काम आए ऐसी प्रेरणा लेते है जो उस आम ने ये अंतिम क्षण मैं सोचा।
एक गांव था जिसमे एक किसान का बहुत बड़ा आमौ (फल) का बाग था। उस बाग में बहुत आम के पेड़ लगे हुए थे। किसान आम के बाग मै अपना पूरा समय वयित करता था। ओर हर साल मई - जून के महीने का बेसर्वी से इन्त्जार करता था। हर साल की तरह एक साल आयी किसान को अपने आम की पेड़ से तोड़कर उसे बाज़ार मैं बेचने के लिए ले जाना था। किसान आमों को बेचकर अपना गुजर भरता करता था। जब मई के महीना आया तो किसान पेड़ से आम तोड़ने लगा कुछ आम अपने आप टूट कर गिरने लगे और कुछ किसान ने तोड़े तो आसानी से टूट गए । पर उन्हीं मैं से एक आम था जो अपने अभिमान मैं था मैं खुद को कैसे भी नही टूटने दूँगा। उसने हर वो प्रयास किया ओर अपने आप को पेड़ के पातों से खुद को इस तरह ढक लिया की वो किसान को नज़र नही आया । धीरे धीरे सारे आम टूट कर चले गए कोई बाजार मैं बिक गया तो कोई किसान के घर में काम आ गया । अब बचा एक आम अपने आप मे इतना प्रसन्ता कर रहा और सोच रहा , किसान कैसे भी मुझे नही तोड़ पाया ओर प्रकर्ति भी मेरा कुछ नही बिगाड़ पायी ।
एक गांव था जिसमे एक किसान का बहुत बड़ा आमौ (फल) का बाग था। उस बाग में बहुत आम के पेड़ लगे हुए थे। किसान आम के बाग मै अपना पूरा समय वयित करता था। ओर हर साल मई - जून के महीने का बेसर्वी से इन्त्जार करता था। हर साल की तरह एक साल आयी किसान को अपने आम की पेड़ से तोड़कर उसे बाज़ार मैं बेचने के लिए ले जाना था। किसान आमों को बेचकर अपना गुजर भरता करता था। जब मई के महीना आया तो किसान पेड़ से आम तोड़ने लगा कुछ आम अपने आप टूट कर गिरने लगे और कुछ किसान ने तोड़े तो आसानी से टूट गए । पर उन्हीं मैं से एक आम था जो अपने अभिमान मैं था मैं खुद को कैसे भी नही टूटने दूँगा। उसने हर वो प्रयास किया ओर अपने आप को पेड़ के पातों से खुद को इस तरह ढक लिया की वो किसान को नज़र नही आया । धीरे धीरे सारे आम टूट कर चले गए कोई बाजार मैं बिक गया तो कोई किसान के घर में काम आ गया । अब बचा एक आम अपने आप मे इतना प्रसन्ता कर रहा और सोच रहा , किसान कैसे भी मुझे नही तोड़ पाया ओर प्रकर्ति भी मेरा कुछ नही बिगाड़ पायी ।
धीरे धीरे समय व्यतीत होने लगा आम अकेला पेड़ पर राजा की तरह रह रहा था। जैसे ही जून के महीना आया तेज धूप और तेज गरम हवा आम को परेशान करने लागी ओर आम जलाने लगा। आम ने सोचा क्यू ना अपने आप को ओर पतियों से ढक लू ओर इसने खुद को ढक लिया । फिर जैसे ही सावन (अगस्त) का महीना शुरू हुआ और बारिश शुरू हुई आब आम घबराने लगा । बिजली कड़कने लगी और अब आम राम राम कहता हुआ हुआ डरते डरते रहेने लगा ।
एक दिन रात में घनघोर बारिश तूफ़ान ,आधी के साथ बहुत तेज ओले के साथ शुरू हुई और तेज तेज आम पर पड़ने लगे एक दो ओले बर्दाश्त करते हुए आम बहुत तेज गिर गया और अब सोचने लगा अब मुझें कोई नही बचा सकता
आम जब बारिश मै भीगता रहा और धीरे धीरे धरती पर पड़े पड़े सडने लगा अब आम सोचता है मैन खुद को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया मै खुद को बचा भी ना पाया । मैं कितना मूर्ख था कि मैं जब संसार मे आया था तो मुझे इसे तयाग कर जाना भी तो जाना था लेकिन मेरे अभिमान ने मुझे अपने से दूर कर दिया और मैं संसार के नियमों को भूल कर जीने लगा । ओर आज जब मुझे संसार को छोड़ कर जाना है तो मैंने हर संम्भव प्रयास के बाद भी खुद को किसी अच्छे काम मैं शामिल नही कर सकता ।
अखरी वक्त पर मैं(आम) ये ही कहूंगा दोस्तों जितना कीसी के काम आ पाओ आना चाहिए जब संसार से आप जाते जो आपका ये मृत शरीर ही जाता है और जय जय कार होती है उन्हें कर्मों की जो कि है इस तन से। अभियान त्याग कर आओ किसी के काम।
ज्यादा बोझ लेकर चलने वाले
अक्सर डूब जाते हैं!
फिर चाहे वह अभिमान का हो
या सामान का हो!
ब्रह्म कुमारी शिवानी जी
साल का पहला सूर्य ग्रहण : 2018
15 फरवरी को सूर्य ग्रहण पड रहा है। वर्ष 2018 में कुल
पांच ग्रहण लग रहे है : 3 सूर्य ग्रहण और 2 चन्द्र ग्रहण।ये साल का 2018 का पहला सूर्य ग्रहण है इसके बाद दूसरा सूर्य ग्रहण 13 जुलाई 2018 और तीसरा 11अगस्तल 2018 को पड़ेगा ।
हिन्दू मान्यता ओर ज्योतिषों के अनुसार ग्रहण समय मैं भगवान पर कष्ट पड़ता है लेकिन विज्ञान के अनुसार ये एक खगोलीय घटना हैं जिसमें पृथ्वी, सूर्य ओर चंद्रमा अपनी स्थति से हटकर एक सीध मैं आ जाते हैं।
इस ग्रहण को देखने के लिए लोगों मैं उत्सुकता बनी रही है । सूर्य ग्रहण को देखने के लिए सोलर व्यूइंग ग्लासेस या पर्सनल सोलर का इस्तेमाल करते है वहीं ज्योतिषी के अनुसार ग्रहण
को देखना अशुभ माना जाता है । ग्रहण के समय मंदिरों को भी नही खुला रखा जाता है।
जानते है आखिर ग्रहण क्या है ?
ऐसा क्या कारण है जिसके चलते ग्रहण को देखना अशुभ माना जाता हैं। जाने यह पौराणिक कथा कि वो काहनी जिस वजह से इंसान को ही नहीं भगवान को भी ग्रहण नहीं दिखया जाता।
ग्रहण का समय?
यह ग्रहण 15 फरवरी (गुरुवार) की रात 12.25 मिनट से शुरू होकर 16 फरवरी सुबह 4.18 तक रहेगा. हालांकि सूतक काल ग्रहण के लगभग 12 घंटे पहले यानी 15 फरवरी सुबह 11.35 पर शुरू हो जाएगा. सूर्यग्रहण अमावस्या के दिन होता है. जबकि चंद्रग्रहण हमेशा पूर्णिमा के दिन पड़ता है. आगे जानें कहां होगा इस ग्रहण का दीदार.
कहां दिखेगा सूर्यग्रहण?
भारतीय समय के अनुसार यह सूर्यग्रहण रात के समय है, इसी वजह यह भारत में नहीं दिखाई देगा. यह दक्षिण अमेरिका, अंटार्कटिका, उरुग्वे और ब्राजील जैसे देशों में देखा जाएगा. अंटार्कटिका में यह अधिक देखा जाएगा.
क्या कहती है पौराणिक कथा :
पौराणिक कथा के अनुसार मत्स्य पुराण में सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण की कथा का संबंध राहु-केतु और उनके अमृत पाने की कथा से है। कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने मोहनी कन्या का रूप धारण कर देवताओं को अमृत और असुरों को वारुणी (एक प्रकार की शराब) बांट रहे थे तब एक दैत्य स्वरभानु रूप बदलकर देवताओं के बीच जा बैठा। वह सूर्य और चन्द्रमा के बीच बैठा था। जैसे ही वह अमृत पीने लगा सूर्य और चन्द्रमा ने उसे पहचान लिया और तत्काल विष्णु जी को बता दिया।
विष्णु जी ने तत्काल उस राक्षस का अपने सुदर्शन चक्र से सर धण से अलग कर दिया। राक्षस का सर राहु कहलाया और धण केतू। कहा जाता है कि जैसे राहु का सर अलग हुआ वह चन्द्रमा और सूर्य को लीलने के लिए दौड़ने लगा लेकिन विष्णुजी ने ऐसा नहीं होने दिया। उस दिन से माना जाता है कि जब भी सूर्य और चन्द्रमा निकट आते हैं तब उन्हें ग्रहण लग जाता है।
क्या कहता हैं विज्ञान ?
विज्ञान के अनुसार ये एक खगोलीय घटना हैं जिसमें पृथ्वी, सूर्य ओर चंद्रमा अपनी स्थति से हटकर एक सीध मैं आ जाते हैं। इससे चांद सूर्य की उपछाया से होकर गुजरता हैं , जिस वजह से उसकी रोशनी फिकी पड जाती हैं।
क्या होता हैं सूर्य ग्रहण ?
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमने के साथ साथ अपने सौरमंडल के चारों ओर चक्कर लगाती हैं। दूसरी ओर चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है ओर उसके चक्कर लगता इसलिए जब चंद्रमा चक्कर लगते लगते सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है तब पृथ्वी ओर सूर्य आंशिक या पूर्ण रूप से दिखना बंद हो जाता है इसी घटना को सूर्य ग्रहण कहते है ।
सूर्य ग्रहण के समय क्या न करें :
. घर में रखे अनाज या खाने को ग्रहण से बचाने के लिए दूर्वा या तुलसी के पत्ते का प्रयोग करना चाहिए।
. ग्रहण समाप्त होने के बाद तुरंत स्नान कर लेना चाहिए। इसके साथ ही ब्राह्मण को अनाज या रुपया दान में देना चाहिए।
. ग्रहण के समय भोजन नहीं करना चाहिए।
.मान्यता है कि गर्भवती स्त्री को ग्रहण नहीं देखना चाहिए।
.भगवान शिव को छोड़ अन्य सभी देवताओं के मंदिर ग्रहण काल में बंद कर दिए जाते हैं।
वैवाहिक निमंत्रण पत्र ७० के दशक से
आयुष्मती रीमा
आत्मजा श्री बाबू जी
निवासी (ग्राम पसेना)
जिला आगरा
एवं
चि राजेश
आत्मज श्री रामराज जी
निवासी (खेडिया)
जिला इटावा
* पाणिग्रहण अवसर पर वर पक्ष की सेवा मे सादर समर्पित *
*स्वागत पत्र *
चलती पवन आज मन्थर गति से ।
फूलों के योवन को जाकर हिलाता।।
करने को स्वागत हो फूलों को लेकर।
राजेश के चरणो को चढ़ाता।।
आज हमारा ग्राम पसेना फूला नही समाता हैं।
खेडिया के गौरव को अपना शीश झुकाता हैं।।
दरवाजे पर जीवन निधि तुम आये क्या सम्मान करू।
उपहार तुम्हीं से मैंने पाया क्या मै अब उपहार करू।।
कैसा मधुमय आज दिवस है कितनी सुंदर बेला है।
दो हर्दय का मिलन देखने दो परिवारो का मेला है।।
भगवत की उस अनुकम्पा से सदा वसंत बहार रहे ।
राजेश अरू रीमा के प्यार का बजता तार रहे।।
नही जानता स्वगत आगत फिर भी स्वगत गान करू।
दरवाजे आये हो तो कम से कम कुछ दान करु।।
अपने घर की एक वस्तु मैं सविनय तुमको देता हू।
अपने घर की उसी वस्तु का परिचय तुमको देता हू।।
प्यार भरा संसार प्रभु मैं आज पदों पर धारत हू।
अरमानों की दुनिया को मैं आज समर्पित करता हू।।
धरी धरोहर अब तक घर में मैं था केवल रखवाला।
लीजे अपनी आज धरोहर लीजिए अपनी जय माला ।
* जन्म काल *
तेरी जन्म समय पर बेटी नही किसी जा मान किया।
पंडित लौटे बँधी पत्तरी नहीं किसी को दान दिया।।
बाजे ना बजवाये घर पर ढोलक की ना गुमक हुई।
नाच रंग ना बजीं बधाई जगे दीप ना चमक हुयी ।।
आज देख ले बेटी घर पर खुशियों के बादल छाये।
ओर देखले दो दो पंडित लिये पत्तरी घर आये ।।
आज पिता ने दरवाजे पर कितनों का सम्मान किया।
दोनो कर से पग धो कर तन मन धन का दान किया।
* शिक्षा बेटी को *
तू जाती है तो जा बेटी पर ,अंतिम शिक्षा लेती जा ।
मात पिता की ये अभिलाषा अंतिम दिशा लेती जा ।।
सास ससुर की सेवा निश दिन हँसी खुशी से तू करना।
जीवन का अधार समभक्त कर पती देव को खुश करना।।
चाचा चाची की अपने कुल की अविचल जग मै धाक रहे।
देखो विप्रवंश की बेटी जग मैं ऊँची नाक रहे ।।
मोद प्रमोद खिलौना मेरा मानवता का सार यही।
कर्मों का प्रतिकार यही है जीवन का इतिहास यही।।
* प्रार्थना वर परिवार से *
घर से बाहर न निकली हैं संग तुम्हारे जाएगी।
दीना दो दीना इसको रोटी ससुरे की ना भाएगी।।
याद करेगी अपने घर की सोवेगी ना जागेगी।
घुँघट मैं ही हिचकी ले ले डरती डरती रोवेगी।।
पूछोगे क्यों रोती है क्या अपने घर तू जायेगी ।
ना मैं रोती ना मैं घर जाउ सत्य नही बतलायेगी ।
सास ससुर की आहट पाकर ,बरबस आंसू रोकेगी।
नाम श्याम सुने जब सोते मैं यह चौंकेगी।।
क्रोधित होगें यदि तुम प्रिय वर मोती गिरकर बरसेंगे।
भिड़कोगे तो इन नैनो से सावन भादों बरसेंगे।।
सदा सांत्वना देते रहना ,तुम्हे मोल न देता हूं ।
सूता रीमा का हाथ पकड़कर हाथ हाथ मैं देता हूँ।।
हाथ पकड़ कर दिया हाथ मैं इसके जिम्मेदार हुऐ।
इसकी जीवन नैय्या के ,तुम पूरे ठेकेदार हुए।।
संसार मैं अब 'राम ' बनेंगे उनमें इनकी गिनती है।
यह सुंदर जोड़ी अमर रहे गोपीकृष्ण हमारी विनती है।।
*अनुराग दीप *
अनुराग भरे इस दीपक को,
निज अचल अडंक छिपाते चलो।
तुम आगे चलो हम पीछे चले ,
पद धूली तुम्हारी उठाते चलें ।।
तुम क्रोध करो हम मोन रहे ,
तुम रूठो तो नाथ मानते चले ।।
तुम पोंछते हाथों से अंशू चलो,
हम पीछे से अंशू बहते चले।।
* कन्या को आशीर्वाद *
चाह यहि त्रषि नारद की ।
तबलों कर वीणा बजाते रहें।।
जबलों जग के तम नाशन को ।
रवि अरु अशि ज्योती जागते रहे।।
जबलों राम धरातल के ।
सहसासन भार उठाते रहे।।
तबलों प्रिय शिवाला के भाल पै ।
सुहग के चिन्ह लखाते ।।
फूलों के योवन को जाकर हिलाता।।
करने को स्वागत हो फूलों को लेकर।
राजेश के चरणो को चढ़ाता।।
आज हमारा ग्राम पसेना फूला नही समाता हैं।
खेडिया के गौरव को अपना शीश झुकाता हैं।।
दरवाजे पर जीवन निधि तुम आये क्या सम्मान करू।
उपहार तुम्हीं से मैंने पाया क्या मै अब उपहार करू।।
कैसा मधुमय आज दिवस है कितनी सुंदर बेला है।
दो हर्दय का मिलन देखने दो परिवारो का मेला है।।
भगवत की उस अनुकम्पा से सदा वसंत बहार रहे ।
राजेश अरू रीमा के प्यार का बजता तार रहे।।
नही जानता स्वगत आगत फिर भी स्वगत गान करू।
दरवाजे आये हो तो कम से कम कुछ दान करु।।
अपने घर की एक वस्तु मैं सविनय तुमको देता हू।
अपने घर की उसी वस्तु का परिचय तुमको देता हू।।
प्यार भरा संसार प्रभु मैं आज पदों पर धारत हू।
अरमानों की दुनिया को मैं आज समर्पित करता हू।।
धरी धरोहर अब तक घर में मैं था केवल रखवाला।
लीजे अपनी आज धरोहर लीजिए अपनी जय माला ।
* जन्म काल *
तेरी जन्म समय पर बेटी नही किसी जा मान किया।
पंडित लौटे बँधी पत्तरी नहीं किसी को दान दिया।।
बाजे ना बजवाये घर पर ढोलक की ना गुमक हुई।
नाच रंग ना बजीं बधाई जगे दीप ना चमक हुयी ।।
आज देख ले बेटी घर पर खुशियों के बादल छाये।
ओर देखले दो दो पंडित लिये पत्तरी घर आये ।।
आज पिता ने दरवाजे पर कितनों का सम्मान किया।
दोनो कर से पग धो कर तन मन धन का दान किया।
* शिक्षा बेटी को *
तू जाती है तो जा बेटी पर ,अंतिम शिक्षा लेती जा ।
मात पिता की ये अभिलाषा अंतिम दिशा लेती जा ।।
सास ससुर की सेवा निश दिन हँसी खुशी से तू करना।
जीवन का अधार समभक्त कर पती देव को खुश करना।।
चाचा चाची की अपने कुल की अविचल जग मै धाक रहे।
देखो विप्रवंश की बेटी जग मैं ऊँची नाक रहे ।।
मोद प्रमोद खिलौना मेरा मानवता का सार यही।
कर्मों का प्रतिकार यही है जीवन का इतिहास यही।।
* प्रार्थना वर परिवार से *
घर से बाहर न निकली हैं संग तुम्हारे जाएगी।
दीना दो दीना इसको रोटी ससुरे की ना भाएगी।।
याद करेगी अपने घर की सोवेगी ना जागेगी।
घुँघट मैं ही हिचकी ले ले डरती डरती रोवेगी।।
पूछोगे क्यों रोती है क्या अपने घर तू जायेगी ।
ना मैं रोती ना मैं घर जाउ सत्य नही बतलायेगी ।
सास ससुर की आहट पाकर ,बरबस आंसू रोकेगी।
नाम श्याम सुने जब सोते मैं यह चौंकेगी।।
क्रोधित होगें यदि तुम प्रिय वर मोती गिरकर बरसेंगे।
भिड़कोगे तो इन नैनो से सावन भादों बरसेंगे।।
सदा सांत्वना देते रहना ,तुम्हे मोल न देता हूं ।
सूता रीमा का हाथ पकड़कर हाथ हाथ मैं देता हूँ।।
हाथ पकड़ कर दिया हाथ मैं इसके जिम्मेदार हुऐ।
इसकी जीवन नैय्या के ,तुम पूरे ठेकेदार हुए।।
संसार मैं अब 'राम ' बनेंगे उनमें इनकी गिनती है।
यह सुंदर जोड़ी अमर रहे गोपीकृष्ण हमारी विनती है।।
*अनुराग दीप *
अनुराग भरे इस दीपक को,
निज अचल अडंक छिपाते चलो।
तुम आगे चलो हम पीछे चले ,
पद धूली तुम्हारी उठाते चलें ।।
तुम क्रोध करो हम मोन रहे ,
तुम रूठो तो नाथ मानते चले ।।
तुम पोंछते हाथों से अंशू चलो,
हम पीछे से अंशू बहते चले।।
* कन्या को आशीर्वाद *
चाह यहि त्रषि नारद की ।
तबलों कर वीणा बजाते रहें।।
जबलों जग के तम नाशन को ।
रवि अरु अशि ज्योती जागते रहे।।
जबलों राम धरातल के ।
सहसासन भार उठाते रहे।।
तबलों प्रिय शिवाला के भाल पै ।
सुहग के चिन्ह लखाते ।।
माँ सीमा से तार आया है
हिंदी मेरी पहचान मैं आप सभी का स्वागत करती हुँ। यहां में ऐसे परिवार की पीड़ा को अभिव्यक्त करना चाहती हुँ जिसके घर का एक बेटा सेना मैं सेवा देते हुए कैसे शहीद हो गया। ये उस समय की बात है जब घरों मैं टेलीविजन, मोबाइल, ओर इंटरनेट की सुविधा नहीं थी।
शहीद अपनी अपनी पत्नि को एक खत (चिठ्ठी) लिखता है और सीमा पर दुश्मन के आने के कारण घर आने मैं देरी हो जाएगी ऐसा लिखता है। जैसे ही ये खत घर पहुँचता हैं। डाक बाबू - आवाज लागते हुए चिठ्ठी - चिठ्ठीआयी तभी शहीद की बेटी जो खेल रही होती है , भाग कर आ कर वो चिठ्ठीले लेती है। उसके बाद वो बच्ची अपनी माँ को आवाज देती है "माँ सीमा से तार आया है ", ये सुन उस बच्ची की माँ भागती हुई आती है और उस चिठ्ठी को ले कर चूमने लगती है ,और खुशी से झूमती हुई अपने कमरे मैं जा कर उसको खोलती है।
चिठ्ठी की खुशी उसे इतनी होती है की जिसे कहने मैं शब्द नही होते। थोड़ी मायूस हो जाती पति के घर देरी से आने पर चिठ्ठी आने की वो खुशी कम नही होती।
अचानक दो दिन बाद फिर एक खत सीमा से आता है ,जिसे खुद शहीद की पत्नी खुद डाक बाबू- से लेती है पर ये खत लेते हुई उसे कुछ अनहोनी का अहसास हो जाता है । ये खत जिसको पढ़कर वो वही आँगन मूर्छित हो गिर जाती है।
इस स्थिति को लेकर अपने विचारों को कविता के माध्यम से देश के वीर जवानों को देश के सभी नागरिकों की तरफ समर्पित -
जाने कैसी पीड़ा अंदर से निकल रही
मैं कैसे गाउ गीत देश की सीमा शोले उगल रही||
जिसको दोस्त समझ कर मेरा ,मन था ईद मनाने का
उसका काला मन था मेरी दिवाली के दिये बूक्षाने को
हो कर के तैयार खडा तेज़ाब भारी पिचकारी मैं
आग लगना चाही उसने मेरी हरि भारी फुलवारी मैं
केसर की क्यारी से दहशत की ज़वाल निकल रही ||
मैं कैसे गाउ गीत देश की सीमा शोले उगल रही
आग जहाँ भी लगे पक्ष दोनो ही सुलगते हैं
ऐसे मसले जितने भी प्यार से ही सुलझते है
नही खड़ी कोई छत अब तक नफरत की दीवारों पर
फिर दुश्मन गौर नही करता अपनी पिछली हारो पर
गरम खून के मारे मेरी धमनियाँ उबल रही
मैं कैसे गउ गीत देश की सीमा शोले उगल रही||
कल ही चिट्ठी आयी थी मैन जल्द न आ पाउँगा
दुशमन सीमा पर बैठा है मैं पहले उसे भगाउगा
सोना अभी छोटा हैं तु प्यार से समझा लेना
मुनि के कपडे बाज़ार से ओर मां को साड़ी ले आना||
श्याम भइया से कहना अबकी प्रथम (कक्षा) जो आएगा
उसका ये भईया उसे घडी जरूर दिलाएगा
छोटी बेहना से कहना राखी पर जो आएगी
अपने भैया के घर से झोली भर ले जाएगी
मुखिया ताऊ से चलते मैं ,वक़्त नही मिल पाया था
पूज्य पिता के चरण छू मैं जल्दी आया था
क्षमा माँगता उन्हें सभी से अंत मैं तुमको प्यार मेरा
इन्हीं तुम्हारी आँखों मैं सपनो का संसार मेरा||
दो दिन बीत न सके एक तार आ गया सीमा से
लड़ते हुए शहीद हो गया बिछड गया बेटा मां से
जब क्षत विक्षत अर्थी हाहाकार मचा था घर में
हृदयँ विराकर करदन था उस बूढ़ी सी माँ के स्वर मैं
धीरज धरा पलट कर देखा घाव सभी थे छती पर
दीपक बूक्ष तो गया चमक अभी भी बाती पर||
जीन हाथों ने घुघट खोला ,वो हाथ उसे कटे मिले
जीन अधरों ने मुख को चूमा ,वो भी उसे कटे मिले
क्या कसूर था उस दुल्हन का जो जीवन से बिछड़ गयी
मेहदी फिकी पड़ी नही की वो प्रीतम से बिछड़ गयी||
धू धू जलती चिता देख नयन हजारों झलक पड़े
धारती रोयी अम्बर रोया ओर सितारे बिलख पडे
पर आँच नही आने दी कश्मीर की कश्मीर की पयारी घाटि को
न जाने मतभूमी पर मर मिटने को कितनी ज़वानी मचल रही
मैं कैसे गाउ गीत देश की सीमा शोले उगल रही||
||जय हिन्द जय जवान जय किसान जय विज्ञान||
बंसी वाले की बंसी
श्रीकृष्ण भगवान विष्णु अवतारी पूर्ण पुरुष हैं। श्रीकृष्ण के साथ स्वर या अथवा ध्वनि का पूर्ण अवतार उनके वेणु (बंसी) रूप में हुआ। श्रीकृष्ण की बंसी के मधुर स्वर की ध्वनि ने ब्रज में जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कर दिया। इस बंसी की ध्वनि ने न केवल मनुष्यों को, बल्कि अपितु ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी प्रभावित किया।
बंसी को बांसुरी, मुरली और संस्कृत में वेणु भी कहते हैं। ‘व’ अर्थात ब्रह्म, ‘इ’ अर्थात सुख तथा ‘णु’ अर्थात् अणु, अर्थात जिसके स्वर के सम्मुख ब्रह्मसुख भी तुच्छ प्रतीत हो, वह है वेणु।
श्रीकृष्णा को बंसी किसने दी ?
कृष्णा से जुड़ी बंसी के पीछे अलग अलग कथाये है जिनमे से एक कथा भगवान शिव से जुड़ी है ।
भगवान शिव ने कृष्णा को बंसी दी :
जब कृष्णा ने द्वापर युग में जन्म लिया तभी सभी देवी देवता उनसे मिलने गोकुल आने लगे तभी भगवान शिव सबसे बाद मैं भेष बदलकर कृष्णा से मिलने आये क्योंकि उन्हें बाल कृष्णा को भेंट रूप में कुछ ऐसा देना था । जिसे प्रभु कृष्णा अपने बाल अवस्था से अपने उम्र तक उसे अपने साथ रखे ।
शिव जी के पास दधीचि त्रषि की एक मात्र महाशक्तिशाली हड्डी पडी थी। दधीचि त्रषि वही थे जिन्होंने धर्म के लिए अपने शरीर की सारी हड्डीया दान कर दी थी । शिव जी ने इसी हड्डी के टुकड़े को घिस कर मनोहर बंसी बनाई । जब शिवजी कृष्ण से मिलने गोकुल पहुँचे तब उन्होंने कृष्ण के बाल स्वरुप के दर्शन कर उन्हें बंसी भेंट की ।
श्रीकृष्णा को बंसी इतनी प्रिय क्यों है?
श्रीकृष्णा और बंसी की इतनी अंतरंगता है कि कृष्णा के नाम के साथ बंसी का नाम जुड़ा है। ठीक इसी प्रकार कृष्णा का भी नाम बंसी से जुड़ जाता है , वहां वंशीधर हैं, जहां मुरली है वहां मुरलीमनोहर, मुरलीधर हैं, यह बंसी उनकी सखी (परिचारिका) है । वे इससे एक क्षण भी दूर नहीं होते हैं। कृष्णा भगवान शिव के द्वारा मिली बंसी को उनका आशीर्वाद की तरह हमेशा साथ रखते है
श्रीमद्भागवत के अनुसार, वृन्दावन निवास में श्रीकृष्ण कभी बंसी से अलग नहीं हुए। गौचारण के समय या वन भोजन के समय में भी बंसी या तो उनके अधरों पर रही या उनके कमरबंध में रहती थी।
गोपियों को बंसी से इर्ष्या :
गोपियों को आश्चर्य हुआ कि इस बंसी ने कौन-सा उपवास किया है कि बाँस की होकर भी श्रीकृष्ण के अधरसुधारस का पान स्वयं ही कर रही है , हमारे लिये कुछ भी नहीं बचेगा। यह सौत जैसा व्यवहार कर रही है। गोपियों को बंसी से ईष्या होने लगी। एक दिन सभी व्रजवासी बंसी के पास गए ।
गोपियां कहती हैं– बंसी एक बात बताओ तुम बाँस की हो और तुम से अत्यधिक हम कृष्ण को प्रेम करते है तब भी कृष्णा हमे छोड़ कर हमेशा तुम्हे अपने साथ क्यों रखते है ।और तो ओर तुम कृष्णा के अधरों (होठ) की शय्या पर लेटकर हमारे श्यामसुंदर से अपने पैर पलोटवाती है। तुम एक सोत की तरह हमारे कृष्ण के साथ रहती हो ।
||अब कान्ह भये बस बाँसुरिके, अब कौन सखि! हमकों चहिहैं||
||वह रात दिना सँग लागी रहै, यह सौत को शासन को सहिहै||
||जिन मोह लियौ मन मोहनकौ, रसखानि सु क्यों न हमें दहिहै||
||मिलि आओ सबै कहुँ भाजि चलें, अब तो ब्रज में बँसुरी रहिहै||
गोपियां कहती हैं – यह बंसी बहुत ठगनी है, पर एक उपाय है, ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी –
||करिये उपाय बाँस डारिए कटाय, नाही उपजैगो बाँस नाहि बाजेगी बासुँरी||
गोपियाँ यहां तक कहतीं हैं कि बंसी का पूरा जीवन ही विरोधाभासी है। बंसी की मधुर तान सुनकर गोपियां सम्मोहित हो जाती हैं और घर के सब काम छोड़कर श्रीकृष्ण से मिलने चली जाती हैं, जिससे उनके पति नाराज हो जाते हैं)। इसको वेधा गया (इसमें छेद किये गये) पर यह हमारे हृदय को बेधती रहती है। इसकी हरियाली सूख गयी है पर इसने हरि (कृष्ण) की यारी नहीं छोड़ी है।
गोपियां कृष्ण को धमकी देती हैं -
||हम ब्रज बसिहें तो बांसुरी बसे ना ब्रज||
||बांसुरी बसावों तो कान्ह हमें विदा कीजिये||
ये सब देख कर जब बंसी ने कहा - सुनो गोपियो
गोपियो! तुम हमारी तपस्या को नहीं समझती। मैंने क्या क्या नही सहा है। मैं कठोर कुठार से काटी गयी, मैं तन से अलग हुई ,फिर मन से अलग हुयी ओर तो ओर मैरे परिवार से अलग किया , मुझ मैं एक नही , दो नही सात-आठ छिद्र किये गये। मैं एक पोली बांस हूँ, अन्दर कोई भी गांठ नहीं है। मेरे से जो राग रागिनी का मधुर स्वर निकलता है, वह सब भगवान के मुख से स्फुरित होकर निकलता है।
उनकी प्रेरणा के बिना मैं शुष्क बांस की जड़ नली हूँ। मैं पूर्णत: अहंशून्य हूँ इसीलिए श्रीकृष्ण का मुझपर अभेद प्रेम है।जैसे कृष्णा मुझसे बजाना चाहते है मैं वैसे ही बजती हु जैसे कृष्णा मुझे जेसे रखना चहाते है मैन वेसे ही रहती हूं ।
मुझे मैं (बंसी) और तुममे (गोपियो) फर्क सिर्फ इतना हैं कि तुम कृष्णा को रखना चाहती हो और कृष्णा मुझसे रखना चाहते है यह था बंसी का समर्पण।
||तप हम बहुत भाँति करयो||
||हेम बरिखा सही सिर पर घाम तनहिं जरयो||
||काटि बेधी सप्त सुरसों हियो छूछो करयो||
||तुमहि बेगि बुलायबे को लाल अधरन धरयो||
||इतने तप मैं किये तबही लाल गिरधर बरयो||
||सूर श्रीगोपाल सेवत सकल कारज सरयो||
बंसी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को किसी के ,साथ रहना है तो उसे अपने तन, धन ,और मन सबसे उसको समर्पित कर देना चाहिए । जैसे वो रखना चाहते है वेसे बन जाना चाहिए ।वंसी ने सब छोड़कर श्रीकृष्ण के रंग मै खुद रंग लिया ।
Kalpana Chawla
Kalpana Chawla
(March 17, 1962 – February 1, 2003)
First Indian Women In Space - Kalpana Chawala
कल्पना ने भी की थी कभी कल्पना
सच हुआ उसका सपना
ऊँचे थे तेरे इरादे ,अम्बर से ऊँची उडाने थी
इतनी ऊँची भी कहाँ खो गयी तुझे तो ,
ये धरा भी सजानी थी !!👍
1 जुलाई, 1961 को भारत के करनाल में जन्मे, चावला चार बच्चों में सबसे छोटी थी। कल्पना का अर्थ "विचार" या "कल्पना" होता है। उसको सभी मित्र और परिवारीजन के. सी. के नाम से पुकारते थे.
कल्पना चावला ने अमेरिका में जाने से पहले 1980 पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से वैज्ञानिक इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। उन्होंने 1988 में कोलोराडो विश्वविद्यालय से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट की उपाधि (PHD) अर्जित की, टेक्सास विश्वविद्यालय से परास्नातक की डिग्री करते समय ही उन्होंने नासा के एम्स रिसर्च सेंटर में काम करना शुरू कर दिया.
1994 में, कल्पना चावला को पहली बार अंतरिक्ष यात्री उम्मीदवार के रूप में चुना गया था। प्रशिक्षण के एक वर्ष के बाद, वह अंतरिक्ष यात्री कार्यालय रोबोटिक्स और कम्प्यूटर शाखाओं के लिए एक दल की प्रतिनिधि चुनी गयीं, जहां उन्होंने रोबोट जागरूकता डिस्प्ले के साथ काम किया और अंतरिक्ष शटल के लिए सॉफ्टवेयर का परीक्षण किया।
कल्पना चावला के लिए अंतरिक्ष में उड़ान भरने का पहला मौका नवंबर 1997 में अंतरिक्ष यान कोलंबिया एसटीएस -87 पर आया था। यान ने सिर्फ दो हफ्तों में पृथ्वी के 252 कक्षाएं बनाई थी। शटल ने अपनी यात्रा पर कई प्रयोग किए और उपकरणों का निरीक्षण किया, जिसमें एक स्पार्टन उपग्रह शामिल था, जो चावला ने शटल से तैनात किया था।
कल्पना चावला के लिए अंतरिक्ष में उड़ान भरने का पहला मौका नवंबर 2000 में अंतरिक्ष यान कोलंबिया एसटीएस -107 पर आया था। मिशन में कई बार देरी हुई थी, और आखिर में 2003 मिशन शुरू हुआ। 16 दिवसीय उड़ान के दौरान, चालक दल ने 80 से अधिक प्रयोग पूरा किए।१ फरवरी 2003 की सुबह अंतरिक्ष से वापस आते समय और प्रथ्वी पर पहुँचने के १६ मिनट पहले ही यान में एक विस्फोट हुआ और उसमे सवार सभी सात यात्री सदा सदा के लिए अंतरिक्ष वासी हो गए.
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