लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की एक घटना
देश के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अपने कार्यकाल के दौरान देश को कई संकटों से उबारा. साफ-सुथरी छवि के कारण ही विपक्षी पार्टियां भी उन्हें आदर और सम्मान देती है. जानिए उनके बारे में कुछ ऐसी बातें जिसे आप अभी तक नहीं जानते होंगे।
2 अक्टूबर को शास्त्री जी की 114वीं जयंती है। उनका जन्म यूपी के चंदौली जिले के मुगलसराय में हुआ। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण लोग प्यार से 'नन्हे' कहकर ही बुलाया करते थे। जब ये 18 महीने के हुए तब उनके पिता का निधन हो गया। इनकी मां रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर चली गईं। ननिहाल में रहते हुए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। वे नदी तैरकर स्कूल जाते थे।
आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें वाराणसी में चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया। उनके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। देश के सर्वाधिक सम्मानित नेताओं में देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का नाम भी बहुत आदर से लिया जाता है। वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। आइये जानते हैं शास्त्री जी के जीवन से जुड़ी एक घटना।
शास्त्री जी ने जिम्मेदारी के चलते माँ से छुपाई अपनी पहचान :
एक बार की बात है शास्त्री जी रेलवे के एक कार्यक्रम में आये हुए थे। तभी कुछ देर बाद उनकी माँ भी पूछते पूछते वहाँ पहुंच गई और कहने लगी मेरा बेटा यहाँ आया है। और वो रेलवे मैं काम करता है। वहाँ खड़े लोगों मैं से किसी ने उनसे पूछा क्या नाम है आपके बेटे का तो उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री बताया। यह सुन वहां खड़े सभी लोग अचंभित रह गए। ओर लोग बोलने लगे की वो ,झूठ बोल रही हैं।
शास्त्री जी की माँ बोलने लगी वो यहाँ आये है , और वो यही कही होंगे।
तभी वहां खड़े एक शख्स ने लाल बहादुर जी को दिखाते हुए पूछा वही आपके बेटे है - तभी उनकी माँ बोलने लगी , हाँ हाँ वो ही मेरा बेटा हैं। तब भी उस शख्स को विश्वास नहीं हुआ , उसने शास्त्री जी को इशारा करते हुए उनकी माँ की ओर दिखाया , पूछा क्या वो आपकी माँ हैं।
तभी लाल बहादुर शास्त्री जी उठ कर आये और उन्होंने अपनी पास वाली सीट पर अपनी माँ को बिठाया। कुछ समझ बाद उन्हें घर भेज दिया।माँ के जाने के पश्चात शास्त्री जी ने अपना भाषण शुरू ही किया था जब तक वहां आये एक पत्रकार ने शास्त्री जी से पूछा , अपने अपनी माता जी के आगे भी भाषण क्यों नहीं दिया ??
तब शास्त्री जी ने बताया मेरी माँ को ये नही पता मैं एक रेल मंत्री हूँ। मैंने आज तक अपनी माँ को ये बताया है कि मैं रेलवे मैं एक कर्मचारी हूँ। अगर उन्हें ये पता चल जाएगा कि मैं एक रेल मंत्री हूं , तो वो मुझसे सिफारिश लगाने लगेगी और में उन्हें मना भी नहीं कर पाऊंगा। मेरी माँ को एक अहंकार आ जायेगा। रिश्तों मैं भी दरारे आ जायेगी ।
मैं अपनी जिम्मेदारी के बीच, रिश्तों की दरार नहीं लाना चाहता। शास्त्री जी की यह बात सुनकर वहाँ आये हुये लोग सन्न रहे गए। कार्यक्रम तालियों की गूंज से झूम उठा।
आज भी ऐसे ईमानदार लोगों को याद किया जाता है।
भगवान विष्णु के अवतार हैं श्रीकृष्ण
भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप मे देवकी और वसुदेव के घर मे जन्म लिया था। उनका लालन पालन यशोदा और नंद ने किया था। इस अवतार का विस्तृत वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण मे मिलता है।
कृष्ण हिन्दू धर्म में विष्णु के अवतार हैं। हिन्दू श्रीकृष्ण को ईश्वर मानते हैं, और उन पर अपार श्रद्धा रखते हैं। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं।जब-जब इस पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम करते हैं। वैसे तो भगवान विष्णु ने अभी तक तेईस अवतारों को धारण किया। इन अवतारों में उनका सबसे महत्वपूर्ण अवतार श्रीकृष्ण का ही था।
यह अवतार उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में लिया था। वास्तविकता तो यह थी इस समय चारों ओर पापकृत्य हो रहे थे। धर्म नाम की कोई भी चीज नहीं रह गई थी। अतः धर्म को स्थापित करने के लिए श्रीकृष्ण अवतरित हुए थे।श्रीकृष्ण में इतने अमित गुण थे कि वे स्वयं उसे नहीं जानते थे, फिर अन्य की तो बात ही क्या है? समस्त देवताओं में श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जो इस पृथ्वी पर सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अवतरित हुए थे। उन्होंने जो भी कार्य किया उसे अपना महत्वपूर्ण कर्म समझा, अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि उनके अवतीर्ण होने का मात्र एक उद्देश्य था कि इस पृथ्वी को पापियों से मुक्त किया जाए। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने जो भी उचित समझा वही किया।
उन्होंने कर्मव्यवस्था को सर्वोपरि माना, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को कर्मज्ञान देते हुए उन्होंने गीता की रचना की जो कलिकाल में धर्म में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
कृष्ण हिन्दू धर्म में विष्णु के अवतार हैं। हिन्दू श्रीकृष्ण को ईश्वर मानते हैं, और उन पर अपार श्रद्धा रखते हैं। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं।जब-जब इस पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम करते हैं। वैसे तो भगवान विष्णु ने अभी तक तेईस अवतारों को धारण किया। इन अवतारों में उनका सबसे महत्वपूर्ण अवतार श्रीकृष्ण का ही था।
यह अवतार उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में लिया था। वास्तविकता तो यह थी इस समय चारों ओर पापकृत्य हो रहे थे। धर्म नाम की कोई भी चीज नहीं रह गई थी। अतः धर्म को स्थापित करने के लिए श्रीकृष्ण अवतरित हुए थे।श्रीकृष्ण में इतने अमित गुण थे कि वे स्वयं उसे नहीं जानते थे, फिर अन्य की तो बात ही क्या है? समस्त देवताओं में श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जो इस पृथ्वी पर सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अवतरित हुए थे। उन्होंने जो भी कार्य किया उसे अपना महत्वपूर्ण कर्म समझा, अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि उनके अवतीर्ण होने का मात्र एक उद्देश्य था कि इस पृथ्वी को पापियों से मुक्त किया जाए। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने जो भी उचित समझा वही किया।
उन्होंने कर्मव्यवस्था को सर्वोपरि माना, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को कर्मज्ञान देते हुए उन्होंने गीता की रचना की जो कलिकाल में धर्म में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
भगवान श्री राम, विष्णुजी के अवतार थे
राम अवतार रामचन्द्र प्राचीन भारत में जन्मे,एक महापुरुष थे।हिन्दू धर्म में, राम, विष्णु के १० अवतारों में से एक हैं। राम, अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के सबसे बडे पुत्र थे। राम की पत्नी का नाम सीता था (जो लक्ष्मी का अवतार मानी जाती है) और इनके तीन भाई थे, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। हनुमान, भगवान राम के, सबसे बडे भक्त माने जाते है।
राम ने राक्षस जाति के राजा रावण का वध किया| माना जाता है कि राम का जन्म प्राचीन भारत में हुआ था। उनके जन्म के समय का अनुमान सही से नही लगाया जा सका है , परन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि राम का जन्म तकरीबन आज से ९,००० वर्ष (७३२३ ईसा पूर्व) हुआ था। धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनो भाइयों के साथ गुरू वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की । किशोरवय में विश्वामित्र उन्हे वन में राक्षसों व्दारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए गये।
राम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी इस कार्य में उनके साथ हो गए। राम ने उस समय ताड़का नामक राक्षसी को मारा तथा मारिच को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान ही विश्वमित्र उन्हे मिथिला लेकर गये। वहॉं के विदेह राजा जनक ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए एक समारोह आयोजित किया था। भगवान शिव का एक धनुष था जिसपर प्रत्यंचा चढ़ा देने वाले शूर से सीता का विवाह किया जाना था। बहुत सारे राजा महाराजा उस समारोह में पधारे थे । बहुत से राजाओं के प्रयत्न के बाद भी जब धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर धनुष उठा तक नहीं तब विश्वामित्र की आज्ञा पाकर राम ने धनुष उठा कर प्रत्यंचा चढ़ाने की कोशिश की। उनकी प्रत्यंचा चढाने की कोशिश में वह महान धुनुष ही घोर ध्वनि करते हुए टूट गया। महर्षि परशुराम ने जब वह घोर ध्वनि सुनि तो वहॉं आये और अपने गुरू (शिव) का धनुष टूटनें पर रोष व्यक्त करने लगे तब राम ने बीच-बचाव किया। इस प्रकार सीता का विवाह राम से हुआ और परशुराम सहित समस्त लोगो ने आर्शीवाद दिया।
राजा दशरथ वानप्रस्थ की ओर अग्रसर हो रहे थे अत उन्होने राज्यभार राम को सौंपनें का सोचा। उस समय राम के अन्य दो भाई भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल कैकेय गए हुए थे। मंथरा, जो रानी कैकेयी की दासी थी, ने कैकेयी को भरमाया कि राजा तुम्हारे साथ गलत कर रहें है। तुम राजा की प्रिय रानी हो तो तुम्हारी संतान को राजा बनना चाहिए पर राजा दशरथ राम को राजा बनाना चाहते हैं। कैकेयी चाहती थी उनके पु्त्र भरत राजा बनें, इसलिए उन्होने राम को, दशरथ द्वरा, १४ वर्ष का वनवास दिलाया। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। राम की पत्नी सीता, और उनके भाई लक्ष्मण भी वनवास गये थे।
वनवास के समय रावण ने सीता का हरण किया था। राम, अपने भाई लक्ष्मण के साथ, सीता की खोज मे दर-दर भटक रहे थे, तब वह हनुमान और सुग्रीव नामक दो वानरों से मिले। हनुमान, राम के सबसे बडे भक्त बने। सीता को बचाने के लिये राम ने, हनुमान और वानर सेना की मदद से,रावण से युद्ध किया और उसे परास्त किया था। भगवान राम ने जब रावण को युद्ध में परास्त कर दिया तब उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया. राम , सीता , लक्षमन और कुछ वानर जन पुष्पक विमान से अयोध्या को प्रस्थान कर गए।वहा सबसे मिलने के बाद राम और सीता अयोध्या के राजा और रानी का पद स्वीकार किया।
राम ने राक्षस जाति के राजा रावण का वध किया| माना जाता है कि राम का जन्म प्राचीन भारत में हुआ था। उनके जन्म के समय का अनुमान सही से नही लगाया जा सका है , परन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि राम का जन्म तकरीबन आज से ९,००० वर्ष (७३२३ ईसा पूर्व) हुआ था। धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनो भाइयों के साथ गुरू वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की । किशोरवय में विश्वामित्र उन्हे वन में राक्षसों व्दारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए गये।
राम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी इस कार्य में उनके साथ हो गए। राम ने उस समय ताड़का नामक राक्षसी को मारा तथा मारिच को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान ही विश्वमित्र उन्हे मिथिला लेकर गये। वहॉं के विदेह राजा जनक ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए एक समारोह आयोजित किया था। भगवान शिव का एक धनुष था जिसपर प्रत्यंचा चढ़ा देने वाले शूर से सीता का विवाह किया जाना था। बहुत सारे राजा महाराजा उस समारोह में पधारे थे । बहुत से राजाओं के प्रयत्न के बाद भी जब धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर धनुष उठा तक नहीं तब विश्वामित्र की आज्ञा पाकर राम ने धनुष उठा कर प्रत्यंचा चढ़ाने की कोशिश की। उनकी प्रत्यंचा चढाने की कोशिश में वह महान धुनुष ही घोर ध्वनि करते हुए टूट गया। महर्षि परशुराम ने जब वह घोर ध्वनि सुनि तो वहॉं आये और अपने गुरू (शिव) का धनुष टूटनें पर रोष व्यक्त करने लगे तब राम ने बीच-बचाव किया। इस प्रकार सीता का विवाह राम से हुआ और परशुराम सहित समस्त लोगो ने आर्शीवाद दिया।
राजा दशरथ वानप्रस्थ की ओर अग्रसर हो रहे थे अत उन्होने राज्यभार राम को सौंपनें का सोचा। उस समय राम के अन्य दो भाई भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल कैकेय गए हुए थे। मंथरा, जो रानी कैकेयी की दासी थी, ने कैकेयी को भरमाया कि राजा तुम्हारे साथ गलत कर रहें है। तुम राजा की प्रिय रानी हो तो तुम्हारी संतान को राजा बनना चाहिए पर राजा दशरथ राम को राजा बनाना चाहते हैं। कैकेयी चाहती थी उनके पु्त्र भरत राजा बनें, इसलिए उन्होने राम को, दशरथ द्वरा, १४ वर्ष का वनवास दिलाया। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। राम की पत्नी सीता, और उनके भाई लक्ष्मण भी वनवास गये थे।
वनवास के समय रावण ने सीता का हरण किया था। राम, अपने भाई लक्ष्मण के साथ, सीता की खोज मे दर-दर भटक रहे थे, तब वह हनुमान और सुग्रीव नामक दो वानरों से मिले। हनुमान, राम के सबसे बडे भक्त बने। सीता को बचाने के लिये राम ने, हनुमान और वानर सेना की मदद से,रावण से युद्ध किया और उसे परास्त किया था। भगवान राम ने जब रावण को युद्ध में परास्त कर दिया तब उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया. राम , सीता , लक्षमन और कुछ वानर जन पुष्पक विमान से अयोध्या को प्रस्थान कर गए।वहा सबसे मिलने के बाद राम और सीता अयोध्या के राजा और रानी का पद स्वीकार किया।
मानव जीवन में गुरु का क्या मत्व है
एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा गुरु जी, कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है , कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं। इनमें कौन सही है ? ’गुरु जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया -‘पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं, मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं । ’यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था । गुरु जी को इसका आभास हो गया। वे कहने लगे-‘लो,तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ ।ध्यान से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे।
उन्होंने जो कहानी सुनाई,वह इस प्रकार थी-एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए । गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए,ला सकोगे?’ वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे । सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा ।’
अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे । लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं ,उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया । वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे ,अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए, उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था । अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके । वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी। पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी । अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये । गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो,ले आये गुरुदक्षिणा ?’तीनों ने सर झुका लिया । गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव,हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये । हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं । ’गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले-‘निराश क्यों होते हो ?प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो ।’तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये ।
वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था,अचानक बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं। आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं?चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है। ’गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र,मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना,सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके । दूसरे,यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप,स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें ।’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था।
अंततः,मैं यही कहना चाहती हूँ कि यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी । सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है ।वस्तुतः,हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’ पुरुषार्थ ही होता है-ऐसा विद्वानों का मत है ।
उन्होंने जो कहानी सुनाई,वह इस प्रकार थी-एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए । गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए,ला सकोगे?’ वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे । सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा ।’
अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे । लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं ,उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया । वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे ,अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए, उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था । अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके । वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी। पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी । अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये । गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो,ले आये गुरुदक्षिणा ?’तीनों ने सर झुका लिया । गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव,हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये । हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं । ’गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले-‘निराश क्यों होते हो ?प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो ।’तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये ।
वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था,अचानक बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं। आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं?चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है। ’गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र,मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना,सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके । दूसरे,यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप,स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें ।’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था।
अंततः,मैं यही कहना चाहती हूँ कि यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी । सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है ।वस्तुतः,हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’ पुरुषार्थ ही होता है-ऐसा विद्वानों का मत है ।
Hindi Shayari : Happy Rose Day 2019
चला जा रे SMS बनके गुलाब
होगी सच्ची दोस्ती तो आएगा जवाब
अगर ना आए तो मत होना उदास
बस समझ लेना की मेरे लिए वक्त नहीं था उनके पास
🌷Happy Rose Day🌷
अगर कुछ बनना है तो गुलाब के फूल बनो
क्योंकि ये फूल उसके हाथ में भी खूशबू छोड़ देता है
जो इसे मसल कर फेंक देता है
🌷Happy Rose Day🌷
होठ जैसे पंखुड़ियां मेरी कोमल
कांटों से बचके ज़रा कहीं हो न जाओ घायल
मैं तोहफा बनकर पहुंच जाता हूं जहां
मुझे देख मुस्कुरा देता है सारा जहां
🌷Happy Rose Day🌷
आशिकों के महबूब के पैरों की धूल हूं
हां मैं एक लाल गुलाब का फूल हूं
🌷Happy Rose Day🌷
जैसे गुलाब, गुलाब के गुच्छे बगैर नहीं रह सकता
मेरा सच्चा प्यार आप हो 'मैं तुम्हें प्यार करता हूं
आपके बिना मैं रह नहीं सकता
🌷Happy Rose Day🌷
फूल बनकर मुस्कुराना ज़िंदगी
मुस्कुरा के गम भुलाना ज़िंदगी
जीत कर कोई खुश हो तो क्या हुआ
हार कर खुशियां मनाना भी ज़िंदगी
🌷Happy Rose Day🌷
मेरी दीवानगी की कोई हद नहीं
होगी सच्ची दोस्ती तो आएगा जवाब
अगर ना आए तो मत होना उदास
बस समझ लेना की मेरे लिए वक्त नहीं था उनके पास
🌷Happy Rose Day🌷
अगर कुछ बनना है तो गुलाब के फूल बनो
क्योंकि ये फूल उसके हाथ में भी खूशबू छोड़ देता है
जो इसे मसल कर फेंक देता है
🌷Happy Rose Day🌷
होठ जैसे पंखुड़ियां मेरी कोमल
कांटों से बचके ज़रा कहीं हो न जाओ घायल
मैं तोहफा बनकर पहुंच जाता हूं जहां
मुझे देख मुस्कुरा देता है सारा जहां
🌷Happy Rose Day🌷
आशिकों के महबूब के पैरों की धूल हूं
हां मैं एक लाल गुलाब का फूल हूं
🌷Happy Rose Day🌷
जैसे गुलाब, गुलाब के गुच्छे बगैर नहीं रह सकता
मेरा सच्चा प्यार आप हो 'मैं तुम्हें प्यार करता हूं
आपके बिना मैं रह नहीं सकता
🌷Happy Rose Day🌷
फूल बनकर मुस्कुराना ज़िंदगी
मुस्कुरा के गम भुलाना ज़िंदगी
जीत कर कोई खुश हो तो क्या हुआ
हार कर खुशियां मनाना भी ज़िंदगी
🌷Happy Rose Day🌷
मेरी दीवानगी की कोई हद नहीं
तेरी सूरत के सिवा मुझे कुछ याद नहीं
मैं गुलाब हूं तेरे गुलशन का
तेरे सिवाए मुझ पर किसी का हक नहीं
🌷Happy Rose Day🌷
मैं गुलाब हूं तेरे गुलशन का
तेरे सिवाए मुझ पर किसी का हक नहीं
🌷Happy Rose Day🌷
जिसे पाया ना जा सके वो जनाब हो तुम
मेरी जिंदगी का पहला ख्वाब हो तुम
लोग चाहे कुछ भी कहे लेकिन
मेरी ज़िंदगी का एक सुंदर-सा गुलाब हो तुम
🌷Happy Rose Day🌷
मेरी जिंदगी का पहला ख्वाब हो तुम
लोग चाहे कुछ भी कहे लेकिन
मेरी ज़िंदगी का एक सुंदर-सा गुलाब हो तुम
🌷Happy Rose Day🌷
मोहब्बत तो सिर्फ एक इत्तेफाक है
ये तो दो दिलों की मुलाकात है
मोहब्बत ये नहीं देखती कि दिन है या रात है
इसमें तो सिर्फ वफादारी और जज़्बात है
🌷Happy Rose Day🌷
ये तो दो दिलों की मुलाकात है
मोहब्बत ये नहीं देखती कि दिन है या रात है
इसमें तो सिर्फ वफादारी और जज़्बात है
🌷Happy Rose Day🌷
🌷Happy Rose Day wishes 2019🌷
Rose is not always meant for
proposing love it also means…….
R- Rare
O- Ones
S- Supporting
E- Entire life
Be a ROSE for someone forever
🌷Happy Rose Day🌷
A rose speaks
of love silently,
in a language known
only to the heart
🌷Happy Rose Day🌷
Rose is not always
meant for proposing love
it also means
🌷Happy Rose Day🌷
Rose is not always
meant for proposing love
it also meanm
🌷Happy Rose Day🌷
Here's a rose for you to keep,
and help enlighten your days.
🌷Happy Rose Day🌷
This rose day I wish that all the
thorns on the path of your life be vanquished and your life path be filled with
petals of love, friendship and blessings.
🌷Happy Rose Day🌷
A Rose speaks
of love Silently,
in a Language known
only to the Heart
🌷Happy Rose Day🌷
With this rose,
I reveal all my
thoughts and feelings
about you that
I have withheld
for so long.
I feel when
I am with you
🌷Happy Rose Day🌷
I am like a rose,
not because of
its beauty, but because
I am able to bloom
and grow with you…
🌷Happy Rose Day🌷
Sending you
a rose to say…
I Love You !
🌷Happy Rose Day🌷
A bunch 💐 of
Fresh and lovely
blossoms Just for you
🌷Happy Rose Day🌷
गाजर में छुपे कई बीमारियों के राज , आओ जाने
गाजर के जूस,से कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज होता है सामान्य
गाजर का अच्छी सेहत से बहुत गहरा संबंध है। कई गुणों से भरपूर गाजर हमारे शरीर को ऐसे पोषक तत्व प्रदान करता है जो अन्य किसी पदार्थ से मिलना दुर्लभ है। सर्दियों में खाना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। गाजर में पर्याप्त मात्रा में मिनरल्स, विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी, कैल्शियम और फाइबर होता है, यह सभी गुण हमें कई बीमारियों से बचाते हैं।सर्दियों में रोजाना गाजर का जूस पीने से सर्दी व जुकाम नहीं होता है। सिर्फ इतना ही नहीं गाजर बॉडी की इम्यूनिटी को भी बढ़ाता है और मेटाबॉलिज्म मजबूत करता है। इसके नियमित सेवन से आप बैक्टीरिया व इंफेक्शन से भी बचे रहते हैं। आज हम आपको गूस पीने के लाभ के बारे में बता रहे हैं।
स्किन रहती है हमेशा हेल्दी
गाजर का जूस पीने से स्किन हेल्दी रहती है और त्वचा संबंधी बीमारियों से भी निजात मिलती है। गाजर के जूस से आपकी त्वचा का रुखापन भी खत्म होता है और एक्जिमा जैसी त्वचा समस्यायें भी दूर रहती हैं। गाजर के जूस में एंटी ऑक्सीडेंट्स की मात्रा बहुत अधिक होती है जिससे उम्र का असर भी दूर रहता है। इसका सेवन झुर्रियों से भी दूर रखता है। अगर आपके चेहरे पर पहले से ही झुर्रियां हैं, तो गाजर का जूस उन्हें कम करने का काम करेगा।
हड्डियां होती है बहुत मजबूत
गाजर का सेवन नियमित रूप से करने से शरीर में कैल्शियम की मात्रा बढ़ती है और आपका शरीर इस तरह से मिलने वाले कैल्शियम को जल्दी अवशोषित करता है। जिन लोगों को हड्डियों से सम्बन्धित समस्या होती हैं, उन्हें अपने आहार में गाजर जरूर लेनी चाहिए।
कई कैंसर से बचाता है
गाजर और अदरक के जूस का मिश्रण वाकई फायदेमंद है। अदरक में अलग अलग तरह के कैंसर से लड़ने की क्षमता होती है। जैसे, ओवेरियन, कोलोरेक्टल, लंग, ब्रेस्ट, स्किन, प्रोस्टेट और पैनक्रिएटिक कैंसर। वे लोग जिन्हें मधुमेह है या जिन्हें होने की शंका है, उनका अपनी डाइट में ये जूस जरुर शामिल करना चाहिये क्योंकि इसमें ढेर सारा एंटीऑक्सीडेंट होता है।
डायबिटीज के लिए गाजर का जूस
गाजर ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करता है। उन लोगों के लिए गाजर का जूस बहुत फायदेमंद है जिन्हें डायबिटीज है या इसके होने की संभावना है। ऐसे लोगों को दिन में 1 ग्लास गाजर का जूस जरूर पीना चाहिए। इस जूस में ढेर सारे एंटीऑक्सीडेंट होते हैं। अदरक तो वैसे भी ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करता है। इसलिए गाजर के जूस में अदरक का टुकड़ा जरूर मिलाएं।
कोलेस्ट्राल के लिए गाजर का जूस
गाजर में विटामिन 'के' होता है जो कि चोट लगने पर रक्त के थक्के जमने में मदद करता है और खून का बहना रोकता है। इससे कोलेस्ट्राल भी सही रहता है। विटामिन 'के' चोट ठीक करने में कारगर है। गाजर में मौजूद विटामिन 'सी' घाव ठीक करने के साथ साथ मसूडों को भी स्वस्थ रखता है।
जाने मकर संक्रांति पर कैसे की जाती है पूजा ,सुहागिन औरतें क्या करती है पति की लंबी आयु के लिए
मकर संक्रांति हिंदुओ का प्रमुख तत्यौहार मैं से एक है । नए साल की शुरुआत के बाद सबसे पहला त्यौहार होने के कारण इस त्यौहार को बड़े जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है। भारत में मकर संक्रांति हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहेल 13 जनवरी की रात में लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है। लोहड़ी का त्यौहार हरियाणा ओर पंजाब मैं मनाया जाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़ ,चावल और भुने हुए मक्का की अग्नि देवता को अहुती दी जाती है तिल से बनी हुई गजक और मुंगफली आपस में बाँँट कर खुशियां मनाते हैं।मकर संक्रांति के त्यौहारों को पूरे भारत में अलग अलग नामो से मनाया जाता है।
मकर संक्रांति पर कैसे की जाती है पूजा
1. मकर संक्राति को स्नान ,जप, तप ओर दान का अपना विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए इस दिन गंगा स्नान ओर सागर स्नान करना चाहिए। जो लोग गंगा स्नान के लिए नही जा परे हैं उन्हें घर पर गंगाजल को जल में मिलकर गंगा माँ का ध्यान करते हुए स्नान करना चाहिए। इस दिन तीर्थो एवं पवित्र नदियों में स्नान का महत्व इसलिये ज्यादा माना जाता है क्योंकि इस दिन सभी देवी देवता अपना रूप बदलकर संगम प्रयाग (गंगा-यमुना सरस्वती) पर स्नान करने आते हैं। मकर संक्राति के दिन ही गंगा जी भागीरथ के पीछे पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जा मिली थी।
2. मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य देव की पूजा उपासना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की मकर राशि में प्रवेश करते हैं , शनि मकर राशि के स्वामी होने के कारण इस त्यौहार को "मकर संक्रांति " के नाम से जाना जाता है। सूर्य भगवान की पूजा मैं सफेद और लाल रंग का विशेष महत्व होता है। सूर्य भगवान को लाल रंग का जल का अर्घ दिया जाता है।
3. इस समय सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए सुहाग का सामान दान करती हैं ।साथ ही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल ,एवं राशि दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है। अलग अलग मान्यताओं के अनुसार त्यौहार के पकवान भी अलग अलग होते हैं। दाल ओर चावल की खिचड़ी इस त्यौहार की प्रमुख पहचान बन गयी है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का भी विशेष महत्व है।
4. मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने का विशेष महत्व होता है जिससे इस त्यौहार को मनाने का और भी उत्साह बड़ जाता है।
महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्याग ने के लिए भी मकर संक्रांति का दिन चुना था। क्योंकि दरअसल भीष्म पितामह पुरणों के बहुत बड़े ज्ञाता थे। भीष्म जब महाभारत युद्ध के दसवें दिन घायल होकर गिर पड़े थे तो उस समय सूर्य दक्षिणायन था ,इसलिए वो परलोक नहीं जाना चाहते थे। उन्हें पिता शांतुन से इच्छा मृत्यु वरदान मिला हुआ था। लिहाजा वे अर्जुन द्वारा बनाई गई शैया पर लेटे रहे जब सूर्य उत्तरायण हो गए तब महा मास शुक्ल पक्ष की अष्ठमी तिथि को नारकातारी में अपने प्राण त्यागे ।
2. मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य देव की पूजा उपासना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की मकर राशि में प्रवेश करते हैं , शनि मकर राशि के स्वामी होने के कारण इस त्यौहार को "मकर संक्रांति " के नाम से जाना जाता है। सूर्य भगवान की पूजा मैं सफेद और लाल रंग का विशेष महत्व होता है। सूर्य भगवान को लाल रंग का जल का अर्घ दिया जाता है।
3. इस समय सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए सुहाग का सामान दान करती हैं ।साथ ही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल ,एवं राशि दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है। अलग अलग मान्यताओं के अनुसार त्यौहार के पकवान भी अलग अलग होते हैं। दाल ओर चावल की खिचड़ी इस त्यौहार की प्रमुख पहचान बन गयी है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का भी विशेष महत्व है।
4. मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने का विशेष महत्व होता है जिससे इस त्यौहार को मनाने का और भी उत्साह बड़ जाता है।
देह त्याग ने के लिए भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति का दिन चुना
मकर संक्रांति शुभकामनाएं संदेश Makar Sankranti Wishes in Hindi 2019
सूरज की राशी बदलेगी,
कुछ का नसीब बदलेगा,
यह साल का पहला पर्व होगा,
जब हम सब मिल कर खुशियाँ मनाएंगे
हैप्पी मकर संक्रांति 2019
खुशी का है यह मौसम,
गुड और टिल का है यह मौसम,
पतंग उड़ाने का है यह मौसम,
शांति और समृद्धि का है यह मौसम
Happy Makar Sankranti ! 2019
ठण्ड की इस सुभाह पड़ेगा हमे नहाना,
क्योंकि संक्रांति का पर्व कर देगा मौसम सुहाना,
कहीं जगह जगह पतंग है उड़ना,
कहीं गुड कहीं तिल के लड्डू मिल कर है खाना
Happy Makar Sankranti
तिल हम हैं , और गुड़ आप ...😘
मिठाई हम हैं , औऱ मिठाई आप ..😘
आपको हमारी तरफ से
मकर संक्रांति की
हार्दिक शुभकामनाएं
काट ना सके कभी कोई पतंग आपकी,
टूटे ना कभी डोर विश्वास की,
छू लो आप ज़िन्दगी की सारी कामयाबी,
जैसे पतंग छूती है ऊँचाइयाँ आसमान की।
मकर सक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!
ऊँची पतंग से मेरी ऊँची उड़ान होंगी।
इस जहाँ में मेरे लिए मंजिले तमाम होंगी।
जब भी आसमान की और देखोगे तुम दोस्तों।
तुम्हारे ही हाथों मेरी डोर के साथ जान होंगी।
तिल्ली भी पीली और गुड़ में मिठास होंगी।
मकर सक्रांति पर्व पर मेरी तरफ से बधाइयाँ बार बार होंगी।
कुछ का नसीब बदलेगा,
यह साल का पहला पर्व होगा,
जब हम सब मिल कर खुशियाँ मनाएंगे
हैप्पी मकर संक्रांति 2019
खुशी का है यह मौसम,
गुड और टिल का है यह मौसम,
पतंग उड़ाने का है यह मौसम,
शांति और समृद्धि का है यह मौसम
Happy Makar Sankranti ! 2019
ठण्ड की इस सुभाह पड़ेगा हमे नहाना,
क्योंकि संक्रांति का पर्व कर देगा मौसम सुहाना,
कहीं जगह जगह पतंग है उड़ना,
कहीं गुड कहीं तिल के लड्डू मिल कर है खाना
Happy Makar Sankranti
तिल हम हैं , और गुड़ आप ...😘
मिठाई हम हैं , औऱ मिठाई आप ..😘
आपको हमारी तरफ से
मकर संक्रांति की
हार्दिक शुभकामनाएं
काट ना सके कभी कोई पतंग आपकी,
टूटे ना कभी डोर विश्वास की,
छू लो आप ज़िन्दगी की सारी कामयाबी,
जैसे पतंग छूती है ऊँचाइयाँ आसमान की।
मकर सक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!
ऊँची पतंग से मेरी ऊँची उड़ान होंगी।
इस जहाँ में मेरे लिए मंजिले तमाम होंगी।
जब भी आसमान की और देखोगे तुम दोस्तों।
तुम्हारे ही हाथों मेरी डोर के साथ जान होंगी।
तिल्ली भी पीली और गुड़ में मिठास होंगी।
मकर सक्रांति पर्व पर मेरी तरफ से बधाइयाँ बार बार होंगी।
शालिग्राम शिला से कैसे प्रकट हुए "राधारमण जी "
!! श्री राधारमण जी !!
श्री गोपाल भट्ट गोस्वामीजी का जीवन परिचय
गोपाल भट्ट गोस्वामी का जन्म संवत् 1425 में (सन् 1503 ई॰ में)विक्रमी में कावेरी नदी के तट पर श्री रंग के पास बेलगुड़ी ग्राम में श्री वैंकट भट्ट के पुत्र के रूप मे हुआ था।जब गोरांग दक्षिण यात्रा करते हुए श्रीरंग आये तो वेंकट भट्ट के यहाँ चातुर्मास व्यतीत किया था।गोपाल भट्ट की सेवा से प्रसन्न हो इन्हें दीक्षा दी तथा जाते समय विवाह न करने पर अध्ययन और माता पिता की सेवा करने का उपदेश दिया। गोस्वामी जी माता पिता की मृत्यु के बाद वृंदावन आये। श्रीगौरांग के अप्रकट होने पर वृद्ध गोस्वामीयो के विशेष आग्रह पर यह आसन पर बैठे। उत्तरी तथा पश्चिमी भारत के बहुत से लोग इनके शिष्य हुए। इसके अनंतर यह यात्रा को निकले। अपनी यात्रा के दौरान गंडकी नदी गए वहाँ से एक शलिग्राम शिला ले आये और उसकी निरंतर पूजा करने लगे । उनकी पूजा के कारण शालिग्राम शिला राधारमण जी मैं परवर्तित हुये। श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शियाओं मैं से एक थे। वे वृंदावन के प्रसिद्ध 6 गोस्वामी मैं से एक थे।
गोपाल भट्ट गोस्वामी का जन्म संवत् 1425 में (सन् 1503 ई॰ में)विक्रमी में कावेरी नदी के तट पर श्री रंग के पास बेलगुड़ी ग्राम में श्री वैंकट भट्ट के पुत्र के रूप मे हुआ था।जब गोरांग दक्षिण यात्रा करते हुए श्रीरंग आये तो वेंकट भट्ट के यहाँ चातुर्मास व्यतीत किया था।गोपाल भट्ट की सेवा से प्रसन्न हो इन्हें दीक्षा दी तथा जाते समय विवाह न करने पर अध्ययन और माता पिता की सेवा करने का उपदेश दिया। गोस्वामी जी माता पिता की मृत्यु के बाद वृंदावन आये। श्रीगौरांग के अप्रकट होने पर वृद्ध गोस्वामीयो के विशेष आग्रह पर यह आसन पर बैठे। उत्तरी तथा पश्चिमी भारत के बहुत से लोग इनके शिष्य हुए। इसके अनंतर यह यात्रा को निकले। अपनी यात्रा के दौरान गंडकी नदी गए वहाँ से एक शलिग्राम शिला ले आये और उसकी निरंतर पूजा करने लगे । उनकी पूजा के कारण शालिग्राम शिला राधारमण जी मैं परवर्तित हुये। श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शियाओं मैं से एक थे। वे वृंदावन के प्रसिद्ध 6 गोस्वामी मैं से एक थे।
शालिग्राम शिला मैं से कैसे प्रकट हुए "राधारमण जी "
श्री भट्टगोस्वामी पहले एक शालग्राम शिला की सेवा करते थे।कुछ लोगों का मानना है , कि एक बार दिल्ली का कोई सेठ वृंदावन मैं घूमने आए थे। सेठ ने वृंदावन के सभी मंदिरों में गौस्वामीयो से ठाकुर जी को पोशाक पहनाने की इच्छा जताते हुए ठाकुर जी का नाप लेना शुरू कर दिया।जैसे ही सेठ गोपाल भट्ट जी गोस्वामीजी के पास पहुँचे ,उस समय गोपाल भट्ट गौस्वामी जी आपने ध्यान मुद्रा में थे तभी सेठ ने गोस्वामी जी से उनके शालिग्राम शिला ठाकुर जी का पोशाक का नाप जानना चाहा तो गोस्वामी जी ने सेठ को हथेली भर हाथ से नाप का इशारा करने हुए बोला, सेठ ने सोचा कि हथेली भर के नाप की पोशाक बनवानी होगी। सेठ को ये पता नही था श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी के उपास्य ठाकुर जी का रूप एक शमिग्राम शिला के रूप में है। गोस्वामीजी को भी यही लगा कि हथेली भर कपड़ा मेरे ठाकुर जी के लिए हो जाएगा। शालिग्राम शिला का रूप सभी जानते हैं उनके लिए आज भी हथेली भर कपड़ा ही उनकी पोशक के लिये हो जाता है ।कुछ समय बिताने के पश्चात जब सेठ दुबारा वृंदावन पहुंचे तो उन्होंने सभी मंदिरों में पोशाक बाटना शुरू कर दिया।धीरे-धीरे सेठ पोशाक मंदिरों में देते हुए जब श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी के पास पहुंचे तो सेठ ने गोस्वामी जी को जब हथेली भर नाप की पोशाक दी तो गोस्वामी जी बहुत अचंभित हुये,ओर पोषक को देखने लगे।सेठ ने तभी पूछा गोस्वामी जी से पूछा आप को पोशाक अच्छी तो लगी । तभी गोस्वामी जी मुस्काते हुये सेठ को बोलते हैं बहुत सुंदर बहुत अच्छी है। पर गोस्वामी जी को मन ही मन लगा यदि मैं सेठ को वास्विकता बता दु तो सेठ का मन बहुत दुःखी होगा । पर गोस्वामी जी ठाकुर जी के सेवक थे तो वो भली भांति जानते थे कि भक्त का अपने भगवान के साथ अलग ही तरह का प्रेम भाव होता है। सेठ गोस्वामी जी से आज्ञा लेते हुए वापस चला जाता है।सेठ के जाने के पश्चात श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी पोशाक को देख देख कर अपने ठाकुर को एक शालिग्राम शिला के रूप में थे देख कर बहुत रोते हैं और मन ही मन सोचते हैं यदि शमिग्राम ठाकुर जी हस्त पद होते तो मैं भी उनकों ये पोशाक पहनता ओर विधि प्रकार से सेवा करता ।उनको पालने में झूलता। यही सोच सोच कर गोस्वामी जी इतना रोते हैं कि स्वयं शालिग्राम जी ये देख अपने मन मैं अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए उसी रात में राधारमण के रूप परिवर्तित हो गए ।हिन्दू धार्मिक मान्यता के अनुसार यह माना जाता है कि 1599 विक्रम संवत वैशाख शुक्ला पूर्णिमा की बेलामें शालिगराम से श्री राधारमण विग्रह के रूप में प्रकट हुए। भट्ट गोस्वामी ने नानाविध अलंकारों से उनका सिंगार कर केे उन्हें पलने मैं झुलाया उन्हें लाड़-प्यार से उन्हें भोगराग अर्पित कराया ओर उनकी आरती करी।श्रीराधारमण विग्रह की पीठ शालग्राम शिला जैसी दीखती है। अर्थात पीछे से दर्शन करने में शालग्राम शिला जैसे ही लगते हैं। द्वादश अंगुल का श्रीविग्रह होने पर भी बड़ा ही मनोहर दर्शन है। श्री राधारमण विग्रह का श्री मुखारबिंद गोविंद जी के समान, वक्षस्थल श्री गोपीनाथ के समान तथा चरणकमल मदनमोहन जी के समान हैं। इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल प्राप्त होता है ।
श्री राधा रमण मंदिर के पास ही दक्षिण मैं श्री गोपाल गोस्वामी जी की समाधि तथा राधारमण के प्रकट होने का स्थान दर्शनीय है। बाँके बिहारी जी की तरह श्री राधारमण जी वृंदावन से कहीं बाहर नहीं गए।बोलो राधारमण जी की जय !!
श्री राधा रमण मंदिर के पास ही दक्षिण मैं श्री गोपाल गोस्वामी जी की समाधि तथा राधारमण के प्रकट होने का स्थान दर्शनीय है। बाँके बिहारी जी की तरह श्री राधारमण जी वृंदावन से कहीं बाहर नहीं गए।बोलो राधारमण जी की जय !!
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