कब और कैसे करें नवरात्रि का पूजन?

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चैत्र  मास के शुक्ल पक्ष के नवरात्र आज रविवार से प्रारंभ हो रहे हैं। कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6:38 से 9:21 बजे तक-मिथुन लगन 11:16 से 12:52 तक है| इस बार के नवरात्र साधना, सिद्धि, खरीदारी और मांगलिक कार्यों के लिए श्रेष्ठ है। रविवार के दिन उत्तर भाद्रपद नक्षत्र तथा सर्वार्थ सिद्धि योग के संयोग में चैत्र नवरात्र का शुभारंभ हो रहा है।नवरात्री को लेकर माता के मंदिरों को सजा दिया गया है|


इस बार के नवरात्रों में सप्तमी और अष्टमी की पूजा एक दिन ही 24 मार्च को मनायी जाएगी| नवरात्री को लेकर बाजारों में माता के भक्तों की भारी भीड़ दिखाई दी जो माता के नवरात्रि को लेकर खरीददारी किये हालाँकि कुछ  लोगों पर महगाई का असर भी देखने को मिला| सभी भक्त जनों को नवरात्रि एवं हिन्दू नववर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं|

ऑटो चलाने वाले पिता की बेटी बनी न्यायधीश

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ऑटो चलाने वाले पिता की बेटी बनी न्यायधीश

इससे पहले की सपने सच हो आपको सपने देखने होंगे - Dr APJ Abdul Kalam


 जो लोग सपने देखते है उन्हीं के सपने साकार होते है ।कुछ बनाने के लिए बुनियादी तौर पर कुछ इस तरह के लोग होते है जो चीजें हासिल करने के लिए वादे पूरे करते है ।



देहरादून की रहने वाली पूनम टोडी ने मिसाल कायम करते हुए पीसीएस (जे) पेपर में उत्तराखंड टॉप कर अपने राज्य का मान बढ़ाया है। पूनम के पिता अशोक टोडी एक ऑटो चालक है । पूनम की माता लाता बेटी की कामयाबी से फूले नही समा रही ।



पिता की मेहनत ने नही आने की आर्थिक तंगी आड़े 

देहरादून के नेहरू कॉलोनी बी ब्लॉक की ऑटो चालक की लड़की पूनम टोडी ने बताया पिता की मेहनत ने कभी भी आर्थिक तंगी से गुजरने नही दिया । पूनम बताती है पापा 400- 500 रुपये ही कमा पाते थे।  इस कम आमदनी मैंं परिवार का भरण पोषण बहुत मुश्किल से किया। उनके दो भैया ओर एक बहन है। जिनमे उन्होंने कोई फर्क नहीं किया।







कैसे करें गृहस्थ जीवन में नवरात्र में दुर्गा की पूजा?

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||कैसे करें गृहस्थ जीवन में  नवरात्र में दुर्गा की पूजा?||


एक वर्ष में चार नवरात्र आते हैं | दो मुख्य और दो गुप्त नवरात्र | जिन लोगों को शक्ति की उपासना करनी हो, उन्हें शारदीय नवरात्र में मां की पूजा-अर्चना करनी चाहिए | इन दिनों शक्ति की उपासना के साथ ही अपने इष्ट की भी आराधना  भक्तओं को शुभ फल देती है |इसलिए नवरात्र में शक्तिसंपन्न देवता जैसे हनुमान जी और भैरव जी की पूजा भी बहुत फलदायी होती है, क्योंकि ये देवता भी देवी के साथ-साथ ही शक्तिशाली माने गए हैं, जो पूजा से जल्दी ही प्रसन्न होते हैं | नौ दिनों तक होने वाली नौ दुर्गा उपासना में सूर्य और चंद्रमा सहित अन्य नवग्रहों का भी विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है |



नियम भंग न हो शास्त्रों में गृहस्थ जीवन को ही सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है, क्योंकि इसी जीवन से सृष्टि का विकास होता है और संस्कारों का विस्तार होता है | इसी जीवन में व्यक्ति सबसे अधिक व्यस्त रहता है | वह अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारियों में ही इतना उलझा रहता है कि ईश्वर की ओर भी पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाता | इसके बावजूद गृहस्थ को थोड़ा समय निकाल कर नवरात्र स्थापना कर उपासना करनी चाहिए | इससे उसके गृहस्थ जीवन में सुख-शांति व संपन्नता बनी रहती है |
गृहस्थ व्यक्ति को जितना ही समय मिले, वह उतने ही समय में नवरात्र में पूजा-पाठ यदि नियम, यम तथा संयम से करे, तो मनचाहा फल प्राप्त कर सकता है | यहां नियम से मतलब है कि व्यक्ति नौ दिनों तक अपना पूजा-पाठ नियम से यानी निश्चित समय पर करे, इस समय को खंडित न करे | यदि सुबह 7 बजे ही वह पूजा कर सकता है, तो प्रतिदिन सुबह 7 बजे ही करे | इस नियम को खंडित न करे | व्यवस्थित तरीके से व्रत, उपवास करें | उपासना के दौरान या पूरे नौ दिनों तक पवित्रता का ख्याल रखें | मन, वचन व कर्मों से शुद्धता बनाए रखें | ब्रह्मचर्य का पालन करें और खानपान में भी शुद्धता का ध्यान रखें | जमीन पर सोएं | घर पर ही भोजन करें और घर पवित्र रखें | नवरात्र करने वाले गृहस्थ को अपने घर में अपनी श्रद्धा व क्षमतानुसार व्यवस्था कर लेनी चाहिए | घर में कलश स्थापना कर, इष्ट की मूर्ति व तस्वीर रख उनसे संबंधित मंत्रों का जाप या पाठ करना चाहिए | अलग-अलग देवताओं के मंत्र जाप व पाठ से फल भी अलग-अलग ही मिलते हैं | इसलिए दुर्गा पाठ के साथ यदि हो सके, तो अपने इष्ट देव की आराधना जरूर करें | शीघ्र लाभ के लिए उपासना का जल्दी फल प्राप्त करने के लिए तंत्र विधान किया जाता है | वैसे भी तंत्र उपासना देवी की ही की जाती है | अगर आप थोड़े में ज्यादा लाभ पाना चाहते हैं, तो नवरात्र में देवी की तंत्र पूजा कर सकते हैं | इसमें क्लीं शब्द को तंत्र का बीज मंत्र कहा गया है, इसका सवा लाख जाप करके भी तंत्र साधना की जा सकती है |इसके लिए प्रातःकाल स्नान कर अपने आराध्य और देवी को घी या तेल का दीपक लगाएं, क्लीं मंत्र का जाप करें, गूगल का धूप देवी को करें | इतना भी नहीं हो तो 5 सरसों के तेल के दीपक जलाकर देवी दुर्गा की आरती कर लें |  भक्त को लाभ ही लाभ मिलेगा |

भारत की पहली महिला लड़ाकू विमान पायलट: अवनि चतुर्वेदी

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अवनि चतुर्वेदी भारत की पहली महिला लड़ाकू पायलटों में से एक है। वह रीवा जिले से है जो मध्य प्रदेश में है। उन्हें अपनी दो साथियों- मोहन सिंह और भावना कंठ के साथ पहली बार लड़ाकू पायलट घोषित किया गया था।भावना कांत  बिहार के बेगूसराय की और मोहना गुजरात के वडोदरा की हैं। इन तीनों को जून 2016 में भारतीय वायु सेना के लड़ाकू स्क्वाड्रन में शामिल किया गया। उन्हें औपचारिक रूप से तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर द्वारा कमीशन में शामिल किया गया था

नाम                      अविन चतुर्वेदी
जन्म तारीख           27 अक्टूबर 1993
पिता का नाम          दिनकर चतुर्वेदी
नागरिकता              भारतीय
व्यवसाय                 लड़ाकू विमान पायलट
उपलब्धि                 प्रथम महिला फाइटर पायलट
शिक्षा                      स्नातक
निवासी                   रीवा (मध्यप्रदेश)



प्रारंभिक जीवन ओर पारिवारिक जानकारी 

अवनि का जन्म रीवा के निवासी दिनकर चतुर्वेदी के यहां 23-10-1993 के दिन हुआ। अवनि के पिता जल संसाधन विभाग में एक कार्यकारी इंजीनियर और माता एक गृहिणी हैं।
जबकि भाई आर्मी में कैप्टन है।अवनी के चाचा सहित परिवार के कई सदस्य आर्मी के जरिए देशसेवा कर रहे हैं। अवनि ने अपने बड़े भैया से प्रेरित होकर सेना में आने का निर्णय लिया।
अवनि के भैया भी चहाते थे उनकी बहन देश की सेवा करे।अवनि को अपने कॉलेज के फ्लाइंग क्लब में कुछ घंटो की उड़ान का अनुभव पहेले से था। इन्हीं वजहों से अवनी को भी ये लाइफ पसंद है। एक इंटरव्यू के दौरान अपने पुराने दिनों को याद करते हुए अवनी ने बताया था कि हर किसी को बचपन में आसमां की तरफ उड़ता प्लेन देखकर ऊपर उड़ने को जी चाहता है। आज उन्हें एयरफोर्स के जरिए ये मौका मिल रहा हैं।

 शिक्षा संपादित 

अवनि ने अपनी स्कूली शिक्षा दियोलैंड से की जो कि मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में स्थित एक छोटा सा शहर है। उन्होंने २०१४ में अपनी स्नातक प्रौद्योगिकी वनस्थली विश्वविद्यालय, राजस्थान से करते हुए भारतीय वायु सेना की परीक्षा भी पारित की। 22-वर्षीय अवनि चतुर्वेदी ने अपना पूरा प्रशिक्षण हैदराबाद की वायु सेना अकादमी से लिया।


अवनि का महिलाओं को संदेश 


इस पायलट ने महिलाओं को संदेश देते हुए कहा कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में काम करने को सक्षम हैं। बस खुद को जागरूक रखने के साथ प्रोफेशनली सही साबित करने की कोशिश करनी चाहिए।


जानें क्यों मनाते है नवरात्री त्यौहार?

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नवरात्र हिन्दुओं का धार्मिक पर्व है | इस पर में विशेष रूप से आदि शक्ति दुर्गा की पूजा की जाती है | यह पर्व पूरे नौ दिनों तक मनाया जाता है जिस दौरान देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है | नवरात्र  के अंतिम दिन विधि- पूर्वक कन्या पूजन करना भी अति आवश्यक माना गया है |

कन्या पूजन का विधान - 

भविष्यपुराण और देवीभागवत पुराण के अनुसार नवरात्र पर्व के अंत में कन्या पूजन जरूरी माना गया है | कन्या पूजन के बिना नवरात्र व्रत को अधूरा माना जाता है | कन्या पूजन अष्टमी या नवमी में से किसी एक दिन करना श्रेष्ठ माना जाता है |  कन्या पूजन के लिए दस वर्ष तक की नौ कन्याओं की आवश्यकता होती है | इन नौ कन्याओं की लोग को मां दुर्गा के नौ रूप समझकर ही पूजा करनी चाहिए |

कैसे करें कन्याओं की पूजा - 

कन्या पूजन के लिए सबसे पहले व्यक्ति तो प्रातः स्नान कर विभिन्न प्रकार का भोजन(पूरी ,हलवा, खीर, भुना हुआ चना आदि) तैयार कर लेना चाहिए | सभी प्रकार के भोजन में से पहले मां दुर्गा को भोग लगाना चाहिए |

दस वर्ष तक की नौ कन्याओं को घर पर भोजन करने के लिए बुलाना चाहिए | भोजन करना से पहले कन्याओं का पैर शुद्ध पानी से धोकर उन्हें भोजन के लिए साफ स्थान पर कपड़ा बिछाकर बिठाना चाहिए |

कन्याओं को एक साथ बैठाकर उनके हाथों में रक्षा सूत्र बांधकर माथे पर रोली का टीका लगाना चाहिए | मां दुर्गा को जिस भोजन का भोग लगाया हो उसे सर्वप्रथम प्रसाद के रूप में कन्याओं को खिलाना चाहिए |

जब कन्या पेट भर के भोजन कर ले तो उन्हें दक्षिणा में रुपया, सुहाग की वस्तुएं, चुनरी आदि वस्तुएं उपहार में अवश्य देनी चाहिए | अंत में कन्याओं के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेकर उन्हें प्रेम पूर्वक विदा करना चाहिए |

इस दिन हवन करना बेहद आवश्यक होता है और कोशिश करनी चाहिए कि हवन की कुच आहुतियां कन्याओं के हाथों से डाली जाएं | 

किस आयु की हों कन्याएं - 

देवीभागवत पुराण के अनुसार कन्या पूजन में केवल दो वर्ष से बड़ी और दस या दस वर्ष से छोटी आयु की कन्याओं को ही शामिल करना चाहिए | दो साल की कन्या कुमारी, तीन साल की त्रिमूर्ति, चार साल की कल्याणी, पांच साल की रोहिणी, छ: साल की कालिका, सात साल की चंडिका, आठ साल की शाम्भवी, नौ साल की दुर्गा और दस साल की कन्या सुभद्रा मानी जाती हैं | कन्या पूजा करते समय इन देवियों के नामों को मन में याद करना चाहिए |

कन्या पूजन का फल - 

मान्यता है कि नवरात्र की पूजा व व्रत कन्या पूजन के बिना अधूरी होती है | अंतिम दिन जो भी श्रद्धा भाव से कन्याओं की पूजा कर उन्हें भोजन करवाता है उसकी सारे मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है | कुछ लोग नौ कन्याओं के साथ भौरों बाबा के रूप में एक छोटे बालक को भी भोजन करवाते हैं |
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||ॐ||देवी दुर्गा के 108 नाम ||ॐ||



  1. ·         सती  : अग्नि में जल कर भी जीवित होने वाली
  2. ·         साध्वी : आशावादी
  3. ·         दुर्गा :  अपराजेय
  4. ·         जया : विजयी
  5. ·         आद्य : शुरूआत की वास्तविकता
  6. ·         त्रिनेत्र : तीन आँखों वाली
  7. ·         शूलधारिणी : शूल धारण करने वाली
  8. ·         पिनाकधारिणी : शिव का त्रिशूल धारण करने वाली
  9. ·         चित्रा : सुरम्य, सुंदर 
  10. ·         भवप्रीता : भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली
  11. ·         भवानी : ब्रह्मांड की निवास
  12. ·         भवमोचनी :  संसार बंधनों से मुक्त करने वाली
  13. ·         आर्या : देवी
  14. ·         चण्डघण्टा : प्रचण्ड स्वर से घण्टा नाद करने वाली, घंटे की आवाज निकालने वाली 
  15. ·         महातपा : भारी तपस्या करने वाली
  16. ·         मन  : मनन- शक्ति
  17. ·         बुद्धि : सर्वज्ञाता
  18. ·         अहंकारा : अभिमान करने वाली
  19. ·         चित्तरूपा : वह जो सोच की अवस्था में है
  20. ·         चिता :  मृत्युशय्या
  21. ·         चिति : चेतना
  22. ·         भाविनी :  सबको उत्पन्न करने वाली, खूबसूरत औरत
  23. ·         भाव्या :  भावना एवं ध्यान करने योग्य
  24. ·         भव्या :  कल्याणरूपा, भव्यता के साथ
  25. ·         अभव्या  : जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं
  26. ·         सदागति :  हमेशा गति में, मोक्ष दान
  27. ·         शाम्भवी :  शिवप्रिया, शंभू की पत्नी
  28. ·         देवमाता : देवगण की माता
  29. ·         चिन्ता : चिन्ता
  30. ·         रत्नप्रिया : गहने से प्यार
  31. ·         सर्वमन्त्रमयी : सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली
  32. ·         सत्ता : सत्-स्वरूपा, जो सब से ऊपर है
  33. ·         सत्यानन्दस्वरूपिणी : अनन्त आनंद का रूप
  34. ·         अनन्ता :  जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं
  35. ·         सर्वविद्या : ज्ञान का निवास
  36. ·         दक्षकन्या : दक्ष की बेटी
  37. ·         दक्षयज्ञविनाशिनी : दक्ष के यज्ञ को रोकने वाली
  38. ·         अपर्णा : तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली
  39. ·         अनेकवर्णा : अनेक रंगों वाली
  40. ·         पाटला : लाल रंग वाली
  41. ·         पाटलावती : गुलाब के फूल या लाल परिधान या फूल धारण करने वाली
  42. ·         पट्टाम्बरपरीधाना : रेशमी वस्त्र पहनने वाली
  43. ·         कलामंजीरारंजिनी : पायल को धारण करके प्रसन्न रहने वाली
  44. ·         अमेय : जिसकी कोई सीमा नहीं
  45. ·         विक्रमा : असीम पराक्रमी
  46. ·         क्रूरा : दैत्यों के प्रति कठोर
  47. ·         सुन्दरी : सुंदर रूप वाली
  48. ·         सुरसुन्दरी : अत्यंत सुंदर
  49. ·         वनदुर्गा : जंगलों की देवी
  50. ·         मातंगी : मतंगा की देवी
  51. ·         मातंगमुनिपूजिता : बाबा मतंगा द्वारा पूजनीय
  52. ·         ब्राह्मी : भगवान ब्रह्मा की शक्ति
  53. ·         माहेश्वरी : प्रभु शिव की शक्ति
  54. ·         इंद्री : इन्द्र की शक्ति
  55. ·         कौमारी : किशोरी
  56. ·         वैष्णवी : अजेय
  57. ·         चामुण्डा : चंड और मुंड का नाश करने वाली
  58. ·         वाराही : वराह पर सवार होने वाली
  59. ·         लक्ष्मी : सौभाग्य की देवी
  60. ·         पुरुषाकृति : वह जो पुरुष धारण कर ले
  61. ·         विमिलौत्त्कार्शिनी : आनन्द प्रदान करने वाली
  62. ·         ज्ञाना : ज्ञान से भरी हुई
  63. ·         क्रिया : हर कार्य में होने वाली
  64. ·         नित्या : अनन्त
  65. ·         बुद्धिदा : ज्ञान देने वाली
  66. ·         बहुला : विभिन्न रूपों वाली
  67. ·         बहुलप्रेमा : सर्व प्रिय
  68. ·         सर्ववाहनवाहना : सभी वाहन पर विराजमान होने वाली
  69. ·         निशुम्भशुम्भहननी : शुम्भ, निशुम्भ का वध करने वाली
  70. ·         महिषासुरमर्दिनि : महिषासुर का वध करने वाली
  71. ·         मधुकैटभहंत्री : मधु व कैटभ का नाश करने वाली
  72. ·         चण्डमुण्ड विनाशिनि : चंड और मुंड का नाश करने वाली
  73. ·         सर्वासुरविनाशा : सभी राक्षसों का नाश करने वाली
  74. ·         सर्वदानवघातिनी : संहार के लिए शक्ति रखने वाली
  75. ·         सर्वशास्त्रमयी : सभी सिद्धांतों में निपुण
  76. ·         सत्या : सच्चाई
  77. ·         सर्वास्त्रधारिणी : सभी हथियारों धारण करने वाली
  78. ·         अनेकशस्त्रहस्ता : हाथों में कई हथियार धारण करने वाली
  79. ·         अनेकास्त्रधारिणी : अनेक हथियारों को धारण करने वाली
  80. ·         कुमारी : सुंदर किशोरी
  81. ·         एककन्या : कन्या
  82. ·         कैशोरी : जवान लड़की
  83. ·         युवती : नारी
  84. ·         यति : तपस्वी
  85. ·         अप्रौढा : जो कभी पुराना ना हो
  86. ·         प्रौढा : जो पुराना है
  87. ·         वृद्धमाता : शिथिल
  88. ·         बलप्रदा : शक्ति देने वाली
  89. ·         महोदरी : ब्रह्मांड को संभालने वाली
  90. ·         मुक्तकेशी : खुले बाल वाली
  91. ·         घोररूपा : एक भयंकर दृष्टिकोण वाली
  92. ·         महाबला : अपार शक्ति वाली
  93. ·         अग्निज्वाला : मार्मिक आग की तरह
  94. ·         रौद्रमुखी : विध्वंसक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा
  95. ·         कालरात्रि : काले रंग वाली
  96. ·         तपस्विनी : तपस्या में लगे हुए
  97. ·         नारायणी : भगवान नारायण की विनाशकारी रूप
  98. ·         भद्रकाली :  काली का भयंकर रूप
  99. ·         विष्णुमाया : भगवान विष्णु का जादू
  100. ·         जलोदरी : ब्रह्मांड में निवास करने वाली
  101. ·         शिवदूती : भगवान शिव की राजदूत
  102. ·         102. करली   : हिंसक
  103. ·         अनन्ता : विनाश रहित
  104. ·         परमेश्वरी : प्रथम देवी
  105. ·         कात्यायनी : ऋषि कात्यायन द्वारा पूजनीय
  106. ·         सावित्री : सूर्य की बेटी
  107. ·         प्रत्यक्षा : वास्तविक
  108. ·         ब्रह्मवादिनी : वर्तमान में हर जगह वास करने वाली


नवरात्रि मैं कैसे करें कलश स्थापना?

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||ॐ||नवरात्रि मैं कैसे करें कलश स्थापना||ॐ||

पावन पर्व नवरात्रो में दुर्गा माँ के नव रूपों की पूजा नौ दिनों तक चलती हैं| नवरात्र के आरंभ में प्रतिपदा तिथि को उत्तम मुहर्त में कलश या घट की स्थापना की जाती है | कलश को भगवान गणेश का रूप माना जाता है जो की किसी भी पूजा में सबसे पहले पूजनीय है इसलिए सर्वप्रथम घट रूप में गणेश जी को बैठाया जाता है  | धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है | कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं और कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं |
                    




कलश स्थापना विधि -

                                         महर्षि वेद व्यास से द्वारा भविष्य पुराण में बताया गया है की कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को अच्छे से शुद्ध किया जाना चाहिए | उसके उपरान्त एक लकड़ी का पाटे पर लाल कपडा बिछाकर उसपर थोड़े चावल गणेश भगवान को याद करते हुए रख देने चाहिए | फिर जिस कलश को स्थापित करना है उसमे मिट्टी भर के और पानी डाल कर उसमे जौ बो देना चाहिए | इसी कलश पर रोली से स्वास्तिक और ॐ बनाकर कलश के मुख पर मोली से रक्षा सूत्र बांध दे | कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रख दे और फिर कलश के मुख को ढक्कन से ढक दे | ढक्कन को चावल से भर दे | पास में ही एक नारियल जिसे लाल मैया की चुनरी से लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए | इस नारियल को कलश के ढक्कन रखे और सभी देवी देवताओं का आवाहन करे  | अंत में दीपक जलाकर कलश की पूजा करे  | अंत में कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ा दे | अब हर दिन नवरात्रों में इस कलश की पूजा करे |


पूजन सामग्री -

1 - जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र |
2 -  जौ बोने के लिए शुद्ध साफ की हुई मिटटी |
3 - पात्र में बोने के लिए जौ |
4 - कलश में भरने के लिए शुद्ध जल, गंगाजल |
5 - मोली |
6 - इत्र |
7 - साबुत सुपारी |
8 - दूर्वा |
9 - कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के |
10 - पंचरत्न |
11 - अशोक या आम के 5 पत्ते |
12 - कलश ढकने के लिए मिटटी का दीया |
13 - ढक्कन में रखने के लिए बिना टूटे चावल |
14 - पानी वाला नारियल |
15 - नारियल पर लपेटने के लिए लाल कपडा |
16 – अखंड ज्योति (एक ऐसा दीपक जिसको आप १० दिन तक जला सके, इस बात का ध्यान रहे की दीपक बुझे नहीं इससे आपके घर में एक दिव्य वातावरण पैदा होगा)

जौ बोना चाहिए - 
                                                  कलश के चारों ओर गीली मिट्टी लगाकर उसमें जौ बोना चाहिए | जौ चारों तरफ बिछाएं ताकि जौ कलश के नीचे न दबे | इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं | अब कलश के कंठ पर मोली बाँध दें तत्पश्चात कलश में शुद्ध जल, गंगाजल कंठ तक भर दें | कलश में साबुत सुपारी, दूर्वा, फूल डालें | कलश में थोडा सा इत्र दाल दें | कलश में पंचरत्न डालें | कलश में कुछ सिक्के डाल दें | कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें | अब कलश का मुख मिट्टी/स्टील की कटोरी से बंद कर दें और उस कटोरी में चावल भर दें |

                                     

नारियल का मुख किस तरफ रखना चाहिए -

नारियल पर लाल कपडा लपेट कर मोली लपेट दें | अब नारियल को कलश पर रख दें | नारियल का मुख उस सिरे पर होता है, जिस तरफ से वह पेड़ की टहनी से जुड़ा होता है | शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में वृद्धि होती है | नारियल का मुख ऊपर की तरफ रखने से रोग बढ़ते हैं, जबकि पूर्व की तरफ नारियल का मुख रखने से धन का विनाश होता है | इसलिए नारियल की स्थापना सदैव इस प्रकार करनी चाहिए कि उसका मुख साधक की तरफ रहे |