कैसी होती है माँ ? : स्वामी विवेकानंद

No comments :

घर आ कर बहुत रोये माँ-बाप अकेले में,
मिट्टी के खिलोने भी सस्ते नहीं थे मेले में !!
                                       

एक बार एक नगर मे स्वामी विवेकानन्द पहुँचे,वहाँ के नगर धनाड़्य सेठ साहूकारों ने उन्हें बहूमूल्य रत्न भेंट किए,स्वामी जी उन्हें एक हाथ से स्वीकार कर अलग रख देते थे|इतने में एक बूढ़ी महिला वहाँ आई ओर बोली- "प्रभु जब आपके आने का समाचार मिला, तो रोटी खा रही थी,मेरे पास ओर कुछ तो नहीं है लेकिन अपनी एक मात्र रोटी में से आधी रोटी बचाकर आपके लिए ले लाई हूँ, उम्मीद है आप मेरी इस छोटी सी भेँट को स्वीकार कर लेंगे"

स्वामी जी की आँखे भर आई ओर अपने दोनों हाथ फैलाकर भेँट स्वीकार कर खाने लगे|धनी और साहूकार लोगों को ये बात बुरी लगी ओर बोले- "स्वामी जी हमारे क़ीमती आभूषण रत्न को आपने एक हाथ से लेकर अलग रख दिया जबकि इस बुढ़िया की जूठी. रोटी के लिए अपनी झोली फैला दी और हमारा मेवा त्याग कर सूखी रोटी क्यों खा रहे हो?"


खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से,
बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही !!

सेठो और साहूकारों के तर्क सुन स्वामी जी मुस्कुरा कर बोले- "आप सबने तो अपनी अपार दौलत में से मात्र कुछ रत्न भेँट किए परन्तु इस माँ ने तो मुझे अपने मुँह का निवाला ही दे ड़ाला, धन्य हूँ मैं मुझे माँ का दुलार मिला| इस माँ की भेँट ही मेरे लिए अनमोल है, इस दुनिया में एक माँ ही है जो स्वयं भूखी रह कर अपना पेट काटकर औलाद को खाना खिलाती है पर औलाद क्या अपना फ़र्ज़ निभाती है..?"


आओ जाने मानव शरीर में चक्र क्या है ??

1 comment :


आइए समझें कि आखिर ये चक्र हैं क्या? मनुष्य के शरीर में कुल मिलाकर 114 चक्र हैं। वैसे तो शरीर में इससे कहीं ज्यादा चक्र हैं, लेकिन ये 114 चक्र मुख्य हैं। आप इन्हें नाड़ियों के संगम या मिलने के स्थान कह सकते हैं। यह संगम हमेशा त्रिकोण की शक्ल में होते हैं। वैसे तो ‘चक्र‘ का मतलब पहिया या गोलाकार होता है। चूंकि इसका संबंध शरीर में एक आयाम से दूसरे आयाम की ओर गति से है, इसलिए इसे चक्र कहते हैं, पर वास्तव में यह एक त्रिकोण है।


   



शरीर के सात मूल चक्र

अब सवाल यह है कि आखिर ये चक्र इस शरीर-प्रणाली में करते क्या हैं? मूल रूप से चक्र केवल सात हैं – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार। पहला चक्र है मूलाधार, जो गुदा और जननेंद्रिय के बीच होता है,स्वाधिष्ठान चक्र जननेंद्रिय के ठीक ऊपर होता है। मणिपूरकचक्र नाभि के नीचे होता है। अनाहत चक्र हृदय के स्थन में पसलियों के मिलने वाली जगह के ठीक नीचे होता है। विशुद्धिचक्र कंठ के गड्ढे में होता है। आज्ञा चक्र  दोनों भवों के बीच होता है। जबकि सहस्रार चक्र, जिसे ब्रम्हरंद्र्र भी कहते हैं, सिर के सबसे ऊपरी जगह पर होता है, जहां नवजात बच्चे के सिर में ऊपर सबसे कोमल जगह होती है।

सात चक्र :


1. मूलाधार चक्र :

यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9%
लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

2. स्वाधिष्ठान चक्र-

यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश
होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

3. मणिपुर चक्र :

नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो दस
कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी
रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।

प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो
जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना
जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं।
आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

4. अनाहत चक्र-

हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से
सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील
व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार,
इंजीनियर आदि हो सकते हैं।

प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार
समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है।
इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है।व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

5. विशुद्ध चक्र-

कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर
यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत
होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

6. आज्ञाचक्र :

भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में आज्ञा चक्र है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां
ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है
लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इस बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।

प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी
शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।

7. सहस्रार चक्र :

सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम
का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को
संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष का द्वार है।

स्त्री तब तक 'चरित्रहीन' नहीं हो सकती, जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो "- गौतम बुद्ध

2 comments :


चरित्र सौंदर्य में वृद्धि करता है। जैसे-जैसे स्त्री का यौवन ढलता है यह उसे मजबूत बनाता है। आचरण का एक ढंग, साहस का एक स्तर, अनुशासन, धैर्य और संपूर्णता एक स्त्री को सुन्दर बनाने में बड़ा योगदान दे सकते है।
– Jacqueline Bisset जैकलीन बिस्सेट


संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की। एक बार वह एक गांव में गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली- आप तो कोई राजकुमार लगते हैं। क्या मैं जान सकती हूं कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है? बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि तीन प्रश्नों के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया।

यह शरीर जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह वृद्ध होगा, फिर बीमार व अंत में मृत्यु के मुंह में चला जाएगा। मुझे वृद्धावस्था, बीमारी व मृत्यु के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है। उनसे प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई। गांववासी बुद्ध के पास आए व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं क्योंकि वह चरित्रहीन है।

बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा- क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है? मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली है। आप उसके घर न जाएं।

बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा और उसे ताली बजाने को कहा। मुखिया ने कहा- मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता क्योंकि मेरा दूसरा हाथ आपने पकड़ा हुआ है। बुद्ध बोले- इसी प्रकार यह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है जब तक इस गांव के पुरुष चरित्रहीन न हों। अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहां के पुरुष ज़िम्मेदार हैं। यह सुनकर सभी लज्जित हो गए।


शुभ अशुभ - हमारी सोच हमारे विचार

No comments :


शुभ अशुभ - हमारी सोच हमारे विचार



एक बार एक महिला ने स्वामी विवेकानंद से कहा, 'स्वामी जी, कुछ दिनों से मेरी बायीं आंख फड़क रही है। यह कुछ अशुभ घटने की निशानी है। कृपया मुझे कोई ऐसा तरीक़ा बताएं जिससे कोई बुरी घटना मेरे यहां न घटे।' उसकी बात सुन विवेकानंद बोले, 'देवी, मेरी नज़र में तो शुभ और अशुभ कुछ नहीं होता। जब जीवन है तो इसमें अच्छी और बुरी दोनों ही घटनाएं घटित होती हैं। उन्हें ही लोग शुभ और अशुभ से जोड़ देते हैं।' महिला बोली, 'पर स्वामी जी, मैंने अपने पड़ोसियों के यहां देखा है कि उनके घर में हमेशा शुभ घटता है। कभी कोई बीमारी नहीं, चिंता नहीं। जबकि मेरे यहां आए दिन कुछ न कुछ अनहोनी घटती रहती है।'

इस पर स्वामी जी मुस्करा कर बोले, 'शुभ और अशुभ तो सोच का ही परिणाम है। कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिसे केवल शुभ ही शुभ या केवल अशुभ कहा जा सके। जो आज शुभ मालूम पड़ती है, वही कल अशुभ हो सकती है। जैसे एक कुम्हार ने बर्तन बनाकर सुखाने के लिए रखे हैं और वह तेज धूप की कामना कर रहा है ताकि बर्तन अच्छी तरह सूखकर पक जाएं, दूसरी ओर एक किसान वर्षा की कामना कर रहा है ताकि फसल अच्छी हो। ऐसे में धूप और वर्षा जहां एक के लिए शुभ है, वहीं दूसरे के लिए अशुभ। यदि वर्षा होती है तो कुम्हार के घड़े नहीं सूख पाएंगे और यदि धूप निकलती है तो किसान की फसल अच्छी तरह नहीं पकेगी। इसलिए व्यक्ति को शुभ और अशुभ का ख़्याल छोड़कर केवल अपने नेक कर्मों पर ध्यान लगाना चाहिए। तभी जीवन सुखद हो सकता है।'

हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का धयान रखिये कि आप क्या सोचते हैं. शब्द गौण हैं. विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं.

गो हत्या रोकना - मुंशी प्रेमचंद

No comments :

मुंशी प्रेमचंद गोपालजी


प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं।मूल नाम धनपत राय वाले प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंदके नाम से भी जाना जाता है। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के  विख्यात उपन्यासकारशरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था।

प्रसिद्ध उपन्यास-लेखक मुंशी प्रेमचंद जी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में अध्यापक थे। उन्होंने अपने यहां गाय पाल रखी थीं। एक दिन एक गाय घास खाते हुए अंग्रेज़ जिलाधीश के आवास के बाहर वाले उद्यान में चली गईं।


अभी वह गाय वहां जाकर खड़ी ही हुई थी कि वह अंग्रेज़ बंदूक लेकर बाहर आ गया और उसने गुस्से से आग बबूला होकर बंदूक में गोली भर ली। उसी समय अपनी गाय को खोजते हुए प्रेमचंद वहां पहुंच गए।


अंग्रेज़ ने कहा कि 'इस गाय ने मेरे उधान का नुक्सान किया है यह गाय अब तुम यहां से ले नहीं जा सकते। तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम अपने जानवर को मेरे उद्यान में ले आए। मैं इसे अभी गोली मार देता हूं तभी तुम काले लोगों को यह बात समझ में आएगी कि हम यहां हुकूमत कर रहे हैं।' और उसने भरी बंदूक गाय की ओर तान दी।


प्रेमचंद ने नरमी से उसे समझाने की कोशिश की, 'महोदय! इस बार गाय पर मेहरबानी करें। दूसरे दिन से इधर नहीं आएगी। मुझे ले जाने दें साहब। यह ग़लती से यहां आई।' फिर भी अंग्रेज़ गुस्से में यही कहता रहा, 'तुम काला आदमी ईडियट हो- हम गाय को गोली मारेगा।' और उसने बंदूक से गाय को निशान बनाना चाहा।


प्रेमचंद झट से गाय और अंग्रेज़ जिलाधीश के बीच में आ खड़े हुए और गुस्से से बोले, 'तो फिर चला गोली। देखूं तुझमें कितनी हिम्मत है। ले। पहले मुझे गोली मार।' फिर तो अंग्रेज़ बंदूक की नली नीची करते हुए अपने बंगले में चला गया।


भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है । ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का निवास है । यही कारण है कि दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रुंगार किया जाता है ।प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी । युद्ध के दौरान स्वर्ण, आभूषणों के साथ गायों को भी लूट लिया जाता था । जिस राज्य में जितनी गायें होती थीं उसको उतना ही सम्पन्न माना जाता है । कृष्ण के गाय प्रेम को भला कौन नहीं जानता । इसी कारण मुंशी प्रेमचंद जी का एक नाम गोपाल भी है ।

सलमान को हुई 5 साल की सजा

No comments :

सलमान को हुई 5 साल की सजा 

बॉलीवुड के दबंग टाइगर सलमान खान को 1998 के काले हिरण के शिकार मामले में गुरुवार को जोधपुर की स्पेशल कोर्ट ने 5 साल की सजा सुनाई है. साथ ही कोर्ट ने 10 हजार का जुर्माना भी लगाया है। जबकि चार अन्य सह आरोपी फिल्मी सितारे सोनाली बेंद्रे, सैफ अली खान, तब्बू और नीलम को बरी कर दिया गया। सलमान को कानून द्वारा प्रतिबंधित दो काले हिरणों के शिकार के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 9/51 के तहत दोषी पाया गया। घटना बॉलीवुड फिल्म 'हम साथ साथ हैं' की शूटिंग के दौरान अक्टूबर 1998 को जोधपुर के समीप गांव में हुई थी।





सलमान को जोधपुर सेंट्रल जेल ले जाया गया है। 

अभिनेता के पक्ष का प्रतिनिधित्व वकील हस्तिमल सारस्वत कर रहे थे। सलमान को यह फैसला मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी देव कुमार खत्री ने सुनाया। इस दौरान सलमान की बहन अलविरा और अर्पिता भी मौजूद थीं। मामले की सुनवाई पिछले 19 साल से चल रही थी और अदालत ने 28 मार्च की हुई अंतिम बहस के बाद आदेश को सुरक्षित रख लिया था। जीव रक्षा बिशनोई सभा ने अन्य आरोपियों को बरी करने के फैसले का विरोध किया है। संगठन के राज्य अध्यक्ष शिवराज बिशनोई ने कहा कि इन्हें बरी करने के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी।

कहीं खुशी तो कहीं गम

सजा के एलान के बाद, जोधपुर कोर्ट से जैसे ही सलमान खान बाहर निकले उनके समर्थकों ने सलमान खान जिंदाबाद के नारे लगाए। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को हल्के बल का प्रयोग करना पड़ा।सलमान को सजा मिलने के बाद जहां एक तरह उनके फैन्स उदास हैं तो वहीं, दूसरी तरफ विश्नोई समाज में खुशी की लहर है। सजा के ऐलान के बाद ही विश्नोई समाज के लोगों ने जोधपुर कोर्ट के बाहर पटाखे फोड़कर जश्न मनाया। इस दौरान विश्नोई समाज के कुछ लड़के नाचते हुए और सलमान खान के खिलाफ नारेबाजी करते हुए नजर आए. 

कौन है लालू प्रसाद और राबड़ी देवी की होने वाली बड़ी बहू?

No comments :

कौन है लालू प्रसाद और राबड़ी देवी की होने वाली बड़ी बहू?


बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव की जल्द ही शादी होने वाली है। उनकी शादी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय के बेटे एवं राजद के विधायक चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या राय के साथ होने जा रही है जिसकी पुष्टि चंद्रिका राय ने की है। इससे पहले तेजप्रताप की शादी को लेकर उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के बेटे की शादी के दौरान खूब चर्चा हुई थी।


पहले भी आयी थी चर्चा में तेजप्रताप की शादी


तेजप्रताप की शादी की तब काफी चर्चा हुई थी जब सुशील मोदी के बेटे की शादी में उन्होंने हंगामा करने की धमकी दी थी और खुद की शादी से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए तेज प्रताप ने कहा था कि वे अपने लिए दुल्हन ढूंढने की जिम्मेदारी सुशील मोदी को सौंपते हैं। तेज प्रताप ने कहा था कि बच्चों के लिए दुल्हन ढूंढने की जिम्मेदारी घर के बड़े-बुजुर्गों की होती है और ऐसे में वह यह जिम्मेदारी सुशील मोदी को सौंप रहे हैं।

18 अप्रैल को तेज प्रताप और एश्वर्या की सगाई होगी। इसके लिए पटना का मौर्य होटल बुक किया गया है। अगले महीने 12 मई को वेटनरी कॉलेज में शादी का कार्यक्रम हो सकता है। वहीं लालू प्रसाद का इलाज एम्स में हो रहा है।


बोली एक अनमोल है

1 comment :
                                     

एक बार भगवान बुद्ध एक वृक्ष के नीचे एकाग्रचित्त बैठे हुए थे। उनसे द्वेष रखने वाला एक कुटिल व्यक्ति उधर से गुज़रा, उसने वृक्ष के पास खड़े होकर बुद्ध के प्रति अपशब्दों का उच्चारण किया। बुद्ध मौन रहे। उन्हें शांत देखकर वह वापस लौट आया। रास्ते में उसकी अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा कि एक शांत बैठे साधु को गाली देने से क्या मिला?



     बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
      जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।


अर्थ : जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.

वह दूसरे दिन फिर से बुद्ध के पास पहुंचा। हाथ जोड़कर बोला, मैं कल अपने द्वारा किए गए व्यवहार के लिए क्षमा मांगता हूं।
बुद्ध ने कहा, मैं कल जो था, आज वैसा नहीं हूं। तुम भी वैसे नहीं हो, क्योंकि जीवन प्रतिपल बीत रहा है। नदी के एक ही पानी में दोबारा नहीं उतरा जा सकता। जब वापस उतरते हैं, तो वह पानी बहकर आगे चला जाता है।

तुमने कल क्या कहा, मुझे नहीं मालूम, और जब मैंने कुछ सुना ही नहीं, तो ये शब्द तुम्हारे पास वापस लौट गए। बुद्ध के शब्दों ने उसे सहज ही वाणी के संयम का महत्व बता दिया।

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

गधा और जौहरी

No comments :

गधा और जौहरी

 एक प्राचीन कथा है जंगल की राह से एक जौहरी गुजरता था। देखा उसने राह में, एक कुम्हार अपने गधे के गले में एक बड़ा हीरा बांधकर चल रहा है। चकित हुआ! पूछा कुम्हार से, कितने पैसे लेगा इस पत्थर के? कुम्हार ने कहा, आठ आने मिल जाएं तो बहुत। लेकिन जौहरी को लोभ पकड़ा।

           उसने कहा, चार आने में दे–दे, पत्थर है, करेगा भी क्या? पर कुम्हार भी जिद बांधकर बैठ गया, छह आने से कम न हुआ तो जौहरी ने सोचा कि ठीक है, थोड़ी देर में अपने आप आकर बेच जाएगा। वह थोड़ा आगे बढ़ गया। लेकिन कुम्हार वापस न लौटा तो जौहरी लौटकर आया; लेकिन तब तक बाजी चूक गई थी, किसी और ने खरीद लिया था। तो पूछा उसने कि कितने में बेचा? उस कुम्हार ने कहा कि हुजूर, एक रुपया मिला पूरा।

                            आठ आने में बेच देता, छह आने में बेच देता, बड़ा नुकसान हो जाता। उस जौहरी की छाती पर कैसा सदमा लगा होगा! उसने कहा, मूर्ख! तू बिलकुल गधा है। लाखों का हीरा एक रुपए में बेच दिया? उस कुम्हार ने कहा, हुजूर मैं अगर गधा न होता तो लाखों के हीरे को गधे के गले में ही क्यों बांधता? लेकिन आपके लिए क्या कहें? आपको पता था कि लाखों का हीरा है और पत्थर की कीमत में भी लेने को राजी न हुए! धर्म का जिसे पता है, उसका जीवन अगर रूपांतरित न हो तो उस जौहरी की भांति गधा है।
                   
                                                                             जिन्हें पता नहीं है, वे क्षमा के योग्य हैं; लेकिन जिन्हें पता है, उनको क्या कहें? दो ही संभावनाएं हैं या तो उन्हें पता ही नहीं है; सोचते हैं, पता है। और यही संभावना ज्यादा सत्यतर मालूम होती है। या दूसरी संभावना है कि उन्हें पता है और फिर भी गलत चले जाते हैं। वह दूसरी संभावना संभव नहीं मालूम होती। जौहरी ने तो शायद चार आने में खरीद लेने की कोशिश की हो लाखों के हीरे को, लेकिन धर्म के जगत में यह असंभव है कि तुम्हें पता हो और तुम उससे विपरीत चले जाओ। सुकरात का बड़ा बहुमूल्य वचन है: ज्ञान ही चरित्र है। जिसने जान लिया, वह बदल गया। और अगर जानकर भी न बदले हो, तो समझना कि जानने में कहीं खोट है|