काम करने से इंसान छोटा नहीं बनता
स्वर्गीय पंडित नेहरू आयु से वयोवृद्ध होते हुए भी मन से एक स्वयं सेवक भी थे। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने का गौरव माननीय पंडित जवाहरलाल नेहरू जी को प्राप्त है उन्होने पहले प्रधानमंत्री के रूप में पदभार 15 अगस्त 1947 को देश के अज़ाद होते ही सम्भाला तथा लगातार 17 वर्ष तक अपनी सेवा देने के पश्चात 14 मई 1962 को उनकी मृत्यु हो गई उनकी अकस्मात मृत्यु के कारण गुलजारीलाल नंदा ने पद को (एज़ एन एक्टिंग पी.एम.) के रूप में सम्भाला तथा 15 दिन बाद लाल बहादुर शस्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने स्वयंसेवक ही थे।जवाहरलाल नहरू के जन्म दिवस को बाल दिवस (बाल दिवस हर वर्ष 14 नवम्बर को मनाया जाता है)।
एक बार जब वे प्रधान मंत्री कुछ लोग उनसे मिलने आये। आने वालों की संख्या अधिक थी और कुर्सियां कम। जब वे उस कमरे में आये तो देखा कि कुछ लोग खड़े है। उनके बैठने के लिये कुर्सियां नहीं हैं और कोई उधर ध्यान भी नहीं दे रहा है।वे तुरन्त अन्दर के कमरे में गये और एक कोच को उठाने लगे। तत्काल कई नौकर दौड़ पड़े और उन्हें उठाने के लिये मना करने लगे वे उसे खींच ही लाये, यह कहते हुए कि “घर आये हुए मेहमानों के स्वागत के लिये, हर कार्य करना अपना धर्म है। काम करने से इंसान छोटा नहीं बनता।”
एक बार जब वे प्रधान मंत्री कुछ लोग उनसे मिलने आये। आने वालों की संख्या अधिक थी और कुर्सियां कम। जब वे उस कमरे में आये तो देखा कि कुछ लोग खड़े है। उनके बैठने के लिये कुर्सियां नहीं हैं और कोई उधर ध्यान भी नहीं दे रहा है।वे तुरन्त अन्दर के कमरे में गये और एक कोच को उठाने लगे। तत्काल कई नौकर दौड़ पड़े और उन्हें उठाने के लिये मना करने लगे वे उसे खींच ही लाये, यह कहते हुए कि “घर आये हुए मेहमानों के स्वागत के लिये, हर कार्य करना अपना धर्म है। काम करने से इंसान छोटा नहीं बनता।”
अमेरिका राष्ट्रपति आइजनहावर के पास एक झाडू
आइजनहावर जब अमेरिका के 34 वे राष्ट्रपति बने तो उनके शो केस में एक झाडू भी रखती थी। आगन्तुकों को यह देखकर आश्चर्य होता था। एक बार स्वयं आइजनहावर ने इसका रहस्य खोला।
‘मैंने अपने चुनाव के भाषणों में कहा था कि राष्ट्रपति बन जाने पर मैं राष्ट्र की गन्दगी दूर करूंगा। राष्ट्रपति बनने पर मुझे जो विविध उपहार मिले उसमें यह झाडू भी थी। उपहार भेजने वाले ने इसके साथ यह टिप्पणी भेजी थी कि मुझे विश्वास है यह झाडू सदैव आपका कर्त्तव्य स्मरण कराती रहेगी। यही उपहार मुझे सबसे अच्छा लगा, प्रेरणास्पद लगा इसलिए मैंने इसे शो केस में रखवा दिया है।
मधु के तालाब की खोज
मधुमक्खी उड़ती-उड़ती एक फूल पर जा बैठी और मकरन्द चूसने लगी। एक तितली भी वही मँडरा रही थी, उसने पूछा- “बहन, यह क्या कर रही हो, हमें भी तो बताओ?”
मधुमक्खी ने कहा- “मधु इकट्ठा कर रही हूँ और फिर अपने काम में जुट गई।’’
तितली हँस कर बोली- “बहन तुम भी कितनी नादान हो। छोटे से फूल में कहीं मधु रखा है, बेकार समय और शक्ति खराब कर रही हो? आओ हम दोनों चल कर कहीं मधु के तालाब की खोज करें।
मधुमक्खी कुछ न बोली, चुपचाप अपने काम में लगी रही। तितली सारा वन छानती रही।
शाम को दोनों घर लौटीं तो मधुमक्खी के पास मधु का ढेर जमा था और तितली खाली हाथ लौट रही थी।
इस कहानी से हमे ये शिक्षा मिलती है, हमे किसी का मजाक नही बनना चाहिए।
इस कहानी से हमे ये शिक्षा मिलती है, हमे किसी का मजाक नही बनना चाहिए।
डाकू अंगुलिमाल और महात्मा बुद्ध
भगवान बुद्ध एक बार निबिड़ वन को पार करते हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी भेंट अंगुलिमाल डाकू से हो गई। वह सदैव अनेक निर्दोषों का वध करके उनकी उंगलियों की माला अपने गले में धारण किया करता था। आज सामने आये हुए साधु को देखकर उसकी बाछें खिल उठीं।
“आज आप ही मेरे पहले शिकार होंगे” अँगुलिमाल ने बुद्ध से कहा और अपनी पैनी तलवार म्यान से बाहर निकाली।
तथागत मुसकराये, उनने कहा—”वत्स, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। मैं कहीं भागने वाला नहीं हूँ। दो क्षण का विलम्ब सहन कर सको तो मेरी एक बात सुन लो।”
डाकू ठिठक गया, उसने कहा—”कहिए—क्या कहना है?”
तथागत ने कहा—”सामने वाले वृक्ष से एक पत्ता तोड़कर जमीन पर रख दो।” डाकू ने वैसा ही कर दिया। उन्होंने फिर कहा—”अब इसे पुनः पेड़ से जोड़ दो।” डाकू ने कहा—यह कैसे संभव है। तोड़ना सरल है पर उसे जोड़ा नहीं जा सकता।
बुद्ध ने गंभीर मुद्रा में कहा—वत्स, इस संसार में मार-काट तोड़-फोड़ उपद्रव और विनाश यह सभी सरल हैं। इन्हें कोई तुच्छ व्यक्ति भी कर सकता है फिर तुम इसमें अपनी क्या विशेषता सोचते हो और किस बात का अभिमान करते हो? बड़प्पन की बात निर्माण है—विनाश नहीं। तुम विनाश के तुच्छ आचरण को छोड़कर निर्माण का महान कार्यक्रम क्यों नहीं अपनाते?
अंगुलिमाल के अन्तःकरण में वे शब्द तीर की तरह घुसते गये। तलवार उसके हाथ से छूट पड़ी। कातर होकर उसने तथागत से पूछा—”इतनी देर तक पाप कर्म करने पर भी क्या मैं पुनः धर्मात्मा हो सकता हूँ?” वे बोले—”वत्स, मनुष्य अपने विचार और कार्यों को बदल कर कभी भी पाप से पुण्य की ओर मुड़ सकता है। धर्म का मार्ग किसी के लिए अवरुद्ध नहीं है। तुम अपना दृष्टिकोण बदलोगे तो सारा जीवन ही बदल जायगा।” विचार बदले तो मनुष्य बदला। अँगुलिमाल ने दस्यु कर्म छोड़कर प्रव्रज्या ले ली। वह भगवान बुद्ध के प्रख्यात शिष्यों में से एक हुआ।
Subscribe to:
Posts
(
Atom
)



