जाने मकर संक्रांति पर कैसे की जाती है पूजा ,सुहागिन औरतें क्या करती है पति की लंबी आयु के लिए
मकर संक्रांति हिंदुओ का प्रमुख तत्यौहार मैं से एक है । नए साल की शुरुआत के बाद सबसे पहला त्यौहार होने के कारण इस त्यौहार को बड़े जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है। भारत में मकर संक्रांति हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहेल 13 जनवरी की रात में लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है। लोहड़ी का त्यौहार हरियाणा ओर पंजाब मैं मनाया जाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़ ,चावल और भुने हुए मक्का की अग्नि देवता को अहुती दी जाती है तिल से बनी हुई गजक और मुंगफली आपस में बाँँट कर खुशियां मनाते हैं।मकर संक्रांति के त्यौहारों को पूरे भारत में अलग अलग नामो से मनाया जाता है।
मकर संक्रांति पर कैसे की जाती है पूजा
1. मकर संक्राति को स्नान ,जप, तप ओर दान का अपना विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए इस दिन गंगा स्नान ओर सागर स्नान करना चाहिए। जो लोग गंगा स्नान के लिए नही जा परे हैं उन्हें घर पर गंगाजल को जल में मिलकर गंगा माँ का ध्यान करते हुए स्नान करना चाहिए। इस दिन तीर्थो एवं पवित्र नदियों में स्नान का महत्व इसलिये ज्यादा माना जाता है क्योंकि इस दिन सभी देवी देवता अपना रूप बदलकर संगम प्रयाग (गंगा-यमुना सरस्वती) पर स्नान करने आते हैं। मकर संक्राति के दिन ही गंगा जी भागीरथ के पीछे पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जा मिली थी।
2. मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य देव की पूजा उपासना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की मकर राशि में प्रवेश करते हैं , शनि मकर राशि के स्वामी होने के कारण इस त्यौहार को "मकर संक्रांति " के नाम से जाना जाता है। सूर्य भगवान की पूजा मैं सफेद और लाल रंग का विशेष महत्व होता है। सूर्य भगवान को लाल रंग का जल का अर्घ दिया जाता है।
3. इस समय सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए सुहाग का सामान दान करती हैं ।साथ ही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल ,एवं राशि दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है। अलग अलग मान्यताओं के अनुसार त्यौहार के पकवान भी अलग अलग होते हैं। दाल ओर चावल की खिचड़ी इस त्यौहार की प्रमुख पहचान बन गयी है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का भी विशेष महत्व है।
4. मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने का विशेष महत्व होता है जिससे इस त्यौहार को मनाने का और भी उत्साह बड़ जाता है।
महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्याग ने के लिए भी मकर संक्रांति का दिन चुना था। क्योंकि दरअसल भीष्म पितामह पुरणों के बहुत बड़े ज्ञाता थे। भीष्म जब महाभारत युद्ध के दसवें दिन घायल होकर गिर पड़े थे तो उस समय सूर्य दक्षिणायन था ,इसलिए वो परलोक नहीं जाना चाहते थे। उन्हें पिता शांतुन से इच्छा मृत्यु वरदान मिला हुआ था। लिहाजा वे अर्जुन द्वारा बनाई गई शैया पर लेटे रहे जब सूर्य उत्तरायण हो गए तब महा मास शुक्ल पक्ष की अष्ठमी तिथि को नारकातारी में अपने प्राण त्यागे ।
2. मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य देव की पूजा उपासना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की मकर राशि में प्रवेश करते हैं , शनि मकर राशि के स्वामी होने के कारण इस त्यौहार को "मकर संक्रांति " के नाम से जाना जाता है। सूर्य भगवान की पूजा मैं सफेद और लाल रंग का विशेष महत्व होता है। सूर्य भगवान को लाल रंग का जल का अर्घ दिया जाता है।
3. इस समय सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए सुहाग का सामान दान करती हैं ।साथ ही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल ,एवं राशि दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है। अलग अलग मान्यताओं के अनुसार त्यौहार के पकवान भी अलग अलग होते हैं। दाल ओर चावल की खिचड़ी इस त्यौहार की प्रमुख पहचान बन गयी है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का भी विशेष महत्व है।
4. मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने का विशेष महत्व होता है जिससे इस त्यौहार को मनाने का और भी उत्साह बड़ जाता है।
देह त्याग ने के लिए भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति का दिन चुना
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