एकादशी क्यों मानयी जाती है ?

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                        🌸एकादशी महत्व🌸


राजा अंबरीश भगवान श्री विष्णु के महान भक्त थे, उनकी महानता की कीर्ति तीन लोक तक फैली हुई थी, एक बार एक ऐसी एकादशी आयी जिसमें राजा अंबरीश ने भी एकादशी का व्रत किया। और दूसरे दिन द्वादशी राजा अंबरीश ने नगर के सभी साधुजनों ब्राम्हणों को भोजन के लिए आमंत्रित किया। तभी वहाॅ दुर्वासा मुनि ऋषि आ गये। दुुर्वासा मुनि को आते देख राजा ने दुर्वासा मुनि से आग्रह किया कि आप में भोज स्वीकार करें।





दुर्वासा मुनि ने राजा अंबरीश का आमंत्रण स्वीकार कर लिया। और राजा से कहा कि हम नदी से स्नान करके आते है, तब तक हमारे आने की प्रतीक्षा करे इतना कह दुर्वासा मुनि स्नान को चले गये। काफी समय व्यतीत हो गया। लेकिन दुर्वासा मुनि नहीं आये। दुर्वासा मुनि मनमौजी ऋषि थे, कई बार यमजान को भोजन तैयार करने कह कर चले जाते थे, और लौटकर आते भी नहीं थे। दुर्वासा मुनि को आने मे देर होने के कारण व्रत तोड़ने का मुहूर्त निकाला जा रहा था, तभी राजा अंबरीश के गुरू एवं वरिष्ठजनों ने कहा हे राजन आप तुलसी के पत्ते का ग्रहण कर अपना व्रत तोड़ लीजिए। गुरू की बात मान राजा जैसे ही तुलसी पत्ते को ग्रहण किया। उसी समय वहाॅ दुर्वासा मुनि पहुच गये। अंबरीश को वक्त तोड़ते देख दुर्वासा मुनि अत्यधिक क्रोध में आ गये। और कहने लगे अंबरीश तुमने ब्राम्हणों का अपमान किया है। अपना वचन तोड़ा है स्वंय पहले भोजन ग्रहण कर हमे झूठा भोजन दोगे। राजा अंबरीश कहते है, हे मुनि जी मैंने भोजन नहीं ग्रहण किया है, व्रत का समय निकाला जा रहा था। इस हेतु तुलसी के पत्ते से अपना व्रत तोड़ा है, दुर्वासा मुनि बहुत ही गुस्से वाले थे, वे तो अपने क्रोध में राजा अंबरीश को श्राप देने लगे। अंबरीश दुर्वासा मुनि में क्षमा मांगते रहे लेकिन दुर्वासा मुनि तो श्राप देने की जिद ही पकड़ ली थी।

जैसे ही दुर्वासा मुनि श्राप देने वाले तभी राजा ने भगवान विष्णु का स्मरण करने लगे। "ऊ नमो नारायण" भक्त को संकट में देख भगवान श्री हरि ने अपने परम धाम से भक्त की रक्षा हेतु सुदर्शन चक्र छोड़ा। और आदेश दिया कि जाओं मेरे भक्त का अहित करने वाले का वध कर दो। सुदर्शन चक्र चलता हुआ दुर्वासा मुनि के पास पहुचा सुदर्शन चक्र देख दुर्वासा मुनि श्राप देना भूल गये और जान बचाने भागने लगे। जहाॅ-जहाॅ दुर्वासा मुनि जाते सुदर्शन चक्र भी उनके पीछे जाता। दुर्वासा जान बचाने ब्रम्हा जी के पास गये और जान बचाने हेतु सहायता मांगने लगे। ब्रम्ह जी  दुर्वासा मुनि से कहते है, सुदर्शन को रोक पाने का सामर्थ्य मेरे में नहीं है। इसलिये आप शिव जी के पास जाये और उनसे सहायता मांगे, क्योंकि सुदर्शन चक्र उनका ही दिया अस्त्र है। ब्रम्हा जी की बात मान दुर्वासा मुनि शिव जी के पास पहुचे। शिव जी के पास आ जान बचाने के लिये सहायता मांगने लगे । शिव जी ने भी हाथ खड़े कर दिये और कहने लगे मैंने तो सुदर्शन चक्र नारायण को दे दिया है। इसलिए अब वहीं इसके स्वामी है, अब सुदर्शन को श्री हरि ही रोक सकते है। इसलिए आप श्री हरि के पास जाये। दुर्वासा वहा से भागे भागे भगवान श्री हरि के धाम आये और उनके चरणों में गिरकर जान बचाने के लिए क्षमा याचना करने लगे। भगवान श्री हरि ने कहा मै स्वंय भी तुम्हारी रक्षा नही कर पाऊंगा | क्योंकि तुमने मेरे भक्त का अपमान किया है, इसलिये पहले तुम जाओं राजा अंबरीश से क्षमा मांगो। उसके बाद मैं भी क्षमा करूंगा।

दुर्वासा मुनि ने अंबरीश से क्षमा मांगी, तब जाकर श्री हरि ने भी दुर्वासा मुनि को माफ किया और सुदर्शन चक्र ने वापस ले लिया। दुर्वासा मुनि कहते है प्रभु ये आपकी कैसी लीला तब भगवान श्री हरि दुर्वासा मुनि से कहते है राजा अंबरीश मेरा परम भक्त है और आज वो एकादशी का व्रत किया है और जो भी मेरे एकादशी का व्रत करता है मेरे नाम का स्मरण करता है उसकी रक्षा मैं स्वंय करता हूॅ। दुर्वासा मुनि भी समझ गये कि एकादशी का कितना महत्व है।

                           !! जय श्री कृष्णा!!

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