परमा एकादशी
🌸परमा एकादशी🌸
काम्पिल्य नगर में सुमेधा नामक एक ब्राम्हण रहा करता था, वह ब्राम्हण बहुत गरीब था, जब भी वह नगर भिक्षा मांगने जाता उसे कोई भी भिक्षा नहीं देता। उस ब्राम्हण की पत्नी अपने पति की बहुत सेवा करती थी, दोनों ही बड़ी कठिनाई से जीवन यापन करते थे।
एक दिन ब्राम्हण सुमेधा अपनी पत्नी से कहता है - मैं जब भी किसी धनवान से धन की भिक्षा मांगता हूॅ, तो मुझे मना कर देते है। जीवन यापन करने के लिए धन की आवश्यकता है, मेरे एक सुझाव है यदि तुम मेरे निर्णय से सहमत हो तो मैं अन्यत्र परदेस जाकर कुछ काम कर लूंगा।
ब्राम्हण की पत्नी कहती है - हे स्वामी मैं आपकी दासी हूॅ, आपका कही हुई बातो का पालन करना मेरा धर्म है, लेकिन यह हमारे शायद किसी पूर्व जन्म के किये हुए कर्माे का ही फल है। जो हमें इस जन्म में भोगना पड़ रहा है, भगवान नें जो भाग्य में लिखा है उसे कोई नहीं बदल सकता। और मैं आपके वियोग में अकेले नहीं रह पाऊंगी। पति के बिना एक स्त्री की सभी निंदा करते है, इसलिए आप कृपा कर यही रहिये। जो हमारे भाग्य में होगा वहीं प्राप्त होगा। इसलिए यदि आपको दान में कोई केवल अन्न करता है धन नहीं करता तो निराश मत होये हम इसी तरह अपना जीवन यापन कर लेंगे।
अपनी पत्नी की सलाह मान वह ब्राम्हण नहीं गया है, इसी तरह धीर - धीर समय बीतता गया। एक बार हुआ कि वह ब्राम्हण अपनी पत्नी सहित भिक्षा मांगते हुए ऋषि कौण्डिन्य के आश्रम पहुचा। कौण्डिन्य ऋषि को देख ब्राम्हण और उसकी पत्नी नें प्रणाम कर कहने लगे - आज आपके दर्शन कर हमारा जीवन सफल हो गया, दोनों पति-पत्नी को ऋषि कौण्डिन्य मुनि ने भी आदरपूर्वक आश्रम में आसन प्रदान कर उन्हें भोजन कराया। भोजन करने के उपरांत ब्राम्हण की पत्नी नें कहाॅ - हे ऋषिवर, हमारे जीवन में बहुत ही दुःख, दरिद्रता है, हमेशा धन का अभाव रहता है, अतः कृपा कर हमे कोई ऐसा उपाय बताये जिससे हमारा दुःख, दरिद्रता समाप्त हो और हम भी सुखपूर्वक जीवन यापन कर सकें।
कौण्डिन्य ऋषि कहते है - आप दोनों अधिकमास में आने वाली परमा (पदमा) एकादशी का व्रत करें। इस एकादशी के प्रभाव सें मनुष्य के पूर्व सभी जन्मों के पापकर्म, दुख, दरिद्रता आदि समाप्त हो जाते है, यह व्रत तुम्हें अवश्य करना चाहिए। भगवान शिव नें इसी व्रत के फलस्वरूप कुबेर को धनाध्यक्ष बना दिया था, और इस व्रत के प्रभाव से ही राजा हरिषन्द्र को पुत्र और राज्य की प्राप्ति हुई थी।
इस प्रकार कौण्डिन्य ऋषि ने उन्हें एकादशी व्रत का महत्व व विधि बताया| ऋषि के बताये अनुसार - ब्राम्हण और उसकी पत्नी ने इस एकादशी व्रत किया। व्रत के पूर्ण होने पर कुछ ही दिनों बाद ही उनके यहाॅ एक राजकुमार आया। उस राजकुमार नें ब्राम्हण को एक समस्त वस्तुओं के साथ घर भेट किया। और साथ ही उनके आजीविका चालने का भी प्रबंध किया। तो इस प्रकार एकादशी व्रत के फल से ब्राम्हण की दुख, दरिद्रता समाप्त हो गई, और वें सुखपूर्वक जीवन यापन करने लगे, व्रत का फल अवश्य मिलता है चाहे वह किसी भी रूप में मिले।
ईश्वर के प्रति श्रद्धा, ब्राम्हणों, ऋषि-मुनि, व बड़ों का सम्मान करने वाले मनुष्यों पर भगवान सदैव अपनी कृपा बनायें रखते है। कई बार ऐसा होता है, कि विपरीत समय पर मनुष्य हताशा हो जाता है लेकिन ऐसे समय पर भी श्रद्धा बनाये रखने वालो का साथ ठाकुर जी कभी नहीं छोड़ते।
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)

No comments :
Post a Comment