शालिग्राम शिला से कैसे प्रकट हुए "राधारमण जी "
!! श्री राधारमण जी !!
श्री गोपाल भट्ट गोस्वामीजी का जीवन परिचय
गोपाल भट्ट गोस्वामी का जन्म संवत् 1425 में (सन् 1503 ई॰ में)विक्रमी में कावेरी नदी के तट पर श्री रंग के पास बेलगुड़ी ग्राम में श्री वैंकट भट्ट के पुत्र के रूप मे हुआ था।जब गोरांग दक्षिण यात्रा करते हुए श्रीरंग आये तो वेंकट भट्ट के यहाँ चातुर्मास व्यतीत किया था।गोपाल भट्ट की सेवा से प्रसन्न हो इन्हें दीक्षा दी तथा जाते समय विवाह न करने पर अध्ययन और माता पिता की सेवा करने का उपदेश दिया। गोस्वामी जी माता पिता की मृत्यु के बाद वृंदावन आये। श्रीगौरांग के अप्रकट होने पर वृद्ध गोस्वामीयो के विशेष आग्रह पर यह आसन पर बैठे। उत्तरी तथा पश्चिमी भारत के बहुत से लोग इनके शिष्य हुए। इसके अनंतर यह यात्रा को निकले। अपनी यात्रा के दौरान गंडकी नदी गए वहाँ से एक शलिग्राम शिला ले आये और उसकी निरंतर पूजा करने लगे । उनकी पूजा के कारण शालिग्राम शिला राधारमण जी मैं परवर्तित हुये। श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शियाओं मैं से एक थे। वे वृंदावन के प्रसिद्ध 6 गोस्वामी मैं से एक थे।
गोपाल भट्ट गोस्वामी का जन्म संवत् 1425 में (सन् 1503 ई॰ में)विक्रमी में कावेरी नदी के तट पर श्री रंग के पास बेलगुड़ी ग्राम में श्री वैंकट भट्ट के पुत्र के रूप मे हुआ था।जब गोरांग दक्षिण यात्रा करते हुए श्रीरंग आये तो वेंकट भट्ट के यहाँ चातुर्मास व्यतीत किया था।गोपाल भट्ट की सेवा से प्रसन्न हो इन्हें दीक्षा दी तथा जाते समय विवाह न करने पर अध्ययन और माता पिता की सेवा करने का उपदेश दिया। गोस्वामी जी माता पिता की मृत्यु के बाद वृंदावन आये। श्रीगौरांग के अप्रकट होने पर वृद्ध गोस्वामीयो के विशेष आग्रह पर यह आसन पर बैठे। उत्तरी तथा पश्चिमी भारत के बहुत से लोग इनके शिष्य हुए। इसके अनंतर यह यात्रा को निकले। अपनी यात्रा के दौरान गंडकी नदी गए वहाँ से एक शलिग्राम शिला ले आये और उसकी निरंतर पूजा करने लगे । उनकी पूजा के कारण शालिग्राम शिला राधारमण जी मैं परवर्तित हुये। श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शियाओं मैं से एक थे। वे वृंदावन के प्रसिद्ध 6 गोस्वामी मैं से एक थे।
शालिग्राम शिला मैं से कैसे प्रकट हुए "राधारमण जी "
श्री भट्टगोस्वामी पहले एक शालग्राम शिला की सेवा करते थे।कुछ लोगों का मानना है , कि एक बार दिल्ली का कोई सेठ वृंदावन मैं घूमने आए थे। सेठ ने वृंदावन के सभी मंदिरों में गौस्वामीयो से ठाकुर जी को पोशाक पहनाने की इच्छा जताते हुए ठाकुर जी का नाप लेना शुरू कर दिया।जैसे ही सेठ गोपाल भट्ट जी गोस्वामीजी के पास पहुँचे ,उस समय गोपाल भट्ट गौस्वामी जी आपने ध्यान मुद्रा में थे तभी सेठ ने गोस्वामी जी से उनके शालिग्राम शिला ठाकुर जी का पोशाक का नाप जानना चाहा तो गोस्वामी जी ने सेठ को हथेली भर हाथ से नाप का इशारा करने हुए बोला, सेठ ने सोचा कि हथेली भर के नाप की पोशाक बनवानी होगी। सेठ को ये पता नही था श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी के उपास्य ठाकुर जी का रूप एक शमिग्राम शिला के रूप में है। गोस्वामीजी को भी यही लगा कि हथेली भर कपड़ा मेरे ठाकुर जी के लिए हो जाएगा। शालिग्राम शिला का रूप सभी जानते हैं उनके लिए आज भी हथेली भर कपड़ा ही उनकी पोशक के लिये हो जाता है ।कुछ समय बिताने के पश्चात जब सेठ दुबारा वृंदावन पहुंचे तो उन्होंने सभी मंदिरों में पोशाक बाटना शुरू कर दिया।धीरे-धीरे सेठ पोशाक मंदिरों में देते हुए जब श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी के पास पहुंचे तो सेठ ने गोस्वामी जी को जब हथेली भर नाप की पोशाक दी तो गोस्वामी जी बहुत अचंभित हुये,ओर पोषक को देखने लगे।सेठ ने तभी पूछा गोस्वामी जी से पूछा आप को पोशाक अच्छी तो लगी । तभी गोस्वामी जी मुस्काते हुये सेठ को बोलते हैं बहुत सुंदर बहुत अच्छी है। पर गोस्वामी जी को मन ही मन लगा यदि मैं सेठ को वास्विकता बता दु तो सेठ का मन बहुत दुःखी होगा । पर गोस्वामी जी ठाकुर जी के सेवक थे तो वो भली भांति जानते थे कि भक्त का अपने भगवान के साथ अलग ही तरह का प्रेम भाव होता है। सेठ गोस्वामी जी से आज्ञा लेते हुए वापस चला जाता है।सेठ के जाने के पश्चात श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी पोशाक को देख देख कर अपने ठाकुर को एक शालिग्राम शिला के रूप में थे देख कर बहुत रोते हैं और मन ही मन सोचते हैं यदि शमिग्राम ठाकुर जी हस्त पद होते तो मैं भी उनकों ये पोशाक पहनता ओर विधि प्रकार से सेवा करता ।उनको पालने में झूलता। यही सोच सोच कर गोस्वामी जी इतना रोते हैं कि स्वयं शालिग्राम जी ये देख अपने मन मैं अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए उसी रात में राधारमण के रूप परिवर्तित हो गए ।हिन्दू धार्मिक मान्यता के अनुसार यह माना जाता है कि 1599 विक्रम संवत वैशाख शुक्ला पूर्णिमा की बेलामें शालिगराम से श्री राधारमण विग्रह के रूप में प्रकट हुए। भट्ट गोस्वामी ने नानाविध अलंकारों से उनका सिंगार कर केे उन्हें पलने मैं झुलाया उन्हें लाड़-प्यार से उन्हें भोगराग अर्पित कराया ओर उनकी आरती करी।श्रीराधारमण विग्रह की पीठ शालग्राम शिला जैसी दीखती है। अर्थात पीछे से दर्शन करने में शालग्राम शिला जैसे ही लगते हैं। द्वादश अंगुल का श्रीविग्रह होने पर भी बड़ा ही मनोहर दर्शन है। श्री राधारमण विग्रह का श्री मुखारबिंद गोविंद जी के समान, वक्षस्थल श्री गोपीनाथ के समान तथा चरणकमल मदनमोहन जी के समान हैं। इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल प्राप्त होता है ।
श्री राधा रमण मंदिर के पास ही दक्षिण मैं श्री गोपाल गोस्वामी जी की समाधि तथा राधारमण के प्रकट होने का स्थान दर्शनीय है। बाँके बिहारी जी की तरह श्री राधारमण जी वृंदावन से कहीं बाहर नहीं गए।बोलो राधारमण जी की जय !!
श्री राधा रमण मंदिर के पास ही दक्षिण मैं श्री गोपाल गोस्वामी जी की समाधि तथा राधारमण के प्रकट होने का स्थान दर्शनीय है। बाँके बिहारी जी की तरह श्री राधारमण जी वृंदावन से कहीं बाहर नहीं गए।बोलो राधारमण जी की जय !!
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Very nice👌
ReplyDeleteराधारमण की जय🙏🙏
Very nice👌
ReplyDeleteराधारमण की जय🙏🙏
राधारमण की जय🙏🙏
ReplyDeleteNice information
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