सकारात्मक दृष्टिकोण

5 comments :



हिंदी मेरी पहचान मैं आपका स्वगत करती हूँ। आज यह मे एक ऐसी कहानी के बारे में बता रही हूँ , जिसमे एक आम अपने अंतिम क्षण में ये सोचता है कि ना तो में किसी के काम आ पाया ओर न ही में खुद को प्रकर्ति के  नियमों से खुद को बच सका ,ओर जब मेरे जाने का समय आ गया तो मैंने आज चाहकर भी किसी के काम नही आ सकता ।

यह उस आम का एक अभिमान ही उसका सबसे बड़ा परेशानी का कारण । दोस्तों आज हम अभियान को तयाग कर किसी के काम आए ऐसी प्रेरणा लेते है जो उस आम ने ये अंतिम क्षण मैं सोचा।


 एक गांव था जिसमे एक किसान का बहुत बड़ा आमौ (फल) का बाग था। उस बाग में बहुत आम के पेड़ लगे हुए थे। किसान आम के बाग मै अपना पूरा समय वयित करता था। ओर हर साल मई - जून के महीने का बेसर्वी से  इन्त्जार करता था। हर साल की तरह एक साल आयी किसान को अपने आम की  पेड़ से तोड़कर उसे बाज़ार मैं बेचने के लिए ले जाना था। किसान आमों को बेचकर अपना गुजर भरता करता था। जब मई के महीना आया तो किसान पेड़ से आम तोड़ने लगा कुछ आम अपने आप टूट कर गिरने लगे और कुछ किसान ने तोड़े तो आसानी से टूट गए । पर उन्हीं मैं से एक आम था जो अपने अभिमान मैं था  मैं खुद को कैसे भी नही टूटने दूँगा। उसने हर वो प्रयास किया ओर अपने आप को पेड़ के पातों से खुद को इस तरह ढक लिया की वो किसान को नज़र नही आया । धीरे धीरे सारे आम टूट कर चले गए कोई बाजार मैं बिक गया तो कोई किसान के घर में काम आ गया । अब बचा एक आम अपने आप मे इतना प्रसन्ता कर रहा और सोच रहा , किसान कैसे भी मुझे नही तोड़ पाया ओर प्रकर्ति भी मेरा कुछ नही बिगाड़ पायी । 

धीरे धीरे समय व्यतीत होने लगा आम अकेला पेड़ पर राजा की तरह रह रहा था। जैसे ही जून के महीना आया तेज धूप और तेज गरम हवा आम को परेशान करने लागी ओर आम जलाने लगा। आम ने सोचा क्यू ना अपने आप को ओर पतियों से ढक लू ओर इसने खुद को ढक लिया । फिर जैसे ही सावन (अगस्त) का महीना शुरू हुआ और  बारिश शुरू हुई आब आम घबराने लगा । बिजली कड़कने लगी और अब आम राम राम  कहता हुआ हुआ डरते डरते रहेने लगा ।
एक दिन रात में घनघोर बारिश तूफ़ान ,आधी के साथ बहुत तेज ओले के साथ शुरू हुई और तेज तेज आम पर पड़ने लगे एक दो ओले  बर्दाश्त करते हुए आम बहुत तेज गिर गया और अब सोचने लगा अब मुझें कोई नही बचा सकता

आम जब बारिश मै भीगता रहा और धीरे धीरे धरती पर पड़े पड़े सडने लगा अब आम सोचता है मैन खुद को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया मै खुद को बचा भी ना पाया । मैं कितना मूर्ख था कि मैं जब संसार मे आया था तो मुझे इसे तयाग कर जाना भी तो जाना था लेकिन मेरे अभिमान ने मुझे अपने से दूर कर दिया और मैं संसार के नियमों को भूल कर जीने लगा । ओर आज जब मुझे संसार को छोड़ कर जाना है तो मैंने हर संम्भव प्रयास के बाद भी खुद को किसी अच्छे काम मैं शामिल नही कर सकता ।

अखरी वक्त पर मैं(आम) ये ही कहूंगा दोस्तों जितना कीसी के काम आ पाओ आना चाहिए जब संसार से आप जाते जो आपका ये मृत शरीर ही जाता है और जय जय कार होती है उन्हें कर्मों की जो कि है इस तन से। अभियान त्याग कर आओ किसी के काम।

                                ज्यादा बोझ लेकर चलने वाले

                                        अक्सर डूब जाते हैं!

                               फिर चाहे वह अभिमान का हो

                                        या सामान का हो!

                                                                          ब्रह्म कुमारी शिवानी जी

5 comments :