पद्मिनी_एकादशी

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                       🌸पद्मिनी_एकादशी🌸

त्रेतायुग में महिष्मती नगर में हैहय वंश में कृतवीर्य नाम के राजा हुआ करते थे, जिनकी सौ रानियाॅ थी, परन्तु किसी भी रानी से काेई सन्तान नहीं थी। राजा को निःसंतान होने का दुःख हमेशा रहता था, राजा ने इस समस्या का हल निकालने के लिये राज्य के सभी परिजन,ब्राम्हणों, अपने सलाहकारों को सम्मानपूर्वक आंमत्रण भेजा। सभी राजा के अनुरोध पर राजमहल आये, राजा ने सभी का आदर सम्मानपूर्वक स्वागत किया उसके बाद अपनी व्यथा बताई।



राजा के समस्या सुन सभी नें उन्हें तपस्या करने का उपाय बतलाया। राजा बतलाये गये सलाह अनुसार संतान प्राप्ति की इच्छा से तपस्या करने चले गये। राजा को तपस्या करने जाते देख उनकी एक रानी जिनका नाम प्रमदा (जो राजा हरिचन्द्र की पुत्री थी) वो भी उनके साथ वस्त्रालंकारों का त्याग तपस्या करने  गंधमादन पवर्त चली गई। राजा ने कई वर्षो तक तपस्या की तपस्या करने के कारण राजा के शरीर में सिर्फ हड्डियाँ ही शेष रह गई थी, इतने कठोर तपस्या करने के बाद भी राजा की तपस्या सिद्धि नहीं हो पायी।

यह देख प्रमदा ने महासती अनुसूईया से कहा - मेरे स्वामी पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कई वर्षो से तपस्या कर रहे है, लेकिन भगवान अभी तक प्रसन्न नहीं हुए है, कृपया कर मुझे आप इसका कारण बताये ?

महासती अनुसूईया प्रमदा की बात सुन कहती है - हे प्रमदा, अधिकमास में जो पदमनी एकादशी आती है, उसका व्रत कर रात्रि जागरण करो यह व्रत अवश्य ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करेगी।

देवी अनुसूईया द्वारा बतलाये एकादशी व्रत व विधान के अनुसार रानी प्रमदा ने एकादशी का व्रत कर रात्रि जागरण कर भगवान के नाम का संकीर्तन किया। व्रत की समाप्ति पर स्वयं भगवान प्रकट हुए, और रानी प्रमदा को वर मांगने को कहा भगवान के वचन सुन रानी ने कहाॅ हे प्रभु मेरे एकादशी के व्रत का फल आप मेरे पति को दे दीजिए।

रानी प्रमदा के वचन सुन भगवान श्री हरि ने राजा से कहा - हे राजन, मैं तुम्हारी पत्नी के एकादशी व्रत से अति प्रसन्न हुॅ, आप मुझसे अपनी इच्छा अनुरूप वर मांगे सकते है। भगवान के श्रीमुख से यह वचन सुन राजा कहते है - हे भगवन, मेरी यही कामना है कि मुझे एक ऐसा पुत्र वरदान में दीजिए जो देव, असुर,मनुष्य आदि से अजेय हो। भगवान श्री हरि राजा को इच्छित वरदान देते है। इसके बाद राजा रानी साथ अपने राज्य को वापस आ जाते है। कुछ ही माह बाद श्री हरि की कृपा से रानी के पुत्र की प्राप्ति होती है, जिसका नाम कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म हुआ। कार्तवीर्य अर्जुन एक अजेय योद्धा थे, जिन्होंने रावण को युद्ध में पराजित कर अपने बंदीगृह में बंद कर लिया था। रावण के साथ उन्होंने इन्द्र सहित सभी देवताओं को भी जीत लिया था, ऐसा पराक्रम भगवान श्री हरि की कृपा व एकादशी के प्रभाव से ही संभव था। एकादशी व्रत रखने वालें भगवान श्री हरि को अति प्रिय होते है। भगवान को पाने उनकी शरण में जाने का यह उत्तम उपाय है।

                            !!जय श्री !!

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