परिवर्तिनी एकादशी
🌸 परिवर्तिनी एकादशी 🌸
त्रेतायुग में राजा बलि नामक एक असुर था। असुर होने के पश्चात वह अत्यन्त भक्त, दानी, सत्यवादी तथा ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। वह सदा यज्ञ, तप आदि किया करता था। राजा बलि अपनी इसी भक्ति के प्रभाव से वह स्वर्ग में राज्य करने लगा। देवराज इन्द्र तथा अन्य देवता इसे सहन नहीं कर सके और भगवान श्रीहरि के पास जाकर प्रार्थना स्तुति करने लगे। तब भगवान विष्णु वामन रूप धारण किया और एक तेजस्वी ब्राह्मण का रूप धर आए।
वामन रूप धारण करके राजा बलि से कहने लगे - हे राजन! मुझे तीन पग भूमि दान दे दो, इससे तुम्हें तीन लोक के दान का फल प्राप्त होगा।
राजा बलि ने इस छोटी-सी याचना को स्वीकार कर लिया और भूमि देने को तैयार हो गया। और ब्राम्हण वेश मे आये भगवान विष्णु को वचन दे दिया, तब वामन स्वरूप भगवान ने अपना शरीर का आकार बढ़ा कर अपने दो पग में ही भूलोक, भुवन लोक में जंघा, स्वर्ग लोक में कमर, महलोक में पेट, जनलोक में हृदय, तपलोक में कण्ठ और सत्यलोक में मुख रखकर अपने शीर्ष को ऊँचा उठा लिया। तब भगवान राजा बलि से पूछे कि हे राजन! अब मैं तीसरा पग कहाँ रखूँ। इतना सुनकर राजा बलि ने भगवान के सामने हाथ जोड़ अपना शीर्ष नीचे कर लिया।
तब वामन भगवान ने अपना तीसरा पग उसके शीर्ष पर रख दिया और इस प्रकार देवताओं के हित के लिए अपने उस असुर भक्त को पाताल लोक में पहुँचा दिया तब राजा बलि ने भगवान वामन से विनती कि हे प्रभु मै यहाँ आपके बिना कैसे रहूंगा आप भी यही मेरे साथ विराजमान की विनती करने लगा तब वामन भगवान ने तथास्तु कह कर अपने भक्त की बातो का मान रखा और कहने लगे बलि मै सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा।
इसलिये भादों के शुक्ल पक्ष को परिवर्तिनी नामक एकादशी के दिन मेरी एक प्रतिमा राजा बलि के पास रहती है और एक क्षीर सागर में शेषनाग पर शयन करती रहती है। इस दिन विष्णु भगवान सोते हुए करवट बदलते हैं। इसलिये यह एकादशी परिवर्तनी एकादशी कहलाती है
सार
दान करने के उपरान्त मनुष्य को अभिमान नहीं करना चाहिये। इससे इस बात का भी बोध होता है कि अति हर कार्य की बुरी होती है।
त्रेतायुग में राजा बलि नामक एक असुर था। असुर होने के पश्चात वह अत्यन्त भक्त, दानी, सत्यवादी तथा ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। वह सदा यज्ञ, तप आदि किया करता था। राजा बलि अपनी इसी भक्ति के प्रभाव से वह स्वर्ग में राज्य करने लगा। देवराज इन्द्र तथा अन्य देवता इसे सहन नहीं कर सके और भगवान श्रीहरि के पास जाकर प्रार्थना स्तुति करने लगे। तब भगवान विष्णु वामन रूप धारण किया और एक तेजस्वी ब्राह्मण का रूप धर आए।
वामन रूप धारण करके राजा बलि से कहने लगे - हे राजन! मुझे तीन पग भूमि दान दे दो, इससे तुम्हें तीन लोक के दान का फल प्राप्त होगा।
राजा बलि ने इस छोटी-सी याचना को स्वीकार कर लिया और भूमि देने को तैयार हो गया। और ब्राम्हण वेश मे आये भगवान विष्णु को वचन दे दिया, तब वामन स्वरूप भगवान ने अपना शरीर का आकार बढ़ा कर अपने दो पग में ही भूलोक, भुवन लोक में जंघा, स्वर्ग लोक में कमर, महलोक में पेट, जनलोक में हृदय, तपलोक में कण्ठ और सत्यलोक में मुख रखकर अपने शीर्ष को ऊँचा उठा लिया। तब भगवान राजा बलि से पूछे कि हे राजन! अब मैं तीसरा पग कहाँ रखूँ। इतना सुनकर राजा बलि ने भगवान के सामने हाथ जोड़ अपना शीर्ष नीचे कर लिया।
तब वामन भगवान ने अपना तीसरा पग उसके शीर्ष पर रख दिया और इस प्रकार देवताओं के हित के लिए अपने उस असुर भक्त को पाताल लोक में पहुँचा दिया तब राजा बलि ने भगवान वामन से विनती कि हे प्रभु मै यहाँ आपके बिना कैसे रहूंगा आप भी यही मेरे साथ विराजमान की विनती करने लगा तब वामन भगवान ने तथास्तु कह कर अपने भक्त की बातो का मान रखा और कहने लगे बलि मै सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा।
इसलिये भादों के शुक्ल पक्ष को परिवर्तिनी नामक एकादशी के दिन मेरी एक प्रतिमा राजा बलि के पास रहती है और एक क्षीर सागर में शेषनाग पर शयन करती रहती है। इस दिन विष्णु भगवान सोते हुए करवट बदलते हैं। इसलिये यह एकादशी परिवर्तनी एकादशी कहलाती है
सार
दान करने के उपरान्त मनुष्य को अभिमान नहीं करना चाहिये। इससे इस बात का भी बोध होता है कि अति हर कार्य की बुरी होती है।
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