बंसी वाले की बंसी

2 comments :


श्रीकृष्ण भगवान विष्णु अवतारी पूर्ण पुरुष हैं। श्रीकृष्ण के साथ स्वर या अथवा ध्वनि का पूर्ण अवतार उनके वेणु (बंसी)  रूप में हुआ। श्रीकृष्ण की बंसी के मधुर स्वर की ध्वनि ने ब्रज में जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कर दिया। इस बंसी की ध्वनि ने न केवल मनुष्यों को, बल्कि अपितु ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी प्रभावित किया।

बंसी को बांसुरी, मुरली और संस्कृत में वेणु भी कहते हैं। ‘व’ अर्थात ब्रह्म, ‘इ’ अर्थात सुख तथा ‘णु’ अर्थात् अणु, अर्थात जिसके स्वर के सम्मुख ब्रह्मसुख भी तुच्छ प्रतीत हो, वह है वेणु।

श्रीकृष्णा को बंसी किसने दी ?

कृष्णा से जुड़ी बंसी के पीछे अलग अलग कथाये है जिनमे से एक कथा भगवान शिव से जुड़ी है ।

भगवान शिव ने कृष्णा को बंसी दी :

जब कृष्णा ने  द्वापर युग में जन्म लिया तभी सभी देवी देवता उनसे मिलने  गोकुल आने लगे  तभी भगवान शिव सबसे बाद मैं भेष बदलकर कृष्णा से मिलने आये क्योंकि उन्हें बाल कृष्णा को भेंट रूप में कुछ ऐसा देना था । जिसे प्रभु कृष्णा अपने बाल  अवस्था से अपने उम्र तक उसे अपने साथ रखे ।

शिव जी के पास दधीचि त्रषि की एक मात्र महाशक्तिशाली हड्डी पडी थी। दधीचि त्रषि वही थे जिन्होंने धर्म के लिए अपने शरीर की सारी हड्डीया दान कर दी थी । शिव जी ने इसी हड्डी के  टुकड़े को घिस कर मनोहर बंसी बनाई । जब शिवजी कृष्ण से मिलने गोकुल पहुँचे तब उन्होंने कृष्ण के बाल स्वरुप के दर्शन कर उन्हें बंसी भेंट की ।


श्रीकृष्णा को बंसी इतनी प्रिय क्यों है?

श्रीकृष्णा और बंसी की इतनी अंतरंगता है कि कृष्णा के नाम के साथ बंसी का नाम जुड़ा है। ठीक इसी प्रकार कृष्णा का भी नाम बंसी से जुड़ जाता है , वहां वंशीधर हैं, जहां मुरली है वहां मुरलीमनोहर, मुरलीधर हैं, यह बंसी उनकी सखी (परिचारिका) है । वे इससे एक क्षण भी दूर नहीं होते हैं। कृष्णा भगवान शिव के द्वारा मिली बंसी को उनका आशीर्वाद की तरह हमेशा साथ रखते है

श्रीमद्भागवत के अनुसार, वृन्दावन निवास में श्रीकृष्ण कभी बंसी से अलग नहीं हुए। गौचारण के समय या वन भोजन के समय में भी बंसी या तो उनके अधरों पर रही या उनके कमरबंध में रहती थी।


गोपियों को बंसी से इर्ष्या :

गोपियों को आश्चर्य हुआ कि इस बंसी ने कौन-सा  उपवास किया है कि बाँस की होकर भी श्रीकृष्ण के अधरसुधारस का पान स्वयं ही कर रही है , हमारे लिये कुछ भी नहीं बचेगा। यह सौत जैसा व्यवहार कर रही है। गोपियों को बंसी से ईष्या होने लगी। एक दिन सभी व्रजवासी बंसी के पास गए । 

गोपियां कहती हैं– बंसी एक बात बताओ तुम बाँस की हो और तुम से अत्यधिक हम कृष्ण को प्रेम करते है तब भी कृष्णा हमे छोड़ कर हमेशा तुम्हे अपने साथ क्यों रखते है ।और तो ओर तुम कृष्णा  के अधरों (होठ) की शय्या पर लेटकर हमारे श्यामसुंदर से अपने पैर पलोटवाती है। तुम एक सोत की तरह हमारे कृष्ण के साथ रहती हो ।



||अब कान्ह भये बस बाँसुरिके, अब कौन सखि! हमकों चहिहैं||
||वह रात दिना सँग लागी रहै, यह सौत को शासन को सहिहै||


||जिन मोह लियौ मन मोहनकौ, रसखानि सु क्यों न हमें दहिहै||
||मिलि आओ सबै कहुँ भाजि चलें, अब तो ब्रज में बँसुरी रहिहै||

गोपियां कहती हैं – यह  बंसी बहुत ठगनी है, पर एक उपाय है, ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी –

||करिये उपाय बाँस डारिए कटाय, नाही उपजैगो बाँस नाहि बाजेगी बासुँरी||

गोपियाँ यहां तक कहतीं हैं कि बंसी का पूरा जीवन ही विरोधाभासी है। बंसी की मधुर तान सुनकर गोपियां सम्मोहित हो जाती हैं और घर के सब काम छोड़कर श्रीकृष्ण से मिलने चली जाती हैं, जिससे उनके पति नाराज हो जाते हैं)। इसको वेधा गया (इसमें छेद किये गये) पर यह हमारे हृदय को बेधती रहती है। इसकी हरियाली सूख गयी है पर इसने हरि (कृष्ण) की यारी नहीं छोड़ी है। 

गोपियां कृष्ण को धमकी देती हैं -
                                                    
                                                  
            ||हम ब्रज बसिहें तो बांसुरी बसे ना ब्रज||
   ||बांसुरी बसावों तो कान्ह हमें विदा कीजिये||

ये सब देख कर जब बंसी ने कहा - सुनो गोपियो 

गोपियो! तुम हमारी तपस्या को नहीं समझती। मैंने क्या क्या नही सहा है। मैं कठोर कुठार से काटी गयी, मैं तन से अलग हुई ,फिर मन से अलग हुयी ओर तो ओर मैरे  परिवार से अलग किया , मुझ मैं एक नही , दो नही  सात-आठ छिद्र किये गये। मैं एक पोली बांस हूँ, अन्दर कोई भी गांठ नहीं है। मेरे से जो राग रागिनी का मधुर स्वर निकलता है, वह सब भगवान के मुख से स्फुरित होकर निकलता है। 

उनकी प्रेरणा के बिना मैं शुष्क बांस की जड़ नली हूँ। मैं पूर्णत: अहंशून्य हूँ इसीलिए श्रीकृष्ण का मुझपर अभेद प्रेम है।जैसे कृष्णा मुझसे बजाना चाहते है  मैं वैसे ही बजती हु जैसे कृष्णा मुझे जेसे रखना चहाते है मैन वेसे ही रहती हूं ।
मुझे मैं (बंसी) और तुममे (गोपियो) फर्क सिर्फ इतना हैं कि तुम कृष्णा को रखना चाहती हो और कृष्णा मुझसे रखना  चाहते है  यह था  बंसी का  समर्पण।

||तप हम बहुत भाँति करयो||
||हेम बरिखा सही सिर पर घाम तनहिं जरयो||

||काटि बेधी सप्त सुरसों हियो छूछो करयो||
||तुमहि बेगि बुलायबे को लाल अधरन धरयो||

||इतने तप मैं किये तबही लाल गिरधर बरयो||
||सूर श्रीगोपाल सेवत सकल कारज सरयो||

बंसी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को  किसी के ,साथ रहना है तो उसे अपने तन, धन ,और मन सबसे उसको समर्पित कर देना चाहिए । जैसे वो रखना चाहते है वेसे बन जाना चाहिए ।वंसी ने सब छोड़कर श्रीकृष्ण के रंग मै खुद  रंग लिया ।

2 comments :