कैसी होती है माँ ? : स्वामी विवेकानंद
घर आ कर बहुत रोये माँ-बाप अकेले में,
मिट्टी के खिलोने भी सस्ते नहीं थे मेले में !!
एक बार एक नगर मे स्वामी विवेकानन्द पहुँचे,वहाँ के नगर धनाड़्य सेठ साहूकारों ने उन्हें बहूमूल्य रत्न भेंट किए,स्वामी जी उन्हें एक हाथ से स्वीकार कर अलग रख देते थे|इतने में एक बूढ़ी महिला वहाँ आई ओर बोली- "प्रभु जब आपके आने का समाचार मिला, तो रोटी खा रही थी,मेरे पास ओर कुछ तो नहीं है लेकिन अपनी एक मात्र रोटी में से आधी रोटी बचाकर आपके लिए ले लाई हूँ, उम्मीद है आप मेरी इस छोटी सी भेँट को स्वीकार कर लेंगे"
स्वामी जी की आँखे भर आई ओर अपने दोनों हाथ फैलाकर भेँट स्वीकार कर खाने लगे|धनी और साहूकार लोगों को ये बात बुरी लगी ओर बोले- "स्वामी जी हमारे क़ीमती आभूषण रत्न को आपने एक हाथ से लेकर अलग रख दिया जबकि इस बुढ़िया की जूठी. रोटी के लिए अपनी झोली फैला दी और हमारा मेवा त्याग कर सूखी रोटी क्यों खा रहे हो?"
खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से,
बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही !!
सेठो और साहूकारों के तर्क सुन स्वामी जी मुस्कुरा कर बोले- "आप सबने तो अपनी अपार दौलत में से मात्र कुछ रत्न भेँट किए परन्तु इस माँ ने तो मुझे अपने मुँह का निवाला ही दे ड़ाला, धन्य हूँ मैं मुझे माँ का दुलार मिला| इस माँ की भेँट ही मेरे लिए अनमोल है, इस दुनिया में एक माँ ही है जो स्वयं भूखी रह कर अपना पेट काटकर औलाद को खाना खिलाती है पर औलाद क्या अपना फ़र्ज़ निभाती है..?"
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