वसंत पंचमी पर्व कैसे मानते हैं आओ जाने
वसन्त पंचमी शिक्षा, साक्षरता, विद्या और विनय का पर्व है। कला, विविध गुण, विद्या को- साधना को बढ़ाने, उन्हें प्रोत्साहित करने का पर्व है- वसन्त पंचमी।
भगवती सरस्वती के जन्म दिन पर उनके अनुग्रह के लिए कृतज्ञता भरा अभिनन्दन करें- उनकी अनुकम्पा का वरदान प्राप्त होने की पुण्यतिथि पर हर्षोल्लास मनाएँ, यह उचित ही है।
भगवती सरस्वती के जन्म दिन पर उनके अनुग्रह के लिए कृतज्ञता भरा अभिनन्दन करें- उनकी अनुकम्पा का वरदान प्राप्त होने की पुण्यतिथि पर हर्षोल्लास मनाएँ, यह उचित ही है।
दिव्य शक्तियों को मानवी आकृति में चित्रित करके ही उनके प्रति भावनाओं की अभिव्यक्ति सम्भव है। भावोद्दीपन मनुष्य की निज की महती आवश्यकता है। शक्तियाँ सूक्ष्म, निराकार होने से उनकी महत्ता तो समझी जा सकती है, शरीर और मस्तिष्क द्वारा उनसे लाभ उठाया जा सकता है, पर अन्तःकरण की मानस चेतना जगाने के लिए दिव्यतत्त्वों को भी मानवी आकृति में संवेदनायुक्त मनःस्थिति में मानना और प्रतिष्ठापित करना पड़ता है। इसी चेतना विज्ञान को ध्यान में रखते हुए भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने प्रत्येक दिव्य शक्तियों को मानुषी आकृति और भाव गरिमा में सँजोया है। इनकी पूजा, अर्चना, वन्दना, धारणा हमारी अपनी चेतना को उसी प्रतिष्ठापित देव गरिमा के समतुल्य उठा देती है, साधना विज्ञान का सारा ढाँचा इसी आधार पर खड़ा है।
भगवती सरस्वती की प्रतिमा, मूर्ति अथवा तस्वीर के आगे पूजा- अर्चा की प्रक्रिया की जाए, इसका सीधा तात्पर्य यह है कि शिक्षा की महत्ता को स्वीकार, शिरोधार्य किया जाए, उनको मस्तक झुकाया जाए अर्थात् मस्तक में उनके लिए स्थान दिया जाए। अपनी आज की ज्ञान सीमा जितनी है, उसे और अधिक बढ़ाने का प्रयत्न किया जाए। वास्तव में संग्रह करने और बढ़ाने योग्य सम्पदा धन नहीं, ज्ञान है। लक्ष्मी नहीं, विद्या का अधिक संग्रह सम्पादन किया जाना चाहिए।
यह समझा जाता है कि विद्या नौकरी करने के लिए प्राप्त की जानी चाहिए- यह विचार बहुत ही ओछा और निकृष्ट है। विद्या मनुष्य के मस्तिष्क के व्यक्तित्व के गौरव के निखार एवं विकास के लिए है। पेट भरने की तरह मानसिक भूख बुझाने के लिए दैनिक जीवन में अध्ययन के लिए भी स्थान रखना चाहिए।
भगवती सरस्वती के हाथ में वीणा है, उनका वाहन मयूर है, मयूर अर्थात् मधुरभाषी। हमें सरस्वती का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए उनका वाहन मयूर बनना चाहिए। मीठा, नम्र, विनीत, सज्जनता, शिष्टता और आत्मीयतायुक्त सम्भाषण हर किसी से करना चाहिए। जीभ को कड़ुआ, धृष्ट, अशिष्ट बोलने की आदत कदापि न पड़ने दें। हर किसी के सम्मान की रक्षा करें; ताकि किसी को आत्महीनता की ग्रन्थि का शिकार बनाने का पाप अपने सिर पर न चढ़े।
प्रकृति ने मोर को कलात्मक तथा सुसज्जित बनाया है। हमें भी अपनी अभिरुचि परिष्कृत बनानी चाहिए, हम प्रेमी बनें, सौन्दर्य, स्वच्छता और सुसज्जनता अपने प्रत्येक उपकरण एवं क्रियाकलाप में नियोजित रखें, तभी भगवती सरस्वती हमें अपना वाहन, पार्षद, प्रिय पात्र मानेंगी।
भगवती सरस्वती की प्रतिमा, मूर्ति अथवा तस्वीर के आगे पूजा- अर्चा की प्रक्रिया की जाए, इसका सीधा तात्पर्य यह है कि शिक्षा की महत्ता को स्वीकार, शिरोधार्य किया जाए, उनको मस्तक झुकाया जाए अर्थात् मस्तक में उनके लिए स्थान दिया जाए। अपनी आज की ज्ञान सीमा जितनी है, उसे और अधिक बढ़ाने का प्रयत्न किया जाए। वास्तव में संग्रह करने और बढ़ाने योग्य सम्पदा धन नहीं, ज्ञान है। लक्ष्मी नहीं, विद्या का अधिक संग्रह सम्पादन किया जाना चाहिए।
यह समझा जाता है कि विद्या नौकरी करने के लिए प्राप्त की जानी चाहिए- यह विचार बहुत ही ओछा और निकृष्ट है। विद्या मनुष्य के मस्तिष्क के व्यक्तित्व के गौरव के निखार एवं विकास के लिए है। पेट भरने की तरह मानसिक भूख बुझाने के लिए दैनिक जीवन में अध्ययन के लिए भी स्थान रखना चाहिए।
भगवती सरस्वती के हाथ में वीणा है, उनका वाहन मयूर है, मयूर अर्थात् मधुरभाषी। हमें सरस्वती का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए उनका वाहन मयूर बनना चाहिए। मीठा, नम्र, विनीत, सज्जनता, शिष्टता और आत्मीयतायुक्त सम्भाषण हर किसी से करना चाहिए। जीभ को कड़ुआ, धृष्ट, अशिष्ट बोलने की आदत कदापि न पड़ने दें। हर किसी के सम्मान की रक्षा करें; ताकि किसी को आत्महीनता की ग्रन्थि का शिकार बनाने का पाप अपने सिर पर न चढ़े।
प्रकृति ने मोर को कलात्मक तथा सुसज्जित बनाया है। हमें भी अपनी अभिरुचि परिष्कृत बनानी चाहिए, हम प्रेमी बनें, सौन्दर्य, स्वच्छता और सुसज्जनता अपने प्रत्येक उपकरण एवं क्रियाकलाप में नियोजित रखें, तभी भगवती सरस्वती हमें अपना वाहन, पार्षद, प्रिय पात्र मानेंगी।
हाथ में वीणा, अर्थात्- संगीत गायन जैसी भावोत्तेजक प्रक्रिया को अपने प्रसुप्त अन्तःकरण में सजगता भरने के लिए प्रयुक्त करना है। हम कला प्रेमी बनें, कला पारखी बनें, कला के पुजारी और संरक्षक भी। माता की तरह उसका सात्त्विक एवं पोषक पय पान करें, उच्च भावनाओं के जागरण में उसे सँजोएँ। जो अनाचारी कला के साथ व्यभिचार क रने पर तुले हुए हों, पशु प्रवृत्ति भड़काने और कामुकता, अश्लीलता एवं कुरुचि उत्पन्न करने में लगे हों, उनका न केवल असहयोग- विरोध ही करें, वरन् विरोध- भर्त्सना के अतिरिक्त उन्हें असफल बनाने में भी कुछ कसर उठा न रखें।
सरस्वती के अवतरण पर्व पर प्रकृति खिलखिला पड़ती है, हँसी और मुस्कान के फूल खिल पड़ते हैं। उल्लास, उत्साह और प्रकृति के अभिनव सृजन के प्रतीक नवीन पल्लव प्रत्येक वृक्ष पर परिलक्षित होते हैं। मनुष्य में भी जब ज्ञान का, शिक्षा का प्रवेश होता है- सरस्वती का अनुग्रह अवतरित होता है, तो स्वभाव में, दृष्टिकोण में क्रिया कलाप में वसन्त ही बिखरा दीखता है। हलकी- फुलकी, चिन्ता और उद्वेगों से रहित खेल जैसी जिन्दगी जीने की आदत पड़ जाती है।
सरस्वती के अवतरण पर्व पर प्रकृति खिलखिला पड़ती है, हँसी और मुस्कान के फूल खिल पड़ते हैं। उल्लास, उत्साह और प्रकृति के अभिनव सृजन के प्रतीक नवीन पल्लव प्रत्येक वृक्ष पर परिलक्षित होते हैं। मनुष्य में भी जब ज्ञान का, शिक्षा का प्रवेश होता है- सरस्वती का अनुग्रह अवतरित होता है, तो स्वभाव में, दृष्टिकोण में क्रिया कलाप में वसन्त ही बिखरा दीखता है। हलकी- फुलकी, चिन्ता और उद्वेगों से रहित खेल जैसी जिन्दगी जीने की आदत पड़ जाती है।
हर काम की पूरी- पूरी जिम्मेदारी अनुभव करने पर भी मन पर बोझ किसी भली- बुरी घटना का न पड़ने देना यही है हलकी- फुलकी जिन्दगी, मुसकान चेहरे पर अठखेलियाँ करती रहे। चित्त हलका रखना, आशा और उत्साह से भरे रहना, उमंगें उठने देना, उज्ज्वल भविष्य के सपने सँजोना, अपने व्यक्तित्व को फूल जैसा निर्मल, निर्दोष, आकर्षक एवं सुगन्धित बनाना- ऐसी ही अनेक प्रेरणाएँ वसन्त ऋतु के आगमन पर पेड़- पौधों पर नवीन पल्लवों- पुष्पों को देखकर प्राप्त की जा सकती है। कोयल की तरह मस्ती में कूँकना, भौरों की तरह गूँजना- गुनगुनाना जीवन की कला जानने वाले के चिह्न हैं।
हर जड़ चेतन में, वसन्त ऋतु में एक सृजनात्मक उमंग देखी जाती है। उस उमंग को वासना से ऊँचा उठाकर भावोल्लास में विकसित किया जाना चाहिए। सरस्वती का अभिनन्दन प्रकृति, वसन्त अवतरण के रूप में करती है। हम पूजा वेदी पर पुष्पाञ्जलि भेंट करने के साथ- साथ जीवन में वसन्त जैसा उल्लास, कलात्मक प्रवृत्तियों का विकास और ज्ञान संवर्धन का प्रयास करके सच्चे अर्थों में भगवती का पूजन कर सकते हैं और उसका लाभ अपने को तथा अन्य असंख्यों को पहुँचा सकते हैं।
वसन्त पंचमी पर्व युग निर्माण परिवार के परिजनों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। उसकी सनातन महत्ता भी कम नहीं है, फिर भी मिशन के सूत्र संचालक के आध्यात्मिक जन्मदिन के रूप में उसका महत्त्व और भी बढ़ गया है।
॥ सरस्वती आवाहन॥
वसन्त पंचमी पर्व युग निर्माण परिवार के परिजनों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। उसकी सनातन महत्ता भी कम नहीं है, फिर भी मिशन के सूत्र संचालक के आध्यात्मिक जन्मदिन के रूप में उसका महत्त्व और भी बढ़ गया है।
॥ सरस्वती आवाहन॥
माँ सरस्वती शिक्षा, साक्षरता तथा भौतिक ज्ञान की देवी हैं। चूँकि वसन्त पंचमी भी शिक्षा- साक्षरता का पर्व है, इसलिए इस अवसर पर प्रधान रूप से देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है। सरस्वती का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित कर देवी सरस्वती का आवाहन करना चाहिए।
ॐ पावका नः सरस्वती, वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वष्टु धियावसुः॥ ॐ सरस्वत्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि ध्यायामि। - २०.८४
॥ वाद्ययन्त्र पूजन॥
वाद्य सङ्गीत मनुष्य की उदात्त भावनाओं और उसकी हृदय तरंगों को व्यक्त करने के सहयोगी साधन हैं। इसलिए इन साधनों का पूजन करना, उनके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा- भावना प्रकट करना है। स्मरण रहे, स्थूल और जड़ पदार्थ भी चेतनायुक्त तरंगो से स्वर लहरियों के संयोग से सूक्ष्म रूप में एक विशेष प्रकार की चेतना से युक्त हो जाते हैं, इसलिए वाद्य केवल स्थूल वस्तु नहीं; प्रत्युत् उनमें मानव हृदय की सी तरंगो को समझकर उनकी पूजा करनी चाहिए। चर्मरहित जो वाद्ययंत्र उपलब्ध हों, उन्हें एक चौकी पर सजाकर रखें। पुष्प, अक्षत आदि समर्पित कर पूजन करें।
ॐ सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां, पत्नी सुकृतं बिभर्ति।
अपा रसेन वरुणो न साम्नेन्द्र , श्रियै जनयन्नप्सु राजा॥- १९.९४
ॐ पावका नः सरस्वती, वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वष्टु धियावसुः॥ ॐ सरस्वत्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि ध्यायामि। - २०.८४
॥ वाद्ययन्त्र पूजन॥
वाद्य सङ्गीत मनुष्य की उदात्त भावनाओं और उसकी हृदय तरंगों को व्यक्त करने के सहयोगी साधन हैं। इसलिए इन साधनों का पूजन करना, उनके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा- भावना प्रकट करना है। स्मरण रहे, स्थूल और जड़ पदार्थ भी चेतनायुक्त तरंगो से स्वर लहरियों के संयोग से सूक्ष्म रूप में एक विशेष प्रकार की चेतना से युक्त हो जाते हैं, इसलिए वाद्य केवल स्थूल वस्तु नहीं; प्रत्युत् उनमें मानव हृदय की सी तरंगो को समझकर उनकी पूजा करनी चाहिए। चर्मरहित जो वाद्ययंत्र उपलब्ध हों, उन्हें एक चौकी पर सजाकर रखें। पुष्प, अक्षत आदि समर्पित कर पूजन करें।
ॐ सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां, पत्नी सुकृतं बिभर्ति।
अपा रसेन वरुणो न साम्नेन्द्र , श्रियै जनयन्नप्सु राजा॥- १९.९४
॥ मयूरपूजन॥
मयूर- मधुर गान तथा प्रसन्नता का सर्वोत्कृष्ट प्रतीक प्राणी है। मनुष्य मयूर की भाँति अपनी वाणी, व्यवहार तथा जीवन को मधुरतायुक्त आनन्ददायी बनाए, इसके लिए मयूर की पूजा की जाती है।
सरस्वती के चित्र में अंकित अथवा प्रतीक रूप में स्थापित मयूर का पूजन करें। अक्सर चित्रों में मयूर का चित्र होता ही है। यदि कहीं ऐसा चित्र सुलभ न हो, तो मयूर पंख को पूजा के लिए प्रयुक्त कर लेना चाहिए। निम्न मन्त्र से मयूर का पूजन किया जाए।
ॐ मधु वाताऽऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ - १३.२७
॥ वसन्त पूजा॥
पुष्प प्रसन्नता, उल्लास और नवजीवन के खिलखिलाते रूप के मूर्त प्रतीक होते हैं। प्रकृति के गोद में पुष्पों की महक, उनका हँसना, खेलना, घूमना मनुष्य के लिए उल्लास, प्रफुल्लता का जीवन बिताने के लिए मूक सन्देश है। इसी सन्देश को हृदयंगम करने, जीवन में उतारने के लिए पुष्प का पूजन किया जाता है। खेतों में सर्षप (सरसों) पुष्प जो वासन्ती रंग के हों अथवा बाग आदि से फूल पहले ही मँगवाकर एक गुलदस्ता बना लेना चाहिए। वसन्त का प्रतीक मानकर इसका पूजन करें।
ॐ वसन्ताय कपिंजलानालभते, ग्रीष्माय कलविङ्कान्, वर्षाभ्यस्तित्तिरीञ्छरते, वर्त्तिका हेमन्ताय, ककराञ्छिशिराय विककरान्॥- २४.२०
यजमान यही फूल का गुच्छा सरस्वती माता को अर्पित करें।
॥संकल्प ॥
....नामाहं वसन्तपर्वणि नवसृजन- ईश्वरीय योजनां अनुसरन् आत्मनिर्माण- परिवारनिर्माण त्रिविधसाधनासु नियमनिष्ठापूर्वकं सहयोगप्रदानाय संकल्पम् अहं करिष्ये॥
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)

No comments :
Post a Comment