विजया एकादशी
🌸विजया एकादशी🌸
जब भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला, तब भगवान राम अपने भ्राता लक्ष्मण और माता सीता संग पंचवटी में निवास करने लगे थे। उसी समय वह महापापी रावण ने माता सीता का हरण कर लिया।
जब यह घटना श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी जी को पता चला तब अत्यंत दुखी हुए और माता सीता की खोज में वन-वन भटकने लगे। माता सीता की खोज करते हुए भगवान श्री राम व लक्ष्मण जटायु के पास जा पहुंचे जो मरणासन्न अवस्था मे वन था। तब जटायु ने माता सीता के हरण का सारा वृत्तांत सुनाया और भगवान श्रीरामजी की गोद में ही अपने प्राण त्यागकर भगवान के परम धाम की ओर प्रस्थान किया। यह वृतांत सुन भगवान उसी वन आगे बढ़ने लगे कुछ दूर चलने के पश्चात भगवान श्रीराम व लक्ष्मण जब की भेंट सुग्रीवजी से हुई और सुग्रीव जी से मित्रता कर भगवान ने सुग्रीव के जेष्ठ भ्राता बालि का वध किया।
भगवान श्रीराम भक्त हनुमानजी लिये वन मार्ग से आगे बढ़ हनुमान जी से लंका में जाकर माता सीता का पता लगाने कहा हनुमान जी लंका जा माता सीता का पता लगा माता से प्रभु श्रीराम तथा महाराज सुग्रीव की मित्रता का वर्णन सुनाया। वहां से वापस लौट हनुमानजी भगवान श्रीरामचंद्रजी के पास आए और अशोक वाटिका का सारा वृत्तांत प्रभु राम को सुनाने लगे।
सब जानने के बाद भगवान श्रीराम ने सुग्रीव सहित वानरों तथा भालुओं की सेना लेकर लंका की तरफ प्रस्थान करते है। जैसे ही भगवान श्री राम विशाल समुद्र के पास पहुंचते है तो देखते ही की मगरमच्छों से भरा है, यह देखकर भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मणजी से कहते है - हे लक्ष्मण यह समुद्र तो अनेक मगरमच्छों और जीवों से भरा है, इस विशाल समुद्र को कैसे पार करेंगे?
प्रभु की बात सुन लक्ष्मणजी कहते है - भ्राता श्री, आप पुरुषोत्तम आदिपुरुष हैं। आपसे कुछ भी विलुप्त नहीं है। यहाँ से आधा योजन दूरी पर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य मुनि जी का आश्रम है। वे अनेक नाम के ब्रह्माओं के ज्ञाता हैं। वे ही आपकी विजय के उपाय बता सकते हैं |
अपने भाई लक्ष्मण की बात सुन श्रीराम जी वकदाल्भ्य ऋषि के आश्रम में जाते है, वकदाल्भ्य ऋषि को प्रणाम कर श्री राम जी वही बैठ जीते है।
भगवान श्रीराम को देख महर्षि वकदाल्भ्य जी पूछते है - हे श्रीराम, मेरी कुटिया मे आपके चरण पड़े यह मेरा सौभाग्य है मेरी कुटिया आपके आने से पवित्र गई, कृपा कर अपने आने का प्रयोजन बताये !
ऋषिमुनि के वचनों को सुन श्रीरामजी कहते- हे ऋषिवर मैं अपने भ्राता लक्ष्मण और अपनी सेना सहित राक्षसराज रावण की लंका जा उससे युध्द मे परास्त कर अपने अर्धांगिनी सीता को रावण के बंधन से मुक्त कराने हेतु यहा आया हूँ। कृपा कर आप मुझे यह विशाल समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। आपके पास आने का मेरा यही प्रयोजन है।
महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- हे राम! मैं आपको एक अति उत्तम व्रत बतलाता हूं। जिसके करने से आपको विजयश्री अवश्य ही प्राप्त होगी।
भगवान श्री राम जिज्ञासु पूर्ण पूछते है, कैसा व्रत है मुनिवर जिसे करने से विजय की प्राप्ति होती है?
महर्षि वकदाल्भ्य ने कहते है- हे राम, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का उपवास करने से आप समुद्र को पार कर लेंगे और युद्ध में भी आपकी विजय होगी। हे मर्यादा पुरुषोत्तम! इस उपवास के लिए दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश ले। उस कलश को जल से भरकर तथा उस पर पंच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करें। उस कलश के नीच सात प्रकार के अनाज और ऊपर जौ रखें। उस पर विष्णु की स्वर्ण की प्रतिमा स्थापित कर भगवान श्रीहरि का पूजन करें। द्वादशी के निवृत्त होकर उस कलश को ब्राह्मण को दे दें। हे दशरथनंदन! यदि आप इस व्रत को सेनापतियों के साथ करेंगे तो अवश्य ही विजयश्री की प्राप्ति होगी। मुनि के वचन सुन तब श्रीराम जी ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से राक्षसों के ऊपर विजय प्राप्त की।
श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था- जो इस व्रत का माहात्म्य श्रवण करता है या पढ़ता है उसे वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है।"
भगवान विष्णु का किसी भी रूप में पूजन मानव मात्र की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता है। श्रीराम हालांकि स्वयं विष्णु के अवतार थे, अपितु अपनी लीलाओं के चलते प्राणियों को सद्मार्ग दिखाने के लिए उन्होंने विष्णु भगवान के निमित्त इस व्रत को किया। विजय की इच्छा रखने वाला इस उपवास को करके अनंत फल का भागी बन सकता है।
जब भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला, तब भगवान राम अपने भ्राता लक्ष्मण और माता सीता संग पंचवटी में निवास करने लगे थे। उसी समय वह महापापी रावण ने माता सीता का हरण कर लिया।
जब यह घटना श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी जी को पता चला तब अत्यंत दुखी हुए और माता सीता की खोज में वन-वन भटकने लगे। माता सीता की खोज करते हुए भगवान श्री राम व लक्ष्मण जटायु के पास जा पहुंचे जो मरणासन्न अवस्था मे वन था। तब जटायु ने माता सीता के हरण का सारा वृत्तांत सुनाया और भगवान श्रीरामजी की गोद में ही अपने प्राण त्यागकर भगवान के परम धाम की ओर प्रस्थान किया। यह वृतांत सुन भगवान उसी वन आगे बढ़ने लगे कुछ दूर चलने के पश्चात भगवान श्रीराम व लक्ष्मण जब की भेंट सुग्रीवजी से हुई और सुग्रीव जी से मित्रता कर भगवान ने सुग्रीव के जेष्ठ भ्राता बालि का वध किया।
भगवान श्रीराम भक्त हनुमानजी लिये वन मार्ग से आगे बढ़ हनुमान जी से लंका में जाकर माता सीता का पता लगाने कहा हनुमान जी लंका जा माता सीता का पता लगा माता से प्रभु श्रीराम तथा महाराज सुग्रीव की मित्रता का वर्णन सुनाया। वहां से वापस लौट हनुमानजी भगवान श्रीरामचंद्रजी के पास आए और अशोक वाटिका का सारा वृत्तांत प्रभु राम को सुनाने लगे।
सब जानने के बाद भगवान श्रीराम ने सुग्रीव सहित वानरों तथा भालुओं की सेना लेकर लंका की तरफ प्रस्थान करते है। जैसे ही भगवान श्री राम विशाल समुद्र के पास पहुंचते है तो देखते ही की मगरमच्छों से भरा है, यह देखकर भगवान श्री राम अपने अनुज लक्ष्मणजी से कहते है - हे लक्ष्मण यह समुद्र तो अनेक मगरमच्छों और जीवों से भरा है, इस विशाल समुद्र को कैसे पार करेंगे?
प्रभु की बात सुन लक्ष्मणजी कहते है - भ्राता श्री, आप पुरुषोत्तम आदिपुरुष हैं। आपसे कुछ भी विलुप्त नहीं है। यहाँ से आधा योजन दूरी पर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य मुनि जी का आश्रम है। वे अनेक नाम के ब्रह्माओं के ज्ञाता हैं। वे ही आपकी विजय के उपाय बता सकते हैं |
अपने भाई लक्ष्मण की बात सुन श्रीराम जी वकदाल्भ्य ऋषि के आश्रम में जाते है, वकदाल्भ्य ऋषि को प्रणाम कर श्री राम जी वही बैठ जीते है।
भगवान श्रीराम को देख महर्षि वकदाल्भ्य जी पूछते है - हे श्रीराम, मेरी कुटिया मे आपके चरण पड़े यह मेरा सौभाग्य है मेरी कुटिया आपके आने से पवित्र गई, कृपा कर अपने आने का प्रयोजन बताये !
ऋषिमुनि के वचनों को सुन श्रीरामजी कहते- हे ऋषिवर मैं अपने भ्राता लक्ष्मण और अपनी सेना सहित राक्षसराज रावण की लंका जा उससे युध्द मे परास्त कर अपने अर्धांगिनी सीता को रावण के बंधन से मुक्त कराने हेतु यहा आया हूँ। कृपा कर आप मुझे यह विशाल समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। आपके पास आने का मेरा यही प्रयोजन है।
महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- हे राम! मैं आपको एक अति उत्तम व्रत बतलाता हूं। जिसके करने से आपको विजयश्री अवश्य ही प्राप्त होगी।
भगवान श्री राम जिज्ञासु पूर्ण पूछते है, कैसा व्रत है मुनिवर जिसे करने से विजय की प्राप्ति होती है?
महर्षि वकदाल्भ्य ने कहते है- हे राम, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का उपवास करने से आप समुद्र को पार कर लेंगे और युद्ध में भी आपकी विजय होगी। हे मर्यादा पुरुषोत्तम! इस उपवास के लिए दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश ले। उस कलश को जल से भरकर तथा उस पर पंच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करें। उस कलश के नीच सात प्रकार के अनाज और ऊपर जौ रखें। उस पर विष्णु की स्वर्ण की प्रतिमा स्थापित कर भगवान श्रीहरि का पूजन करें। द्वादशी के निवृत्त होकर उस कलश को ब्राह्मण को दे दें। हे दशरथनंदन! यदि आप इस व्रत को सेनापतियों के साथ करेंगे तो अवश्य ही विजयश्री की प्राप्ति होगी। मुनि के वचन सुन तब श्रीराम जी ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से राक्षसों के ऊपर विजय प्राप्त की।
श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था- जो इस व्रत का माहात्म्य श्रवण करता है या पढ़ता है उसे वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है।"
भगवान विष्णु का किसी भी रूप में पूजन मानव मात्र की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता है। श्रीराम हालांकि स्वयं विष्णु के अवतार थे, अपितु अपनी लीलाओं के चलते प्राणियों को सद्मार्ग दिखाने के लिए उन्होंने विष्णु भगवान के निमित्त इस व्रत को किया। विजय की इच्छा रखने वाला इस उपवास को करके अनंत फल का भागी बन सकता है।
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