जया एकादशी

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🌸जया एकादशी🌸

एक बार पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या ने माल्यवान नामक गंधर्व को देखा और उस पर मोहित होकर अपने हाव-भाव से उस माल्यवान गंधर्व को रिझाने का प्रयास करने लगी। माल्यवान भी उस गंधर्व कन्या पर मोहित हो गये और अपने गायन का सुर-ताल भूल गया। जिससे संगीत की लय टूट गई और संगीत का सारा आनंद बिगड़ गया। सभा में उपस्थित सभी देवगणों को यह देख बहुत बुरा लगा। और देवराज इंद्र भी रूष्ट हो गए। और इंद्र कहने लगे कि संगीत एक पवित्र साधना है। इस साधना को भ्रष्ट करना पाप है, और क्रोधवश इंद्र ने पुष्पवती तथा माल्यवान को शाप दे दिया- 'संगीत की साधना को अपवित्र करने वाले माल्यवान और पुष्पवती! तुमने देवी सरस्वती का अपमान किया है, अतः तुम्हें मृत्युलोक में जाना होगा। इस प्रकार के गुरुजनों की सभा में असंयम और लज्जाजनक प्रदर्शन करके तुमने गुरुजनों का घोर अपमान किया है, इसलिए इंद्रलोक में तुम्हारा रहना अब वर्जित है, अब तुम अधम पिशाच असंयमी का-सा जीवन बिताओगे।




देवराज इंद्र का शाप सुनकर वे अत्यंत दुखी हुए और पिशाच योनि में दुःख पूर्वक जीवनयापन करने लगे। उन्हें गंध, रस, स्पर्श आदि का बिलकुल भी बोध नहीं था। साथ ही दोनो को असहनीय दुःख सहन करना पड़ रहा था। दुःख के कारण उन्हें एक क्षण के लिए भी नींद नहीं आती थी।
एक दिन माल्यवान जो कि पिशाच बन गया था वह पुष्पवती से कहता है-  नही पता हमने पिछले जन्म में कौन-से  ऐसे पाप किए थे, जिसके कारण हमें इतनी दुःखदायी योनि प्राप्त हुई है? यहा से तो नरक के दुःख कहीं ज्यादा उत्तम है। इसी प्रकार अपने विचारों को कहते हुए दिन व्यतीत करने लगे।

एक बार माघ के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन इन दोनों ने कुछ भी भोजन नहीं किया और न ही कोई पाप कर्म किया। उस दिन मात्र फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। उस दिन सूर्य भगवान अस्ताचल को जा रहे थे। वह रात इन दोनों ने एक-दूसरे से सटकर बड़ी कठिनता से काटी।

दूसरे दिन प्रातः काल होते ही प्रभु की कृपा से इनकी पिशाच योनि से मुक्ति हो गई और पुनः अपनी अत्यंत सुंदर अप्सरा और गंधर्व की देह धारण करके तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत होकर दोनों स्वर्ग लोक को चले गए। उस समय आकाश में देवगण तथा गंधर्व इनकी स्तुति करने लगे। नागलोक में जाकर इन दोनों ने देवेंद्र को दण्डवत् किया।

देवेंद्र को भी उन्हें उनके रूप में देखकर महान विस्मय हुआ और उन्होंने पूछा- 'तुम्हें पिशाच योनि से किस प्रकार मुक्ति मिली, उसका पूरा वृत्तांत मुझे बताओ।'

देवेंद्र की बात सुन माल्यवान ने कहा- 'हे देवताओं के राजा इंद्र! श्रीहरि की कृपा तथा जया एकादशी के व्रत के पुण्य से हमें पिशाच योनि से मुक्ति मिली है।'

इंद्र ने कहा- 'हे माल्यवान! एकादशी व्रत करने से तथा भगवान श्रीहरि की कृपा से तुम लोग पिशाच योनि को छोड़कर पवित्र हो गए हो, इसलिए हम लोगों के लिए भी वंदनीय हो गए हो, क्योंकि शिव तथा विष्णु-भक्त हम देवताओं के वंदना करने योग्य हैं, अतः आप दोनों धन्य हैं। अब आप प्रसन्नतापूर्वक देवलोक में निवास कर सकते हैं।

संगीत देवी सरस्वती का एक अलौकिक वरदान है, यह एक साधना है, एक विद्या है। इसमें पवित्रता आवश्यक है। फिर जिस सभा में अपने से बड़े गुरुजन आदि उपस्थित हों, वहां प्राणी को संयम और मर्यादा को बनाए रखना चाहिए, ताकि गुरुजनों का अपमान न हो, उनका सम्मान बना रहे। गुरुजनों का अपमान करने वाला मनुष्य घोर नरक का भागी है।

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