उत्पन्ना एकादशी
🌸उत्पन्ना एकादशी🌸
सतयुग में एक दैत्य था, जिसका नाम मुर था। वह दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं को युध्द मे परास्त कर विजय प्राप्त की और उन्हें उनके पद से हटा दिया और इन्द्रलोक पर भी अपना कब्जा कर लिया । तब इन्द्र ने भगवान शंकर जी समक्ष जाकर प्रार्थना की- 'हे भोलेनाथ, हम सभी देवता, दैत्य मुर के अत्याचारों से पीडित होकर अपना जीवन मृत्युलोक में व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से यह बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। मैं स्वयं बहुत दुखी और भयभीत हूँ | हे कैलाशपति! कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।'
देवराज की प्रार्थना सुन शंकरजी ने कहा- 'हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि के पास जाइए। मधु-कैटभ का संहार करने वाले भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।
भगवान महादेवजी के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता भगवान श्री हरि के धाम क्षीर सागर पहुचे, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।
सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उनकी स्तुति की - 'हे तीनों लोकों के स्वामी! हम आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हे दैत्यों के संहारक! हम आपकी शरण में हैं, हमारी रक्षा करें। हे त्रिलोकपति! हम दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। आप ही हमारी रक्षक है |
देवताओं की करुण पुकार सुनकर, भगवान श्रीहरि बाले- 'हे देवगणो! वह दैत्य कौन है? जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है?
भगवान विष्णु के वचनों को सुन देवेन्द्र ने कहा- 'हे प्रभु! प्राचीन काल में ब्रह्मवंश में उत्पन्न हुआ नाड़ी जंगम नाम का एक असुर था, जिसका मुर नामक एक पुत्र है, जो चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करता है, जिसने अपने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, और दैत्य अपने कुल के असुरों को इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, चन्द्रमा आदि लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।
देवेन्द्र के वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ' मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।
भगवान विष्णु देवताओम उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि स्वंय भगवान विष्णु युद्ध के लिये उसकी राजधानी आ रहे हैं, अतः वह भी अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि पर आ गया।और युद्ध शुरू हो गया, असुर ने अस्त्रों-शस्त्रों को धारण कर देवताओं से युद्ध करने लगे, किन्तु देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। दैत्य भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को श्रीविष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। और देखते ही देखते दैत्य सदा के लिए मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्यराज मुर भगवान विष्णु के साथ निश्चल भाव से युद्ध करता रहा। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। इस प्रकार युध्द करते करते कई वर्ष लग गये ¦अतः अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नाम की एक गुफा में प्रवेश कर गए।
उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। वह सोच मैं आज अपने चिर शत्रु को मार हमेशा के लिए निष्कण्टक हो जाऊँगा, परन्तु उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस से युद्ध करने लगी।
उस कन्या को देख राक्षस को आश्चर्य हुआ और वह सोचने लगा कि यह दिव्य कन्या कहाँ से उत्पन्न हुई और फिर वह असुर उस कन्या से युद्ध करने लगा, कुछ समय पश्चात उस कन्या ने क्रोध में आकर उस दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अब दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा।
उस तेजस्वी कन्या ने उस असुर का सिर काट दिया और बाकी बचे असुर अपने राजा का ऐसा दुःखद अन्त देखकर भयभीत होकर पाताल लोक में भाग गए। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इसे किसने मारा है?
तब वह कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- 'हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।'
कन्या की बात सुन भगवान बोले- 'तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने तीनों लोकों के देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।'
भगवान की बात सुन कन्या बोली- 'हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।
भगवान श्रीहरि ने कहा- 'हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। हे कल्याणी! तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप समूल नष्ट हो जाएँगे। यह मेरा अकाट्य कथन है।' इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अन्तर्धान हो गए।
अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे, उद्धृतापि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
मृत्तिके हर में पाप यन्मया पूर्वक संचितम्, त्वचा हतेन पापेन गच्छामि परमां गतिम्॥
श्रीहरि के नाम का जप करना चाहिए, इस एकादशी के व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए। एकादशी भगवान विष्णु की साक्षात शक्ति है, जिस शक्ति ने उस असुर का वध किया है ।
सतयुग में एक दैत्य था, जिसका नाम मुर था। वह दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं को युध्द मे परास्त कर विजय प्राप्त की और उन्हें उनके पद से हटा दिया और इन्द्रलोक पर भी अपना कब्जा कर लिया । तब इन्द्र ने भगवान शंकर जी समक्ष जाकर प्रार्थना की- 'हे भोलेनाथ, हम सभी देवता, दैत्य मुर के अत्याचारों से पीडित होकर अपना जीवन मृत्युलोक में व्यतीत कर रहे हैं। राक्षसों के भय से यह बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं। मैं स्वयं बहुत दुखी और भयभीत हूँ | हे कैलाशपति! कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये।'
देवराज की प्रार्थना सुन शंकरजी ने कहा- 'हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि के पास जाइए। मधु-कैटभ का संहार करने वाले भगवान विष्णु देवताओं को अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे।
भगवान महादेवजी के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता भगवान श्री हरि के धाम क्षीर सागर पहुचे, जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे।
सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उनकी स्तुति की - 'हे तीनों लोकों के स्वामी! हम आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। हे दैत्यों के संहारक! हम आपकी शरण में हैं, हमारी रक्षा करें। हे त्रिलोकपति! हम दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। आप ही हमारी रक्षक है |
देवताओं की करुण पुकार सुनकर, भगवान श्रीहरि बाले- 'हे देवगणो! वह दैत्य कौन है? जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है?
भगवान विष्णु के वचनों को सुन देवेन्द्र ने कहा- 'हे प्रभु! प्राचीन काल में ब्रह्मवंश में उत्पन्न हुआ नाड़ी जंगम नाम का एक असुर था, जिसका मुर नामक एक पुत्र है, जो चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करता है, जिसने अपने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, और दैत्य अपने कुल के असुरों को इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, चन्द्रमा आदि लोकपाल बना दिया है। वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है, अतः आप इस असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें।
देवेन्द्र के वचन सुन भगवान विष्णु बोले- ' मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा। आप सब मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए।
भगवान विष्णु देवताओम उनके साथ चल दिए। उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि स्वंय भगवान विष्णु युद्ध के लिये उसकी राजधानी आ रहे हैं, अतः वह भी अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि पर आ गया।और युद्ध शुरू हो गया, असुर ने अस्त्रों-शस्त्रों को धारण कर देवताओं से युद्ध करने लगे, किन्तु देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए। तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए। दैत्य भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे। दैत्यों के आक्रमण वारों को श्रीविष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे। और देखते ही देखते दैत्य सदा के लिए मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्यराज मुर भगवान विष्णु के साथ निश्चल भाव से युद्ध करता रहा। भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते। इस प्रकार युध्द करते करते कई वर्ष लग गये ¦अतः अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नाम की एक गुफा में प्रवेश कर गए।
उस गुफा में प्रभु ने शयन किया। भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था। भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया। वह सोच मैं आज अपने चिर शत्रु को मार हमेशा के लिए निष्कण्टक हो जाऊँगा, परन्तु उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस से युद्ध करने लगी।
उस कन्या को देख राक्षस को आश्चर्य हुआ और वह सोचने लगा कि यह दिव्य कन्या कहाँ से उत्पन्न हुई और फिर वह असुर उस कन्या से युद्ध करने लगा, कुछ समय पश्चात उस कन्या ने क्रोध में आकर उस दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अब दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा।
उस तेजस्वी कन्या ने उस असुर का सिर काट दिया और बाकी बचे असुर अपने राजा का ऐसा दुःखद अन्त देखकर भयभीत होकर पाताल लोक में भाग गए। भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इसे किसने मारा है?
तब वह कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली- 'हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है।'
कन्या की बात सुन भगवान बोले- 'तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसे मारकर तुमने तीनों लोकों के देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो। मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा।'
भगवान की बात सुन कन्या बोली- 'हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले। जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रत को करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें। जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे। कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये।
भगवान श्रीहरि ने कहा- 'हे कन्या! ऐसा ही होगा। मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे। हे कल्याणी! तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप समूल नष्ट हो जाएँगे। यह मेरा अकाट्य कथन है।' इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अन्तर्धान हो गए।
अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे, उद्धृतापि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
मृत्तिके हर में पाप यन्मया पूर्वक संचितम्, त्वचा हतेन पापेन गच्छामि परमां गतिम्॥
श्रीहरि के नाम का जप करना चाहिए, इस एकादशी के व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए। एकादशी भगवान विष्णु की साक्षात शक्ति है, जिस शक्ति ने उस असुर का वध किया है ।
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