पुत्रदा एकादशी
🌸पुत्रदा एकादशी🌸
भद्रावती नगर में सुकेतुमान नाम का एक राजा था। उसकी कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। उस पुत्रहीन होने की वजह से राजा के मन हमेशा यह दुख रहता था, कि उसके बाद उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिंडदान देगा। उसके पितर भी व्यथित थे कि सुकेतुमान के बाद हमें कौन पिंड देगा। और दूसरी तरफ राजा भी बंधु-बांधव, राज्य, हाथी, घोड़ा आदि से संतुष्ट नहीं था। इन सबका एक मात्र कारण राजा का पुत्रहीन होना था। बिना पुत्र के पितरों की तृप्ति नहीं हो सकती। यही सोचकर राजा रात-दिन चिंता में घूटता जा रहा था। एक दिन वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन्न हो गई, किंतु वह सोचने लगा कि आत्महत्या करना तो महापाप है, अतः उसने इस विचार को मन से निकाल दिया। और वह घोड़े पर सवार होकर वन को चल दिया।
घोड़े पर सवार राजा वन, पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। राजा ने वन में देखा कि मृग, बाघ, सिंह, बंदर आदि विचरण कर रहे हैं। शिशु हाथी हथिनियों के बीच में विचर रहे है। वन में राजा ने देखा सियार कर्कश शब्द निकाल रहे हैं तो कही मोर नाच रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा और ज्यादा दुखी हो गया कि उसके पुत्र क्यों नहीं हैं? इसी सोच-विचार में दोपहर हो गई। वह सोचने लगा कि मैंने अनेक यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन कराया है, किंतु फिर भी मुझे यह दुख क्यों मिल रहा है? आखिर इसका कारण क्या है? अपनी व्यथा किससे कहूं? कौन मेरी व्यथा का समाधान कर सकता है?
अपने विचारों में खोए राजा को प्यास लगी। वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला। उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे। सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल-क्रीड़ा में मग्न थे। सरोवर के चारों तरफ ऋषियों के आश्रम बने हुए थे। अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। इसे शुभ शगुन समझकर राजा मन में प्रसन्न होता हुआ घोड़े से नीचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे हुए ऋषियों को प्रणाम करके उनके सामने बैठ गया।
ऋषिवर बोले- 'हे राजन! हम तुमसे अति प्रसन्न हैं। तुम्हारी जो इच्छा है, हमसे कहो।
राजा ने प्रश्न किया- 'हे विप्रो! आप कौन हैं? और किसलिए यहां रह रहे हैं?'
ऋषि बोले- 'राजन! आज पुत्र की इच्छा करने वाले को श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है। इस एकादशी का उपवास करें। भगवान श्रीहरि की आशीर्वाद से आपके घर अवश्य ही पुत्र होगा।
राजा मुनि के वचनों के अनुसार उस दिन एकादशी व्रत का उपवास किया और द्वादशी को व्रत का पारण कर ऋषियों को प्रणाम करके अपनी नगरी वापस आ गया। भगवान श्रीहरि की कृपा से कुछ दिन बाद ही उसकी रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह के पश्चात उसके एक तेजस्वी पुत्र बालक का जन्म हुआ । इस प्रकार राजा ने पुत्रदा एकादशी का व्रत कर पुत्र की प्राप्ति कि एकादशी का फल अवश्य मिलता है |
!! जय जय श्री राधे !!
भद्रावती नगर में सुकेतुमान नाम का एक राजा था। उसकी कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। उस पुत्रहीन होने की वजह से राजा के मन हमेशा यह दुख रहता था, कि उसके बाद उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिंडदान देगा। उसके पितर भी व्यथित थे कि सुकेतुमान के बाद हमें कौन पिंड देगा। और दूसरी तरफ राजा भी बंधु-बांधव, राज्य, हाथी, घोड़ा आदि से संतुष्ट नहीं था। इन सबका एक मात्र कारण राजा का पुत्रहीन होना था। बिना पुत्र के पितरों की तृप्ति नहीं हो सकती। यही सोचकर राजा रात-दिन चिंता में घूटता जा रहा था। एक दिन वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन्न हो गई, किंतु वह सोचने लगा कि आत्महत्या करना तो महापाप है, अतः उसने इस विचार को मन से निकाल दिया। और वह घोड़े पर सवार होकर वन को चल दिया।
घोड़े पर सवार राजा वन, पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। राजा ने वन में देखा कि मृग, बाघ, सिंह, बंदर आदि विचरण कर रहे हैं। शिशु हाथी हथिनियों के बीच में विचर रहे है। वन में राजा ने देखा सियार कर्कश शब्द निकाल रहे हैं तो कही मोर नाच रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा और ज्यादा दुखी हो गया कि उसके पुत्र क्यों नहीं हैं? इसी सोच-विचार में दोपहर हो गई। वह सोचने लगा कि मैंने अनेक यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन कराया है, किंतु फिर भी मुझे यह दुख क्यों मिल रहा है? आखिर इसका कारण क्या है? अपनी व्यथा किससे कहूं? कौन मेरी व्यथा का समाधान कर सकता है?
अपने विचारों में खोए राजा को प्यास लगी। वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला। उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे। सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल-क्रीड़ा में मग्न थे। सरोवर के चारों तरफ ऋषियों के आश्रम बने हुए थे। अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। इसे शुभ शगुन समझकर राजा मन में प्रसन्न होता हुआ घोड़े से नीचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे हुए ऋषियों को प्रणाम करके उनके सामने बैठ गया।
ऋषिवर बोले- 'हे राजन! हम तुमसे अति प्रसन्न हैं। तुम्हारी जो इच्छा है, हमसे कहो।
राजा ने प्रश्न किया- 'हे विप्रो! आप कौन हैं? और किसलिए यहां रह रहे हैं?'
ऋषि बोले- 'राजन! आज पुत्र की इच्छा करने वाले को श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करने वाली पुत्रदा एकादशी है। इस एकादशी का उपवास करें। भगवान श्रीहरि की आशीर्वाद से आपके घर अवश्य ही पुत्र होगा।
राजा मुनि के वचनों के अनुसार उस दिन एकादशी व्रत का उपवास किया और द्वादशी को व्रत का पारण कर ऋषियों को प्रणाम करके अपनी नगरी वापस आ गया। भगवान श्रीहरि की कृपा से कुछ दिन बाद ही उसकी रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह के पश्चात उसके एक तेजस्वी पुत्र बालक का जन्म हुआ । इस प्रकार राजा ने पुत्रदा एकादशी का व्रत कर पुत्र की प्राप्ति कि एकादशी का फल अवश्य मिलता है |
!! जय जय श्री राधे !!
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)

No comments :
Post a Comment