मोहिनी एकादशी
🌸मोहिनी एकादशी🌸
एक बार भगवान श्री राम जी ने महर्षि वशिष्ठ जी से पूछा - हे गुरूवर मैं जनक नन्दिनी सीता जी के वियोग में बहुत कष्ट भोगे है कृपया कर आप मुझे कोई ऐसा उपाय या व्रत बतलाई जिसके करने से मेरे कष्टों का निवारण हो सके।
महर्षि वशिष्ठ जी ने कहा - हे श्री राम आपके नाम के स्मरण मात्र से ही संसार के मनुष्यों के सारे कष्ट अपने आप ही समाप्त हो जाते है। लेकिन आपने लोकहित के लिए बहुत ही सुंदर प्रश्न किया है। इस हेतु मैं आपको एक ऐसे व्रत की माहात्म्य बतलाना चाहता हूॅ। जिसके करने मात्र से ही मनुष्य के सारे पाप, कष्ट, दुख एंव क्लेश स्वंय ही समाप्त हो जाते है। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी जिसका नाम मोहिनी एकादशी है। इस एकादशी के व्रत करने से मनुष्य के सारे कष्ट और पाप समाप्त हो जाते है। अतः हे राम, यह एकादशी का व्रत सभी को करना चाहिए। मैं आपको इसका एक रोचक कथा सुनाता हूॅ।
प्राचीन काल में सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगर हुआ करती थी, जहाॅ द्युतिमान नाम एक चंद्रवशी राजा था । वही उसके ही नगर में एक वैश्य भी था। जिसका नाम धनपाल था, जो कि धन-धान्य से संपन्न था। धन-धान्य से संपन्न होने के साथ - साथ वह धार्मिक प्रवृत्ति और भगवान नारायण का भक्त भी था। उस धर्मपाल ने नगर में अनके जगहों पर धर्मशालाएं, भोजनालय, कुएॅ, तालाब आदि का निर्माण कराया था, और नगर के सड़कों के किनारे अलग-अलग किस्म के वृक्ष का रोपण भी कराये थे । जिससे आने-जाने वाले जनों को उसका लाभ मिलता था। धर्मपाल के पाॅच पुत्र थे, जिनका नाम सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबृद्धि था। जिनमें उनका एक पुत्र धृष्टबृद्धि अत्यधिक पापी एवं दुष्ट प्रवृत्ति का था। वह हमेशा दुष्टों संगत में ही लीन रहता था, और साथ ही देवता एवं पितृ का मान-सम्मान भी नही किया था। वह हमेशा अपने पिता के धनों को बुरे व्यसन में ही खर्च किया करता। मदिरापान करना, मांस खाना और घर से आभूषणों की चोरी करता इस प्रकार वह अन्य प्रकार के पापकर्म किया करता । जिससे कारण परिवार के सभी सदस्यों ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह किसी कि बात नहीं समझता था, तब राजा ने उसे कारागार में बंद करावा दिया । लेकिन फिर भी नहीं मानने के बाद राजा ने उसे राज्य से बाहर करने का आदेश दे दिया । जिससे उसे राज्य से बाहर निकाल दिया गया, राज्य से बाहर निकालने के बाद कुछ ही दिन में उसके सारे धन समाप्त हो गये। जिससे उसके सारे साथियो ने भी उसका साथ छोड़ दिया। और फिर वह अकेले ही वन में जाकर वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा और अपना जीवन यापन करने लगा । कुछ समय बाद ही वह एक बहेलिया बन गया। एक बार भूख से विचलित हो खाने की तलाश करते हुए कौडिन्य ऋषि के आश्रम के समीप जा पहुॅचा । वह वैशाख का माह था, ऋषि कौडिन्य गंगा स्नान करके गीले वस्त्र धारण करके ही आश्रम वापस आ रहे थे । जिसके कारण उनके वस्त्रों से पानी के छीटे पड़ रहे थे । उसी पानी के कुछ छीटे धृष्टबृद्धि पर भी पड़ी जिससे उसमें थोड़ी सद्बुद्धि की प्राप्त हुई। और वह ऋषि कौडिन्य मुनि के समक्ष हाथ जोड़कर कहने लगा। हे ऋषिवर मैंने आज तक जीवन से बहुत पाप किए है । कृपया कर आप मुझे कोई ऐसा उपाय बताये जिसके करने से मैं पापमुक्त हो सकू । कौडिन्य उसकी बात सुन प्रसन्न हो गये और उसे वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले मोहिनी एकादशी के बारे में संक्षिप्त विधि अनुसार बताया । जिससे उसके सारे पाप समाप्त हो गये । और एकादशी के प्रभाव के कारण उसे श्री हरि के धाम के करने इसकी कथा का श्रवण करने से ही हजारों गौदान के फल की प्राप्ति होती है। इसलिए कहाॅ जाता हैं, मनुष्य को हमेशा संतो का संग करना अति आवश्यक है, जिससे जीवन में हमेशा सही राह और सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है। दुष्टजनाें की संगत हमेशा कष्टदायक होती है।
॥ हरेकृष्णा ॥ जय श्री हरि ॥ हरे रामा ॥
एक बार भगवान श्री राम जी ने महर्षि वशिष्ठ जी से पूछा - हे गुरूवर मैं जनक नन्दिनी सीता जी के वियोग में बहुत कष्ट भोगे है कृपया कर आप मुझे कोई ऐसा उपाय या व्रत बतलाई जिसके करने से मेरे कष्टों का निवारण हो सके।
महर्षि वशिष्ठ जी ने कहा - हे श्री राम आपके नाम के स्मरण मात्र से ही संसार के मनुष्यों के सारे कष्ट अपने आप ही समाप्त हो जाते है। लेकिन आपने लोकहित के लिए बहुत ही सुंदर प्रश्न किया है। इस हेतु मैं आपको एक ऐसे व्रत की माहात्म्य बतलाना चाहता हूॅ। जिसके करने मात्र से ही मनुष्य के सारे पाप, कष्ट, दुख एंव क्लेश स्वंय ही समाप्त हो जाते है। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी जिसका नाम मोहिनी एकादशी है। इस एकादशी के व्रत करने से मनुष्य के सारे कष्ट और पाप समाप्त हो जाते है। अतः हे राम, यह एकादशी का व्रत सभी को करना चाहिए। मैं आपको इसका एक रोचक कथा सुनाता हूॅ।
प्राचीन काल में सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगर हुआ करती थी, जहाॅ द्युतिमान नाम एक चंद्रवशी राजा था । वही उसके ही नगर में एक वैश्य भी था। जिसका नाम धनपाल था, जो कि धन-धान्य से संपन्न था। धन-धान्य से संपन्न होने के साथ - साथ वह धार्मिक प्रवृत्ति और भगवान नारायण का भक्त भी था। उस धर्मपाल ने नगर में अनके जगहों पर धर्मशालाएं, भोजनालय, कुएॅ, तालाब आदि का निर्माण कराया था, और नगर के सड़कों के किनारे अलग-अलग किस्म के वृक्ष का रोपण भी कराये थे । जिससे आने-जाने वाले जनों को उसका लाभ मिलता था। धर्मपाल के पाॅच पुत्र थे, जिनका नाम सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबृद्धि था। जिनमें उनका एक पुत्र धृष्टबृद्धि अत्यधिक पापी एवं दुष्ट प्रवृत्ति का था। वह हमेशा दुष्टों संगत में ही लीन रहता था, और साथ ही देवता एवं पितृ का मान-सम्मान भी नही किया था। वह हमेशा अपने पिता के धनों को बुरे व्यसन में ही खर्च किया करता। मदिरापान करना, मांस खाना और घर से आभूषणों की चोरी करता इस प्रकार वह अन्य प्रकार के पापकर्म किया करता । जिससे कारण परिवार के सभी सदस्यों ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह किसी कि बात नहीं समझता था, तब राजा ने उसे कारागार में बंद करावा दिया । लेकिन फिर भी नहीं मानने के बाद राजा ने उसे राज्य से बाहर करने का आदेश दे दिया । जिससे उसे राज्य से बाहर निकाल दिया गया, राज्य से बाहर निकालने के बाद कुछ ही दिन में उसके सारे धन समाप्त हो गये। जिससे उसके सारे साथियो ने भी उसका साथ छोड़ दिया। और फिर वह अकेले ही वन में जाकर वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा और अपना जीवन यापन करने लगा । कुछ समय बाद ही वह एक बहेलिया बन गया। एक बार भूख से विचलित हो खाने की तलाश करते हुए कौडिन्य ऋषि के आश्रम के समीप जा पहुॅचा । वह वैशाख का माह था, ऋषि कौडिन्य गंगा स्नान करके गीले वस्त्र धारण करके ही आश्रम वापस आ रहे थे । जिसके कारण उनके वस्त्रों से पानी के छीटे पड़ रहे थे । उसी पानी के कुछ छीटे धृष्टबृद्धि पर भी पड़ी जिससे उसमें थोड़ी सद्बुद्धि की प्राप्त हुई। और वह ऋषि कौडिन्य मुनि के समक्ष हाथ जोड़कर कहने लगा। हे ऋषिवर मैंने आज तक जीवन से बहुत पाप किए है । कृपया कर आप मुझे कोई ऐसा उपाय बताये जिसके करने से मैं पापमुक्त हो सकू । कौडिन्य उसकी बात सुन प्रसन्न हो गये और उसे वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले मोहिनी एकादशी के बारे में संक्षिप्त विधि अनुसार बताया । जिससे उसके सारे पाप समाप्त हो गये । और एकादशी के प्रभाव के कारण उसे श्री हरि के धाम के करने इसकी कथा का श्रवण करने से ही हजारों गौदान के फल की प्राप्ति होती है। इसलिए कहाॅ जाता हैं, मनुष्य को हमेशा संतो का संग करना अति आवश्यक है, जिससे जीवन में हमेशा सही राह और सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है। दुष्टजनाें की संगत हमेशा कष्टदायक होती है।
॥ हरेकृष्णा ॥ जय श्री हरि ॥ हरे रामा ॥
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