कामदा एकादशी
🌸कामदा एकादशी🌸
प्राचीन काल में भागीपुर नामक एक नगर था। जहाँ पुण्डरीक नाम के राजा हुआ करते था। उनके राज्य में अनेक अप्सराएँ, गन्धर्व, किन्नर आदि निवास करते थे। उसी नगर में ललित और ललिता नाम के गायन विद्या में पारन्गत गन्धर्व दंपति निवास करते थे। उन दोनों में बहुत प्रेम था, कि वे अलग हो जाने की कल्पना मात्र से ही व्यथित हो उठते थे। एक बार राजा पुण्डरीक की सभा में गन्धर्वों सहित सभी विराजमान थे। वहाँ गन्धर्वों के साथ ललित भी गायन कर रहा था। उस समय उसकी प्रियतमा ललिता वहाँ उपस्थित नहीं थी। ललित को गायन करते-करते अचानक से ललिता ख्याल आ गया, जिसके कारण गायन का लय बिगड़ गया। इससे नाराज हो नागराज कर्कोटक ने राजा पुण्डरीक से गंधर्व ललित की शिकायत कर दी। जिससे राजा को क्रोध आया और उन्होंने क्रोधवश ललित को श्राप दिया- कि तू मेरे सम्मुख गायन करते हुए भी स्त्री का स्मरण कर रहा है |जा तू नरभक्षी दैत्य बनकर अपने कर्म का फल भोग।
गंधर्व ललित उसी समय राजा पुण्डरीक के श्राप से एक दैत्य के परिवेश में बदल गया | इस तरह गंधर्व ललित राक्षस बन जाने पर वह अनेक दुःख भोगने लगा। अपने प्रियतम ललित की ऐसी हालत देख ललिता दुःख से व्यथित हो गई। और अपने पति के उद्धार के लिए विचार करने लगी कि मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ? किस तरह अपने पति को इस नरक से मुक्त कराऊँ?
राक्षस बन ललित वनों में रह पाप करने लगा। ललिता भी उसके पीछे-पीछे जाती और उसकी हालत देखकर विलाप करने लगती। एक बार अपने पति के पीछे-पीछे चलते हुए ललिता विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई। उस स्थान पर उसने श्रृंगी मुनि का आश्रम देखा। वह शीघ्रता से उस आश्रम पर गई और मुनि को प्रणाम कर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी- 'हे महर्षि! मैं वीरधन्वा नामक गन्धर्व की पुत्री ललिता हूँ, मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से दैत्य बन गये है। मै अपने पति के हालत को देखकर बहुत दुखी हूँ। कृपा कर आप उन्हें राक्षस योनि से मुक्ति का कोई उत्तम उपाय बताएँ।'
ललिता की बात सुनकर मुनि श्रृंगी ने कहा- 'हे पुत्री! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी का व्रत करने से प्राणी के सभी मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण हो जाते हैं। यदि तुम इस व्रत को कर अपने पुण्य अपने पति को देगी तो वह सहज ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा।
ललिता ने श्रद्धापूर्वक कामदा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों के समक्ष अपने व्रत का फल अपने पति को दे दिया और ईश्वर से प्रार्थना की - हे प्रभु मैंने जो यह व्रत किया है, इसका फल मेरे पतिदेव को मिले, जिससे उन्हें राक्षस योनि से शीघ्र ही मुक्ति मिल जाए ।
ललिता द्वारा एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त हो गया और अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुआ। वह अनेक सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत हो पहले की भाँति गंधर्व योनि को प्राप्त किया।
प्राणी अपने सुखों का चिन्तन करे | लेकिन समय-असमय चिन्तन करने से प्राणी को उसके दायित्वों से विमुख कर देता है, जिससे कारण कष्ट भोगने पड़ते हैं। गन्धर्व ललित ने भी राक्षस होकर निन्दित कर्म किये और कष्ट भोगे, परन्तु भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा और एकादशी के फल से उसे पुन: गंधर्व योनि प्राप्त हो गई ।
!!जय श्री हरि!!
प्राचीन काल में भागीपुर नामक एक नगर था। जहाँ पुण्डरीक नाम के राजा हुआ करते था। उनके राज्य में अनेक अप्सराएँ, गन्धर्व, किन्नर आदि निवास करते थे। उसी नगर में ललित और ललिता नाम के गायन विद्या में पारन्गत गन्धर्व दंपति निवास करते थे। उन दोनों में बहुत प्रेम था, कि वे अलग हो जाने की कल्पना मात्र से ही व्यथित हो उठते थे। एक बार राजा पुण्डरीक की सभा में गन्धर्वों सहित सभी विराजमान थे। वहाँ गन्धर्वों के साथ ललित भी गायन कर रहा था। उस समय उसकी प्रियतमा ललिता वहाँ उपस्थित नहीं थी। ललित को गायन करते-करते अचानक से ललिता ख्याल आ गया, जिसके कारण गायन का लय बिगड़ गया। इससे नाराज हो नागराज कर्कोटक ने राजा पुण्डरीक से गंधर्व ललित की शिकायत कर दी। जिससे राजा को क्रोध आया और उन्होंने क्रोधवश ललित को श्राप दिया- कि तू मेरे सम्मुख गायन करते हुए भी स्त्री का स्मरण कर रहा है |जा तू नरभक्षी दैत्य बनकर अपने कर्म का फल भोग।
गंधर्व ललित उसी समय राजा पुण्डरीक के श्राप से एक दैत्य के परिवेश में बदल गया | इस तरह गंधर्व ललित राक्षस बन जाने पर वह अनेक दुःख भोगने लगा। अपने प्रियतम ललित की ऐसी हालत देख ललिता दुःख से व्यथित हो गई। और अपने पति के उद्धार के लिए विचार करने लगी कि मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ? किस तरह अपने पति को इस नरक से मुक्त कराऊँ?
राक्षस बन ललित वनों में रह पाप करने लगा। ललिता भी उसके पीछे-पीछे जाती और उसकी हालत देखकर विलाप करने लगती। एक बार अपने पति के पीछे-पीछे चलते हुए ललिता विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई। उस स्थान पर उसने श्रृंगी मुनि का आश्रम देखा। वह शीघ्रता से उस आश्रम पर गई और मुनि को प्रणाम कर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी- 'हे महर्षि! मैं वीरधन्वा नामक गन्धर्व की पुत्री ललिता हूँ, मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से दैत्य बन गये है। मै अपने पति के हालत को देखकर बहुत दुखी हूँ। कृपा कर आप उन्हें राक्षस योनि से मुक्ति का कोई उत्तम उपाय बताएँ।'
ललिता की बात सुनकर मुनि श्रृंगी ने कहा- 'हे पुत्री! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी का व्रत करने से प्राणी के सभी मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण हो जाते हैं। यदि तुम इस व्रत को कर अपने पुण्य अपने पति को देगी तो वह सहज ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा।
ललिता ने श्रद्धापूर्वक कामदा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों के समक्ष अपने व्रत का फल अपने पति को दे दिया और ईश्वर से प्रार्थना की - हे प्रभु मैंने जो यह व्रत किया है, इसका फल मेरे पतिदेव को मिले, जिससे उन्हें राक्षस योनि से शीघ्र ही मुक्ति मिल जाए ।
ललिता द्वारा एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त हो गया और अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुआ। वह अनेक सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत हो पहले की भाँति गंधर्व योनि को प्राप्त किया।
प्राणी अपने सुखों का चिन्तन करे | लेकिन समय-असमय चिन्तन करने से प्राणी को उसके दायित्वों से विमुख कर देता है, जिससे कारण कष्ट भोगने पड़ते हैं। गन्धर्व ललित ने भी राक्षस होकर निन्दित कर्म किये और कष्ट भोगे, परन्तु भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा और एकादशी के फल से उसे पुन: गंधर्व योनि प्राप्त हो गई ।
!!जय श्री हरि!!
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