रमा एकादशी
🌸रमा एकादशी🌸
पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम का राजा था। इंद्र, वरुण, कुबेर, विभीषण आदि उसके मित्र थे। वह बड़ा ही सत्यवादी तथा भगवान विष्णुभक्त था। राजा की चंद्रभागा नाम की एक कन्या थी, जिसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से हुआ था। राजा एकादशी का व्रत करता था और पुरा राज्य भी क्रठोरता से एकादशी नियम का पालन करते थे।
एक बार सोभन अपने ससुराल आया हुआ था। वह कार्तिक का महीना था। इसी मास रमा एकादशी थी और इस दिन सभी व्रत रखते थे। चंद्रभागा ने सोचा कि मेरे पति तो बड़े कमजोर हृदय के हैं, वह व्रत कैसे करेंगे, जबकि यहां तो सभी को व्रत करने की आज्ञा है। राजा ने आदेश किया कि सारी प्रजा विधानपूर्वक एकादशी का व्रत करे। यह सुन सोभन अपनी पत्नी के पास गया और बोला- हे प्रिय तुम कुछ उपाय बताओ, क्योंकि मैं उपवास नहीं कर सकता।
पति की बात सुन चंद्रभागा ने कहा- स्वामी मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता। यहां तक कि हाथी, घोड़ा, ऊंट, पशु आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर भला आप कैसे भोजन कर सकते हैं? यदि आप उपवास नहीं कर सकते तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहां रहेंगे तो आपको व्रत तो अवश्य ही करना पड़ेगा।'
पत्नी की बात सुन सोभन ने कहा- हे प्रिय तुम्हारी राय उचित है, परंतु मैं व्रत करने के डर से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा, मैं व्रत करूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी हो।
सोभन ने एकादशी का व्रत किया और भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने लगा।
सूर्य अस्त हो रात्रि भी आ गई। सोभन को असहनीय दुख देने वाली थी। दूसरे दिन सूर्योदय होने से पूर्व ही भूख-प्यास के कारण सोभन के प्राण निकल गये। राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल-प्रवाह कर अपनी पुत्री को आज्ञा दी कि वह सती न हो और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखे।
चंद्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार सती नहीं हुई। और अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी। एकादशी प्रभाव से सोभन को जल से निकाला गया और भगवान विष्णु की कृपा से वह पुन जीवित हो गया और उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण देवपुर नाम का नगर प्राप्त हुआ। उसे वहां का राजा बना दिया गया। राजा सोभन मानो इंद्र प्रतीत हो रहा था। मुचुकुंद नगर में रहने वाला सोम शर्मा नामक एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था। घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। राजा सोभन ब्राह्मण को देख आसन से उठ खड़े हुए और अपने श्वसुर तथा स्त्री चंद्रभागा की कुशल क्षेम पूछने लगे।
सोमशर्मा ने कहा- 'हे राजन! हमारे राजा कुशल से हैं तथा आपकी पत्नी चंद्रभागा भी कुशल है। आप रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको कैसे प्राप्त हुआ?
सोभन ने कहा यह सब कार्तिक माह के रमा एकादशी के व्रत का फल है। इसी से यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है, किंतु यह अस्थिर है।'
सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोले- 'हे राजन! यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, आप मुझे समझाइए। यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो वह मैं अवश्य ही करूंगा।
राजा सोभन ने कहा- हे ब्राह्मण देव मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ, यदि आप इस वृत्तांत को चंद्रभागा से कहोगे तो वही इसे स्थिर बना सकती है ।
राजा की बात सुन ब्राह्मण वहा से लौट आया और चंद्रभागा को सारा वृत्तांत सुनाया। तब चंद्रभागा बोली- 'हे ब्राह्मण देव!क्या आप यह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं या स्वप्न कह रहे हैं?
चंद्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोले - मैंने सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है, किंतु वह नगर अस्थिर है। यदि तुम कोई उपाय करो तो वह स्थिर हो जाए।
ब्राह्मण की बात सुन चंद्रभागा बोली- ब्राह्मण देव आप मुझे उस नगर चलिए, मैं अपने पति को देखना चाहती हूं। मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।'
चंद्रभागा की बात सुनकर ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चंद्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चंद्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई।
सोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा को देखकर प्रसन्न हो गया ।
चंद्रभागा ने कहा- स्वामी आप मेरे पुण्य को सुनिए, जब मैं आठ वर्ष की थी, तब से मैं विधिपूर्वक एकादशी का व्रत कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से मै आपके नगर स्थिर करूंगा और सभी कर्मों से परिपूर्ण होकर यह प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। चंद्रभागा दिव्य स्वरूप धारण कर अपने पुण्य से नगर को स्थिर कर दिया और वही अपने पति के साथ रहने लगी ।
एकादशी व्रत का फल अवश्य प्राप्त होता है । इसलिये अवश्य एकादशी व्रत करे ।
भगवान श्रीहरि बड़े दयालु और क्षमावान हैं। श्रद्धापूर्वक या विवश होकर भी कोई उनका पूजन या एकादशी करे तो भी उत्तम फल प्राप्त होता हैं ।
पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम का राजा था। इंद्र, वरुण, कुबेर, विभीषण आदि उसके मित्र थे। वह बड़ा ही सत्यवादी तथा भगवान विष्णुभक्त था। राजा की चंद्रभागा नाम की एक कन्या थी, जिसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से हुआ था। राजा एकादशी का व्रत करता था और पुरा राज्य भी क्रठोरता से एकादशी नियम का पालन करते थे।
एक बार सोभन अपने ससुराल आया हुआ था। वह कार्तिक का महीना था। इसी मास रमा एकादशी थी और इस दिन सभी व्रत रखते थे। चंद्रभागा ने सोचा कि मेरे पति तो बड़े कमजोर हृदय के हैं, वह व्रत कैसे करेंगे, जबकि यहां तो सभी को व्रत करने की आज्ञा है। राजा ने आदेश किया कि सारी प्रजा विधानपूर्वक एकादशी का व्रत करे। यह सुन सोभन अपनी पत्नी के पास गया और बोला- हे प्रिय तुम कुछ उपाय बताओ, क्योंकि मैं उपवास नहीं कर सकता।
पति की बात सुन चंद्रभागा ने कहा- स्वामी मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता। यहां तक कि हाथी, घोड़ा, ऊंट, पशु आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर भला आप कैसे भोजन कर सकते हैं? यदि आप उपवास नहीं कर सकते तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहां रहेंगे तो आपको व्रत तो अवश्य ही करना पड़ेगा।'
पत्नी की बात सुन सोभन ने कहा- हे प्रिय तुम्हारी राय उचित है, परंतु मैं व्रत करने के डर से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा, मैं व्रत करूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी हो।
सोभन ने एकादशी का व्रत किया और भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने लगा।
सूर्य अस्त हो रात्रि भी आ गई। सोभन को असहनीय दुख देने वाली थी। दूसरे दिन सूर्योदय होने से पूर्व ही भूख-प्यास के कारण सोभन के प्राण निकल गये। राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल-प्रवाह कर अपनी पुत्री को आज्ञा दी कि वह सती न हो और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखे।
चंद्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार सती नहीं हुई। और अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी। एकादशी प्रभाव से सोभन को जल से निकाला गया और भगवान विष्णु की कृपा से वह पुन जीवित हो गया और उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण देवपुर नाम का नगर प्राप्त हुआ। उसे वहां का राजा बना दिया गया। राजा सोभन मानो इंद्र प्रतीत हो रहा था। मुचुकुंद नगर में रहने वाला सोम शर्मा नामक एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था। घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। राजा सोभन ब्राह्मण को देख आसन से उठ खड़े हुए और अपने श्वसुर तथा स्त्री चंद्रभागा की कुशल क्षेम पूछने लगे।
सोमशर्मा ने कहा- 'हे राजन! हमारे राजा कुशल से हैं तथा आपकी पत्नी चंद्रभागा भी कुशल है। आप रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको कैसे प्राप्त हुआ?
सोभन ने कहा यह सब कार्तिक माह के रमा एकादशी के व्रत का फल है। इसी से यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है, किंतु यह अस्थिर है।'
सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोले- 'हे राजन! यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, आप मुझे समझाइए। यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो वह मैं अवश्य ही करूंगा।
राजा सोभन ने कहा- हे ब्राह्मण देव मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ, यदि आप इस वृत्तांत को चंद्रभागा से कहोगे तो वही इसे स्थिर बना सकती है ।
राजा की बात सुन ब्राह्मण वहा से लौट आया और चंद्रभागा को सारा वृत्तांत सुनाया। तब चंद्रभागा बोली- 'हे ब्राह्मण देव!क्या आप यह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं या स्वप्न कह रहे हैं?
चंद्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोले - मैंने सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है, किंतु वह नगर अस्थिर है। यदि तुम कोई उपाय करो तो वह स्थिर हो जाए।
ब्राह्मण की बात सुन चंद्रभागा बोली- ब्राह्मण देव आप मुझे उस नगर चलिए, मैं अपने पति को देखना चाहती हूं। मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।'
चंद्रभागा की बात सुनकर ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चंद्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चंद्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई।
सोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा को देखकर प्रसन्न हो गया ।
चंद्रभागा ने कहा- स्वामी आप मेरे पुण्य को सुनिए, जब मैं आठ वर्ष की थी, तब से मैं विधिपूर्वक एकादशी का व्रत कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से मै आपके नगर स्थिर करूंगा और सभी कर्मों से परिपूर्ण होकर यह प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। चंद्रभागा दिव्य स्वरूप धारण कर अपने पुण्य से नगर को स्थिर कर दिया और वही अपने पति के साथ रहने लगी ।
एकादशी व्रत का फल अवश्य प्राप्त होता है । इसलिये अवश्य एकादशी व्रत करे ।
भगवान श्रीहरि बड़े दयालु और क्षमावान हैं। श्रद्धापूर्वक या विवश होकर भी कोई उनका पूजन या एकादशी करे तो भी उत्तम फल प्राप्त होता हैं ।
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