इंदिरा एकादशी

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🌸इंदिरा एकादशी🌸

इस दिन भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है, उनके निमित्त व्रत किया जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और वैकुंठ को प्राप्त होता है व नरक में गए हुए पितरों का उद्धार हो जाता है। और पितरों को भी स्वर्ग में स्थान मिलता है। जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान हृषिकेश की पूजा करता है वह मृत्यु के बाद यमलोक जाने से बच जाता है। उसके व्रत के प्रभाव से बड़े बड़े पापों का नाश हो जाता है । इस एकादशी से पितरों को भी सदगति मिलती है । पितृपक्ष में इस एकादशी के आने का उद्देश्य भी यही है कि जिनके पितर यम की यातना सह रहे हैं उन्हें मुक्ति मिल जाए।



सतयुग में महिष्मति नाम की नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए रहता था। राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और भगवान विष्णु का परम भक्त था। एक दिन राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठे थे । वही महर्षि नारद उनकी सभा में आए । राजा ने उन्हें देख जोड़कर प्रणाम कर उन्हें आदर सहित आसन दिया । महर्षि नारद जी आपकी कृपा से मेरी सर्वथा कुशल हूँ । आज आपके दर्शन से मेरी सम्पूर्ण यज्ञ क्रियाएँ सफल हो गयीं ।  कृपा कर मुझे  आपके आने का कारण बताये ।  तब नारद जी ने कहा मैं आपकी धर्मपरायणता देखकर अत्यंत प्रसन्न हूँ।

राजा ने कहा आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल हैं तथा मेरे सभी यज्ञ कर्म आदि सफल हो गए हैं। हे नारद जी आप कृपा कर आपके आगमन का प्रयोजन बताये?

नारद जी कहते है: हे राजन मैं एक बार ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ जाकर मुझे एक श्रेष्ठ आसन पर मुझे बैठा गया और यमराज ने भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की । उसी यमराज की सभा में मैैने तुम्हारे पिता को भी देखा | तुम्हारे पिता महान ज्ञानी, दानी तथा धर्मात्मा थे, किंतु उनसे पूर्व जन्म में उनसे कोई विघ्न हो जाने के कारण उनसे व्रत भंग हो गया था । वे एकादशी व्रतभंग के दोष से वहाँ आये थे । इसलिये मुझे यही यमराज के पास रहना पड़ रहा है।  तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है।

राजा ने पूछा मेरे पिता जी ने क्या संदेश भेजा है? कृपा कर बताये |

राजन तुम्हारे पिता ने कहा है- कि मेरे पुत्र इंद्रसेन के पास जाकर एक संदेश देने की कृपा करें कि मेरे पूर्व जन्म के व्रत भंग होने के कारण ही मुझे यह लोक मिला है। यदि मेरा पुत्र आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का व्रत करे और उस व्रत के फल को मुझे दे दे तो यमलोक से मेरी मुक्ति हो जाएगी। और मैं इस लोक से छूटकर स्वर्गलोक में वास करूं।

इंद्रसेन को यह बात सुनकर महान दुख हुआ और उसने नारदजी कृपा कर मेरे पिता की मुक्ति हेतु उपाय बताये मै अवश्य करूंगा। और मुझे इन्दिरा एकादशी व्रत का विधान बताने की कृपा करें।'

राजन आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक स्नान करना चाहिए। जल से निकलकर श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करें और एक समय भोजन करे | तथा एकादशी के दिन भक्तिपूर्वक व्रत कर यह संकल्प करें कि मैं आज निराहार रहूँगा और सभी भोगों का त्याग कर दूंगा।

इस प्रकार एकादशी के दिन दोपहर मे शालिग्राम की प्रतिमा को स्थापित कर पुजा करे और ब्राह्मण को बुलाकर भोजन कराएं ।

भोजन का कुछ हिस्सा गाय को अवश्य दें और भगवान विष्णु का धूप, नैवेद्य आदि से पूजन करें तथा रात्रि को जागरण करें। तदुपरांत द्वादशी के दिन पूजा कर भोजन करें। यही इन्दिरा एकादशी के व्रत की विधि है। यदि तुम इस एकादशी के व्रत को करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्ग जाएंगे।

नारदजी राजा को यह बचाकर कर चले गए । राजा ने इन्दिरा एकादशी पर विधी पूर्वक्र व्रत किया । तथा राजा ने अपने व्रत का लाभ अपने पिता को दे दिया जिससे वो यमलोक से मुक्त होकर स्वर्ग को चले गए।

अपने पिता को स्वर्ग लोक की प्राप्ति कराने हेतु भक्तिभाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करो :

अघ स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः ।
श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

‘कमलनयन भगवान नारायण ! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करुँगा । हे अच्युत आप मुझे शरण दें |'

                              "जय जय श्री राधे"

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